उत्तराखंड: काम की फिक्र करो, फिक्र से ज्यादा जिक्र करो

नौकरीपेशा लोगों के बीच कामचोर कर्मचारियों के लिए एक कहावत बड़ी प्रसिद्ध है- काम की फिक्र करो, फिक्र से ज्यादा जिक्र करो, काम हो न हो। यह कहावत हू-ब-हू उत्तराखंड सरकार के कामकाज के तौर-तरीकों पर फिट बैठ रही है। सरकार को राज्य के विकास की तो बहुत चिन्ता है। इतनी चिन्ता है कि तीन दिनों तक नेता, अधिकारी और विशेषज्ञ लोग राज्य को लेकर चिन्ता करते रहते हैं। चिन्ता इतनी ज्यादा करते हैं कि बीच-बीच में योग करने की भी जरूरत पड़ जाती है। लेकिन जब विधानसभा में राज्य के मसलों को लेकर असली चिन्ता करने और नीतियां बनाने की बात आती है तो सरकार भाग खड़ी होती है। चिन्तन शिविर में पूरे तीन दिन तक चिन्ता करने वाली सरकार विधानसभा का सामना 14 घंटे भी नहीं कर पाती। पांच दिन के लिए बुलाया गया विधानसभा सत्र 13 घंटे 47 मिनट में ही समेट लिया जाता है।

चिन्तन शिविर में चिन्ता ही चिन्ता
दरअसल उत्तराखंड सरकार की ओर से 23 से 25 नवम्बर के बीच मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री अकेडमी में एक चिंतन शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर की शुरुआत राज्य के मुख्य सचिव ने की और समापन मुख्यमंत्री के भाषण से हुआ। इस बीच 3 दिन तक तमाम तरह के चिंतन किये गये। हालांकि चिंतन किस किस बारे में किए गए, सरकार की चहेती मेन स्ट्रीम मीडिया और सरकारी खैरात पर पल रहे न्यूज़ पोर्टल ने इस बारे में विस्तार से खबरें नहीं छापी। चिंतन शिविर में मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री के भाषण के बीच कई अधिकारियों ने और विशेषज्ञों ने भी प्रजेंटेशन दिए। हम इन प्रेजेंटेशन को प्राप्त करने के प्रयास में फिलहाल विफल रहे हैं। क्योंकि फिलहाल ये हमें किसी ऐसी वेबसाइट पर नहीं मिल पा रहे हैं, जहां तक हमारी पहुंच है, फिर भी हम इन्हें हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं।

मसूरी में चिन्तन शिविर की शुरुआत राज्य के मुख्य सचिव ने की।

चिंतन शिविर के समापन मौके पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अधिकारियों को कई टिप्स दिए और कई हिदायतें भी दे डाली। मुख्यमंत्री ने कहा कि अधिकारियों को काम का तरीका बदलना होगा। ये तेरी फाइल ये मेरी फाइल के चक्कर से उन्हें बाहर निकलना होगा। विभागों को एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने की प्रवृत्ति को त्यागना होगा। एसीआर भरते समय अब यह देखा जाएगा कि जिस अधिकारी को जो टास्क दिया गया है, वह पूरा हुआ है या नहीं। जिसका जैसा काम होगा, उसका वैसा इनाम होगा। यह व्यवस्था इसी साल से लागू होगी। आदि-आदि।
यह चिंतन शिविर कितना भारी भरकम और कितना थका देने वाला था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अधिकारियों और नेताओं ने थकान मिटाने के लिए योगा किया। योगा में मुख्यमंत्री भी शामिल हुए।

विधानसभा से भागी सरकार
अब विधानसभा सत्र की बात करते हैं। राज्य सरकार ने 29 नवंबर से 5 दिसंबर तक राज्य का विधानसभा सत्र आयोजित करने की बात कही थी। 29 नवंबर को देहरादून में सत्र शुरू हुआ। थोड़ा हंगामा हुआ, कुछ विधेयक पेश हुए और शाम को अनुपूरक बजट सदन में पेश किया गया। दूसरे दिन यानी 30 नवंबर को कुछ घंटे ही सदन की कार्यवाही चली और इस दौरान बिना किसी बहस के कई विधेयक पास कर दिए गए।

सीपीआई एमएल के नेता इंद्रेश मैखुरी ने इस विधानसभा सत्र को ‘छला पहाड़ निकला सत्र’ बताया। अपने ब्लॉग में ‘नुक्ता-ए-नजर में’ उन्होंने लिखा, महीनों चर्चा होगी कि विधानसभा सत्र होगा। मीडिया खबर बताएगा कि देहरादून में होगा या गैरसैंण में होगा, फिर कुछ दिन तक सत्ता और विपक्ष की नूराकुश्ती देहरादून बनाम गैरसैंण चलेगी, तब धीरे से कान में कोई कह देगा कि गैरसैंण में बहुत ठंडा है, गर्मी है तो यात्रा सीजन है। पक्ष और विपक्ष खुशी-खुशी देहरादून में सत्र करेंगे दोनों के चेहरे पर यह भाव होगा कि चलो पहाड़ चढ़ने से तो बचे। दोनों से ही गैरसैंण पर सवाल पूछो तो वे तुरंत कहेंगे, हमारी पार्टी गैरसैंण के लिए प्रतिबद्ध है।

राज्य विधानसभा का सत्र सिर्फ 13 घंटे ही चला। विधेयक बिना चर्चा के ही धड़ाधड़ पास होते चले गये।

इंद्रेश मैखुरी विधानसभा सत्र के दौरान हुई कार्रवाई पर भी तीखी टिप्पणी करते हैं। वे लिखते हैं, क्या तीर मारा इन दो दिनों में, आंदोलनकारियों के क्षैतिज आरक्षण का कानून पेश किए जाने की चर्चा तो हुई पर पास नहीं हुआ। सरकारी सेवाओं में महिलाओं को आरक्षण का कानून पास हुआ, कैसा हुआ यह तो विधेयक देखकर पता चलेगा। लोग जमीन बचाने का कानून मांग रहे थे, पर उस पर तो अभी कमेटी का च्विइंगम ही सरकार चबा रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बता रहे हैं कि धर्मांतरण के खिलाफ कानून पास करना सबसे बड़ी उपलब्धि है। इंद्रेश मैखुरी टिप्पणी करते हैं कि हिंदू धर्म का प्रचंड झंडाबरदार डबल इंजन लगा है, तब भी धर्मांतरण रोकने की नौबत आ रही है। हिंदू हितैषी होने का दम भरने वाले डबल इंजन ने यदि इतना ही हिंदू हित कर दिया तो लोगों को टूट-टूटकर हिंदू धर्म अपनाना चाहिए था।

चिन्तन शिविर और विधानसभा सत्र की तुलना की जाए तो साफ है कि उत्तराखंड सरकार मुद्दों से भाग रही है। वह जनता की परेशानियों पर कोई बात करना नहीं चाहती। रोजगार के मुद्दे पर सरकार मौन है। सरकारी नौकरियों में घोटाले पर चुप हैं। भूकानून पर कोई बात नहीं हो रही। अंकिता हत्याकांड में भाजपा नेता प्रत्यक्ष रूप से शामिल होने के बावजूद धामी की सरकार कुछ नहीं कह रही है। उत्तराखंड के आम जनमानस के लिए धामी इतना कर रहे हैं कि किसी क्षेत्र में मॉर्निंग वॉक कर लेते हैं या किसी ढाबे पर चाय पी लेते हैं। फिलहाल हमें इसी से संतुष्ट होना पड़ेगा।

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