सड़क दुर्घटनाएं: सांत्वना और मुआवजे से आगे बढ़ो सरकार

हर हादसे के बाद होने वाली जांच के नतीजे कोई नहीं जानता

त्तराखंड में साल-दर-साल सड़क हादसों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। हर वर्ष औसतन 1000 लोगों की मौत सड़क हादसों में हो जाती है और 1300 से ज्यादा घायल हो जाते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि पूरे देश में जहां 100 सड़क दुर्घटनाओं में 25 से 30 लोगों की मौत होती है, वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड में यह संख्या 60 से 70 है। यानी कि इस राज्य में होने वाले सड़क हादसे देश में होने वाले सड़क हादसों की तुलना में करीब दो गुना ज्यादा घातक और मारक हैं। देहरादून में एसडीसी फाउंडेशन, उत्तराखंड डायलॉग और सरदार भगवान सिंह यूनिवर्सिटी की ओर से रोड सेफ्टी पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस चर्चा में रोड एक्सीडेंट से संबंधित कई तथ्य उजागर हुए। हादसों से निपटने के लिए इस परिचर्चा में स्पीड लिमिट बांधने की बात कही गई। लेकिन, जब पूछा गया कि एक तरफ दो घंटे में दिल्ली जाने की बात हो रही है और दूसरी तरफ स्पीड लिमिट की तो क्या यह परस्पर विरोधाभास नहीं है, इस सवाल को कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया।

इस परिचर्चा में एक बड़ा तथ्य यह सामने आया कि हर हादसे के बाद सरकार तीन तरह के कर्मकांड करती है। सांत्वना देना, पीड़ित परिवार को देना और हादसे की मजिस्ट्रेटी जांच करने के आदेश देना। लेकिन, इस तरह की मजिस्ट्रेटी जांचों का क्या होता है। जांच में निकले नतीजों को लेकर क्या कदम उठाया जाता है, यह आज तक किसी का पता नहीं चल पाया है। आमतौर पर इस तरह की जांचों के दो चरण होते हैं। डीएम की ओर से किसी एसडीएम को मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश देना और एसडीएम की ओर से एक सार्वजनिक सूचना जारी करना कि फलां सड़क दुर्घटना को लेकर यदि किसी के पास कोई जानकारी है तो वह उनके यानी एसडीएम के कार्यालये में दे। इसके बाद जांच कहां होती है, कौन करता है, कोई दुर्घटनास्थल का निरीक्षण करता है या नहीं, क्या तथ्य निकलते हैं। इसका कोई पता कभी नहंी चलता। छोटे हादसे तो दूरी दर्जनों लोगों की जान लेने वाले हादसों की जांच को भी सार्वजनिक नहीं किया जाता और न ही इन जांचों की प्रगति के बारे में कोई रिपोर्ट दी जाती है।

 

ऐसी सड़कें हैं उत्तराखंड में दुर्घटनाओं का मुख्य कारण।

परिचर्चा में भागीदारी कर रहे न्यूरोसर्जन डॉ. महेश कुड़ियाल ने अपने प्रजेंटेशन में बताया कि 80 फीसदी सड़क हादसे और हादसों में 80 फीसदी मौतें रोकी जा सकती हैं, अगर लोग सड़को पर अपनी सुरक्षा को लेकर जिम्मेदार बनें। इसके लिए ट्रैफिक नियमों के सख्ती से पालन के साथ-साथ हेलमेट, सीटबेल्ट, बाइक और ओवरस्पीड को लेकर व्यवहार में सुधार की आवश्यकता है। भारत में विश्व के एक फीसदी वाहन हैं जबकि विश्व के 10 फीसदी सड़क हादसे भारत में होते हैं। उत्तराखंड के लिए यह खासतौर बड़ी चुनौती है।

सामाजिक कार्यकर्ता और नीतिगत मामलों के जानकार एसडीसी फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल ने कहा कि लोगों के व्यवहार और ट्रैफिक नियमों के पालन के साथ-साथ सड़क सुरक्षा के मुद्दे पर सरकारी तंत्र को भी जवाबदेह बनाने की जरूरत है। उत्तराखंड में ओवरलोडिंग की वजह से होने वाले हादसों के पीछे पर्वतीय व ग्रामीण क्षेत्रों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बेहद कमी भी एक बड़ी वजह है। इसे दुरुस्त करना सरकार की जिम्मेदारी है। राज्य में हर साल करीब एक हजार लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मौत हो जाती है लेकिन सरकार संवेदना, मुआवजा और जांच की परिपाटी से आगे नहीं बढ़ पा रही है। इस मुद्दे पर राज्य सरकार को सम्बंधित सभी विभागों और लोगों को साथ लेकर तमिलनाडु की तरह एक मिशन छेड़ना चाहिए, जिससे इन हादसों में कमी आ सके।

सड़क हादसों के बारे में अपने अनुभव साझा करते हुए एसडीआरएफ की जनसंपर्क अधिकारी इंस्पेक्टर ललिता नेगी ने कहा कि सरकारी स्तर पर ट्रैफिक नियमों के पालन, शराब पीकर गाड़ी ना चलाने आदि को लेकर अवेयरनेस बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं। इस मुद्दे पर जन भागीदारी से ही प्रशासन की कोशिशें कामयाब हो सकेंगी। चमन लाल (पीजी) कॉलेज के प्राचार्य डा. सुशील उपाध्याय ने अपने कॉलेज का उदाहरण देते हुए सुझाव दिया कि पूरे प्रदेश में छात्रों को बिना हेलमेट कॉलेजों में प्रवेश ना करने दिया जाए तो इससे भी काफी फर्क पड़ सकता है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन के साधनों की कमी और खराब सड़कों को भी सड़क हादसे रोकने में बड़ी चुनौती बताया।

उत्तराखंड डायलॉग के संस्थापक अजीत सिंह का कहना था कि जिस तरह उत्तराखंड में यात्रियों की तादाद बढ़ रही है, सड़कांे पर वाहनों का बोझ बढ़ता जा रहा है। लेकिन इस हिसाब से रोड सेफ्टी का मुद्दा सरकार की प्राथमिकता में दिखाई नहीं पड़ता। रोड सेफ्टी संवाद में हिस्सा लेते हुए राजेश डोबरियाल ने सड़क हादसों के बाद जांच रिपोर्ट सामने ना आने पर सवाल उठाया जबकि जगमोहन मेहंदीरत्ता ने ट्रैफिक नियमों के पालन पर राजनीतिक हस्तक्षेप का मुद्दा उठाया।

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