नमस्कार! मैं रवीश कुमार

एनडीटीवी से जुड़े उन पत्रकारों के सामने भी असहज स्थिति पैदा होगी, जो इतने सक्षम नहीं कि इस्तीफा दे सकें

त्रिलोचन भट्ट

 

मुझे पूरा यकीन है कि अब भी कई ऐसे लोग होंगे जो एनडीटीवी के बिक जाने और रवीश कुमार के इस्तीफे के बाद जश्न मना रहे होंगे। हालांकि फिलहाल सोशल मीडिया पर जो कुछ ट्रेंड हो रहा है, वह बताता है कि रवीश कुमार ने एनडीटीवी की अपनी नौकरी के दौरान वह मुकाम तो हासिल कर लिया था कि अब वे जिस भी प्लेटफार्म पर अपनी बात रखेंगे, देश के बहुसंख्य लोग उसे सुनेंगे। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि रवीश कुमार की एनडीटीवी से विदाई पर हमें किसी तरह का शोक मनाना चाहिए।

रवीश कुमार से मेरी कोई प्रत्यक्ष मुलाकात तो नहीं, हां एक-दो बार टेलीफोन पर जरूर बातचीत हुई है। कुछ ऐसी स्टोरी भी रवीश कुमार ने प्राइम टाइम पर की हैं, जिनमें मेरे द्वारा उपलब्ध करवाई गई जानकारियां शामिल की गई या फिर मेरी बाइट लगाई गई। टेलीफोनिक बातचीत में भी रवीश कुमार एक खुशदिल और जिन्दादिल व्यक्ति मालूम हुए। सच कहूं तो मुझे एनडीटीवी से रवीश कुमार की विदाई का कोई दुख नहीं है। हां, एनडीटीवी बिक जाने का दुख जरूर है।

जैसे कि मैंने कहा, रवीश कुमार जिस भी मंच पर अपनी बात बोलेंगे, लोग सुनेंगे। उनकी एक बड़ी फॉलोवरशिप है। एनडीटीवी का प्रमुख चेहरा होने, लगातार जनपक्षीय पत्रकारिता करने, भाजपा समर्थकों के लगातार निशाने पर रहने और इस सबके बीच मैग्सेसे जैसे अवार्ड जीतने के कारण वे एक बड़े समुदाय के चहेते बन चुके हैं और मुझे नहीं लगता कि नौकरी से इस्तीफा देने के बाद उनके सामने किसी तरह को कोई आर्थिक संकट पैदा होने की आशंका है।

मैं रवीश कुमार से ज्यादा एनडीटीवी चैनल में काम कर रहे उन तमाम लोगों को लेकर चिन्तित हूं, जो रवीश कुमार जैसी ही जनपक्षीय पत्रकारिता करते रहे हैं। मैं एनडीटीवी के उन लोगों के लिए चिन्तित हूं जो प्राइम टाइम में रवीश कुमार के मुंह से बोलने के लिए शब्दों और वाक्यों को संजोते रहे हैं, मैं उनके लिए चिन्तित हूं जो रवीश के बोलने के लिए ऐसे शब्दों का चयन करते रहे, जिन्होंने रवीश का रवीश बनाया। लेकिन, एनडीटीवी में रहते हुए वे इतने सशक्त और आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं हो पाये कि रवीश की तरह तुरंत इस्तीफा देने का फैसला ले सकें।

सोशल मीडिया में कई लोग तर्क दे रहे हैं कि रवीश को इस्तीफा देने के बजाय एनडीटीवी में रहकर ही अपनी तरह की पत्रकारिता जारी रखने के प्रयास करने चाहिए थे। इस तर्क से मैं भी काफी हद तक सहमत हूं। लेकिन, मुझे उम्मीद है कि इस्तीफा देने का फैसला करते वक्त रवीश ने अपने उन सहयोगियों के बारे में जरूर सोचा होगा, जो इस संस्थान में रहते हुए उनकी जैसी पत्रकारिता करते रहे। प्राइम टाइम के लिए स्क्रिप्ट लिखते रहे, ठीक वैसी स्क्रिप्ट जो रवीश पर फबती थी। जहां तक मैं जानता हूं, एनडीटीवी में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है, जिनके लिए नये माहौल में काम करना असहज स्थिति पैदा करेगा। मैं स्वंय एनडीटीवी से जुड़े कुछ ऐसे पत्रकारों के संपर्क में रहा हूं। ऐसे में इस तर्क में काफी दम है कि तुरंत इस्तीफा देने से बेहतर होता वे नये माहौल में भी पुराने तेवर बनाये रखने का प्रयास करते।

लेकिन, ऐसा करने की स्थिति में इस बात की पूरी संभावना थी कि यह कहकर रवीश के कद को छोटा करने का प्रयास किया जाता कि आखिरकार सेठ ने रवीश को खरीद ही लिया। इस स्थिति का सामना करने से रवीश बच गये। यही वजह है कि उनके प्रसंशक ताल ठोंककर कह रहेे हैं कि दुनिया के दूसरे सबसे अमीर आदमी ने एनडीटीवी तो खरीद लिया, लेकिन रवीश को नहीं खरीद पाया। रवीश खुद एक वीडियो में कहते सुनाई दे रहे हैं कि सेठ के पास पैसा बहुत है, लेकिन मैं नहीं हूं। ये शब्द कहना रवीश जैसे पत्रकार के लिए संभव हैं।

बहरहाल। सोशल मीडिया पर रवीश के इस्तीफे पर जश्न मनाने संबंधी कुछ टिप्पणियां तो दिख रही हैं, लेकिन आमतौर पर सोशल मीडिया रवीशमय नजर आ रहा है।

एनडीटीवी और रवीश के बहाने आज हमें एक बार फिर पत्रकारिता के मौजूदा दौर के बारे में सोचने और समझने की भी जरूरत है। कुछ उत्साही लोग आज भी पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कह देते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह चौथा स्तंभ ढहाया जा चुका है। कुछ सत्ता ने ढहाया और कुछ अखबार और टीवी चैनलों के मालिकों ने ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए। हाल के सालों में कुछ ऐसा जरूर हुआ है कि सच्ची और अच्छी पत्रकारिता करने वालों के आलोचक बड़ी संख्या में पैदा हुए हैं। यहां आलोचक की जगह गाली देने वाले कहना ज्यादा समीचीन है। हम रवीश कुमार का ही उदाहरण लें तो कांग्रेस के दौर में भी वे जनपक्षीय पत्रकारिता करते रहे। सरकार की धज्जियां उड़ाते रहे। लोगों की बात अपने चैनल के माध्यम से लोगों तक पहुंचाते रहे, लेकिन उस दौर में वे निष्पक्ष पत्रकार कहलाये। बीजेपी का दौर आया तो वे पहले नेगेटिव जर्नलिस्ट, फिर देशद्रोही और आखिकार जहर कहलाये जाने लगे।

कुल मिलाकर यह दौर किसी रवीश कुमार के लिए शोक मनाने का नहीं है, रवीश जो करेंगे अच्छा ही करेंगे, वास्तव में यह दौर रवीश कुमार और एनडीटीवी के बहाने जनपक्षीय पत्रकारिता के मौत पर शोक मनाने का दौर है। आइये हम मेन स्ट्रीम पत्रकारिता के अंतिम स्तंभ के ढह जाने पर दो मिनट का मौन रखें।

Leave A Reply

Your email address will not be published.