ज़मीन पर मालिकाना हक़ की बाट जोहते वन गूजर

वन गूजरों की दास्तां: भाग-1

  • सत्यम कुमार

ने जंगलों के बीच रहते हुए हमें नहीं पता होता था कि बाकी दुनिया में क्या हो रहा है। और तो और हमें दिन, महीने साल भी मालूम नहीं होते थे। न कोई कलैंडर होता था न पंचांग। हमारे आसपास महीनों की जानकारी हासिल करने के लिए वनों की चिड़िया होती थी। अलग-अलग मौसम में अलग-अलग चिड़िया का बोलना हमें बताता था कि अब समय हो गया है, अपने पशुओं के चरान के लिए ऊपर पहाड़ो में जाने का। उत्तराखंड में रहने वाले वन गूजर समुदाय के तौकीर आलम बताते हैं। प्रकृति का अभिन्न हिस्सा रहा वन गूजर समुदाय आज वनों से बेदखल है और अपने लिए जमीन का एक टुकड़ा मांग रहा है।

सदियों से ही वन गूजर समुदाय वनों के बीच रहता आया है। जिसके चलते वह उसी पारिस्थितिकी का हिस्सा बन चुके हैं और एक दूसरे पर निर्भरता को दर्शाते है। तौकीर आलम कहते हैं कि वन गूजरों का कोई भी रीति-रिवाज़, दैनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाली कोई भी वस्तु प्रकृति को किसी भी प्रकार का कोई नुकसान नहीं पहुंचाती थी। जंगलों में हम जो घर बनाते हैं, उनमें इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री जंगल से ही प्राप्त होती है। जब हम उस जगह को छोड़ कर जाते थे तो वह वहीं मिट्टी बन जाती थी। लेकिन, पिछले दो दशकों से उत्तराखंड प्रशासन के लगातार वन गूजर समुदाय को जंगल के बाहर खदेड़ने पर तुला हुआ है। इसका खामियाजा जंगल और वन गूजर दोनों को ही भुगतना पड़ रहा है।

कौन हैं वन गूजर?

अपने पशुओं के साथ वन गूजर। फोटो: सत्यम कुमार

वन गूजर उत्तराखंड राज्य के वन क्षेत्रों में रहने वाली एक जनजाति है, जो मुख्य रूप से पशुपालन करती है। दूध और घीर बेचकर अपना जीवन यापन करते है। ये घुमन्तु जनजाति अपने पशुओं के साथ मौसम के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होती रहती है। चिड़ियापुर वन रेंज की एक गुजर बस्ती में रहने वाले शमशेर गूजर बताते हैं कि हमारे पास दो तरह के पशु होते हैं, एक वो जो दूध देते हैं और दूसरे वो जो अभी दूध देने की स्थिति में नहीं हैं। इसलिए हम दूध न देने वाले पशुओं को परिवार के साथ अपने डेरे पर छोड़ कर बाकी को अपने साथ वनों और उच्च हिमालयी क्षेत्रो में ले जाते हैं। जब तक हम वापस आते हैं हमारी ये भैंसंे भी दूध देने लगती हैं। यह प्रक्रिया हर साल होती है। बर्फ पिघलने पर हम पहाड़ी क्षेत्रों में चले जाते हैं और बर्फबारी शुरू होने पर वापिस मैदानी क्षेत्रों में लौट आते हैं।

वन गूजर जनजाति का प्रकृति के साथ क़रीबी रिश्ता रहा है। वन गूजरांे की कहावतों और लोक गीतों में मुख्य रूप से प्रकृति का ही गुणगान होता है। इसके अतिरिक्त मौसम परिवर्तन का अंदाजा भी ये पक्षियों के बोलने से लगा लेते थे। हालांकि घने जंगलों से खदेड़ दिये जाने के बाद अब शहरी क्षेत्रों के आसपास रह रही गूजर समुदाय की नयी पीढ़ी के पास ये ज्ञान नहीं है। कुछ बजुर्ग लोगांे से बातचीत करने पर मालूम होता है कि सामान्य बसावटों और समाज से दूर जंगलों में रहने वाली जनजाति, जंगलों में जानवर और पक्षियों को देख कर किस प्रकार अपने दैनिक निर्णय लेती थी। लालढांग गूजर बस्ती में रहने वाली गुल्लो बीबी बताती हैं कि यहां विस्थापित होने से पहले हम लोग जंगलो में रहते थे। हमारे पास न तो समय देखने के लिए घड़ी होती थी और न ही महीनों और मौसम की जानकारी के लिए कैलेंडर होता था। हम लोग मौसम में आने वाले बदलाव का अंदाजा पक्षियों की आवाज और जंगली जानवरों के बर्ताव से ही लगाते थे।

समाचार पत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उत्तराखंड प्रशासन का मानना है कि वन गूजरों के जंगल में रहने से जंगली जानवरों पर दवाव बढ़ा है और जंगली जानवर जंगल से निकल कर रिहायशी क्षेत्रांे की ओर आ रहे हैं। लेकिन, लालढांग गूजर बस्ती में रहने वाले और माई संस्था के सदस्य तौकीर आलम बताते हैं कि वन गूजर सदियों से इन जंगलों में रहते आये हैं। वे इस पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। इसलिए वन गूजरांे के जंगल में रहने से समस्या नहीं है, बल्कि वन गुजरों के जंगल से निकलने पर समस्या होगी। तौकीर आलम कहते हैं कि जंगल में जहां-जहां वन गूजरों के पशु चरते हैं, वहां आग लगने की संभावना भी कम होती है। जंगलों में आग लगने का मुख्य कारण ज़मीन पर सूखी घास और पेड़ांे की पत्तियां होती हैं। जहां वन गुजरों के पशु चरते हैं, वहां हरी घास को पशु चर लेते हैं। फिर से हरी घास उग आती है। गर्मियों के मौसम में जब घास सूख जाती है या समाप्त हो जाती है तब हम लोग अपने दुधारू पशुओं के लिए पेड़ से पत्ते काटते हं,ै जिनके साथ फल भी होते हैं। इन पत्तांे को खाकर पशु जब जुगाली करते हैं तो बीज बाहर निकल जाता है। जहां ये बीज गिरते हैं वहां नए पेड़ उगते है। पशुओं का गोबर जंगलों में अच्छी खाद का काम करता है। इस तरह हमारे पशु जंगल के विस्तार में भी सहायक हैं।

कहानी अभी बाकी है।

(बात बोलेगी के लिए खास तौर पर यह रिपोर्ट तैयार करने वाले लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

1 Comment
  1. Vijay Bhatt says

    वन गूजरों के मसले को लेकर शानदार रिपोर्ट

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