2 जनवरी की आधी रात क्या हुआ था जोशीमठ में??

जोशीमठ के लोगों ने महसूस किया भूकम्प जैसा झटका, क्या बड़ा विस्फोट किया गया था वहां

Trilochan Bhatt

 

दो जनवरी की आधी रात के बाद आखिर ऐसा क्या हुआ कि जोशीमठ के एक बड़े हिस्से में बड़ी-बड़ी दरारें आ गई। जोशीमठ में तीन दिन रहकर मैंने विभिन्न हिस्सों में रहने वाले लोगों से बातचीत की। इस बातचीत में एक बात जो हर मिलने वाले ने बताई, वह भी दो जनवरी के आधी रात के बाद हुई हलचल।

जोशीमठ के कई हिस्सों में एक वर्ष से ज्यादा समय से दरारें आ रही हैं। इसरो की रिपोर्ट कहती है कि जोशीमठ हाल के वर्षों में करीब 2 सेमी प्रति वर्ष की रफ्तार से धंसा है। लेकिन, 3 जनवरी की सुबह जब जोशीमठ के लोग घरों से बाहर निकले तो मंजर बदला हुआ था। यह बात हर व्यक्ति बता रहा है कि उस रात कुछ तो हुआ था। जोशीमठ में हमें कई ऐसे लोग मिले, जिनका कहना था कि 2 और 3 जनवरी की दरम्यानी रात को डेढ़ से दो बजे के बीच कुछ हलचल महसूस हुई थी। कुछ लोगों को लगा कि भूकंप का हल्का झटका था। लेकिन उस रात कोई भूकंप नहीं आया था।

ज्यादातर लोगों का कहना था कि एनटीपीसी ने जमीन के अंदर शायद कोई विस्फोट किया था। लोगों को आशंका है कि यह विस्फोट टनल में 2016 से फंसी टीबीएम यानी टनल बोरिंग मशीन को निकालने के लिए किया गया था। जोशीमठ की तबाही के लिए इस टीबीएम को भी जिम्मेदार माना जाता रहा है। टीबीएम एक भारी भरकम मशीन होती है। इस मशीन से मुख्य टनल बनाई जाती है। 6 बाई 6 के कटर वाली ये मशीन करीब 20 मीटर लंबी होती है। मुख्य टनल के अलावा जमीन के भीतर कई दूसरी टनल बनती हैं, जो मैनुअली यानी विस्फोट करके बनाई जाती हैं।

तपोवन-विष्णुगाड परियोजना की मुख्य टनल बनाने वाली ये टीबीएम सबसे पहले 2009 में हेलंग से करीब 3 किमी आगे फंस गई थी। इस जगह से अब भी 200 लीटर प्रति सेकेंट पानी निकल रहा है। शुरुआत में लंबे समय तक यहां से 700 लीटर प्रति सेकेंड पानी का रिसाव हुआ था। टीबीएम फंसने के बाद ठेकेदार कंपनी एल एंड टी ने ठेका वापस ले लिया। इसके हिन्दुस्तान कंस्टक्शन कंपनी ने इस परियोजना की टनल बनाने का ठेका लिया। एचसीसी से काफी प्रयास के बाद टीबीएम को निकालकर कुछ आगे बढ़ाया गया। लेकिन 2012 में यह मशीन फिर फंस गई। दूसरी बार भी काफी प्रयास करने के बाद मशीन निकाली गई। तीसरी बार 2016 में फिर से मशीन फंस गई और अब तक फंसी हुई है। बताया जाता है कि जहां भी यह मशीन फंसी वहां एक वाटर बॉडी भी पंक्चर हुई। या यह भी कहा जाता है कि वाटर बॉडी पंक्चर हो जाने के कारण यह मशीन जगह-जगह पंक्चर होती रही। यह पानी अलग-अलग जगहों से बाहर निकलता रहा। हाल ही में जोशीमठ के नीचे मारवाड़ी में शुरू हुए पानी की रिसाव का कारण भी वाटर बॉडी पंक्चर हो सकता है। हालांकि यह भी माना जा रहा है कि यह वह पानी है जो रिषिगंगा त्रासदी के दौरान टनल में घुसा था।

इसी टनल में काम करने वाले एक व्यक्ति ने नाम का जिक्र न करने की शर्त पर बताया कि इस समय टीबीएम जोशीमठ से आगे लगभग परसारी के नीचे है। सुनील गांव को यदि धरती की सतह मान लिया जाए तो मशीन सतह से करीब डेढ़ किमी नीचे है। दरअसल टनल को डेम के लेबल पर खोदा जाता है। यानी पूरी टनल डेम स्थल तपोवन के लेबल पर बनेगी। उक्त व्यक्ति ने जो सबसे डरावनी बात बताई, वह यह है कि टीबीएम अपने तल से लगतार उूपर की तरफ उठ रही है। इसके कारणों का अभी पता नहीं चल पाया है। लेकिन यदि मशीन अपने तल से उठ रही है तो यह इस प्रोजेक्ट पर तो सवालिया निशान है ही इससे खतरा और ज्यादा बढ़ सकता है।

जोशीमठ में ज्यादातर लोगों का कहना है कि इसी टीबीएम को निकालने के लिए हिन्दुस्तार कंस्ट्रक्शन कंपनी जमीन नीचे विस्फोट करती है। हालांकि टीबीएम की स्थिति बताने वाले व्यक्ति का कहना था कि एचसीसी कंपनी छोटे विस्फोट करती है। लगभग 500 सेमी के होल में। इससे जमीन पर इतना बड़ा इंपेक्ट होने की संभावना नहीं है, जितना जोशीमठ में देखा जा रहा है। इसके बावजूद इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि 2 जनवरी की रात को वहां कोई भारी विस्फोट किया गया था।

इसरो ने की पुष्टि


इसरो की रिपोर्ट के अनुसार जोशीमठ में 7 महीने में 9 सेंटीमीटर जबकि 12 दिन में ही 5.4 सेंटीमीटर जमीन धंस गई है। रिमोट सेंसिंग सेंटर के सेटेलाइट मैप के आधार पर इसरो की स्टडी में स्पष्ट हो गया है कि जोशीमठ में भू धंसाव की प्रक्रिया पिछले कुछ महीनों से चल रही है, जो पिछले कुछ दिनों में और भी तेज हुई है। रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल से नवंबर 2022 के बीच जोशीमठ में करीब 9 सेंटीमीटर तक भूमि धंसाव हुआ, जबकि 27 दिसंबर 2022 से 8 जनवरी 2023 के बीच 12 दिन में ही 5.4 सेंटीमीटर से भी ज्यादा भूमि धंसाव हो गया। चौंकाने वाली बात यह भी है कि भूधंसाव की यह प्रक्रिया 2180 मीटर (करीब 6500 फीट) से भी अधिक ऊंचाई तक है।

 

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