जिन्दगी भर बिजली-सड़क का इंतजार

गुलामी में बसें आजाद भारत में उजड़े-दो

सलीम मलिक

 

(रामपुर टोंगिया गांव की आगे की कहानी)

रामपुर टोंगिया गांव में कोई अस्पताल नहीं है। सबसे नजदीक का प्राथमिक चिकित्सा केंद्र 6 किमी. दूर पाटकोट है। इसके बाद 12 किमी. दूर कोटाबाग या फिर 32 किमी. की दूरी पर रामनगर। गर्भवती महिलाओं या बुजुर्गों को तबियत खराब होने की स्थिति में उन्हें पीठ में या कंडी में बैठाकर पाटकोट पहुंचाना पड़ता है। पाटकोट में डॉक्टर किस्मत से ही मिलता है। ऐसे में गांव वाले पाटकोट जाने के बजाय सीधे रामनगर की ही राह पकड़ते हैं।

गांव की भारती देवी का कहना है कि उन्होंने सड़क, बिजली, अस्पताल जैसी जरूरतों के बिना जिंदगी काट ली है, लेकिन अब उन्हें अपने बच्चों की चिंता है। बच्चे बड़े हो गए हैं। उनकी शादी विवाह इन्हीं परेशानियों के चलते नहीं हो पा रही हैं। रिश्ते नाते की बात करने कोई गांव में आता है तो दुबारा नहीं आता। गांव में स्कूल तो है, लेकिन अध्यापक कम हैं। जूनियर हाई स्कूल तक की शिक्षा का ही आधा अधूरा इंतजाम है। आगे की शिक्षा के लिए नजदीकी इंटर कॉलेज पाटकोट में ही है। बरसात के दिनों में उफनायी रामगड़ नदी बच्चों के लिए खतरा बनी रहती है। पूरा इलाका खूंखार वन्यजीवों के आतंक से ग्रस्त है। गांव के बच्चों के लिए पढ़ाई करना भी मौत से खेलने के बराबर है। गांव में सरकारी राशन की भी कोई दुकान नहीं है। अपने हिस्से के सस्ते गल्ले के लिए चार किमी. दूर की डगर नापना मजबूरी है।

रामपुर टोंगिया गांव की महिलाओं को हर रोज तय करनी पड़ती है कई किलोमीटर

गांव में ट्रांसफार्मर और बिजली के खंभे हैं, लेकिन बिजली नहीं। बिजली को लेकर महेश चंद्र के पास कागजों का एक पुलिंदा है, जिसे वे तहसीलदार से लेकर प्रधानमंत्री तक की चौखट पर पहुंचा चुके हैं। वे कहती हैं सालों से मांग करने के बाद 2006 में उनके गांव में बिजली के खंभे लगे थे। बिजली की लाइन खिंचने से पहले ही वन विभाग ने पेड़ कटने का बहाना बनाकर इस योजना पर ब्रेक लगा दिये। 16 साल से वन विभाग से गुहार लगा रहे हैं, लेकिन कोई सुनता ही नहीं। खास बात यह है कि बिना जरूरत सड़कों को चौड़ा करने के लिए खुशी-खुशी परमिशन देने वाला वन विभाग रामपुर टोंगिया की बिजली के मामले में कई तरह के अडं़गे लगा रहा है।

त्रिवेंद्र सरकार के कार्यकाल में घोषणा की गई थी कि राज्य के टोंगिया गांवों को राजस्व ग्राम घोषित किया जाएगा। दावा किया गया था कि ऐसा होने से प्रदेश के टोंगिया गांवों की करीब 50 हजार आबादी को सभी नागरिक सुविधाएं हासिल हो सकेंगी। इस घोषणा से राज्य के हरिद्वार, देहरादून, ऋषिकेश, चंपावत, खटीमा, नैनीताल आदि इलाकों में बसे इन गांवों के लोगों की उम्मीद बंधी थी। लेकिन त्रिवेंद्र सिंह रावत की विदाई के साथ ही टोंगियां गांवों के लोगों की उम्मीदों ने भी उनसे विदा ले ली।

अब संघर्ष पर आमादा
राज्य का एक क्षेत्रीय दल उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी अब गांव के लोगों की लड़ाई लड़ने आगे आई है। पार्टी के महासचिव प्रभात ध्यानी का कहना है कि वन विभाग अपनी उन्हीं बातों को आज नहीं मान रहा है, जो उसने इन जमीनों का पट्टा ग्रामीणों को देते समय तय की थीं। सारी बातों का पट्टों में उल्लेख है। फिलहाल प्रशासन का रुख सकारात्मक दिख रहा है। लेकिन प्रशासन इसमें हीलाहवाली करेगा तो ग्रामीणों को इंसाफ दिलाए जाने के लिए वह सड़क से लेकर कोर्ट तक में लड़ाई को ले जाएंगे।

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