उत्तराखंड में नहीं कानून का राज

कानून का राज स्थापित करने के लिए देहरादून में जन सम्मेलन का आयोजन

यूपी के बाद उत्तराखंड में भी कानून का राज खत्म हो गया है। यूपी की तरह ही उत्तराखंड में भी कानून के राज की जगह बुल्डोजर राज स्थापित किया जा रहा है। नौकरी करने पहाड़ों से उतरे युवाओं की जान ली जा रही है। सरकारी नौकरियों मोटी रकम लेकर बेची जा रही हैं। महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। लोगों के घर तोड़े जा रहे हैं और यह सब यूपी के नकल करके किया जा रहा है। ये बातें देहरादून में जन हस्तक्षेप की ओर से आयोजित जन सम्मेलन में सामने आई। इस जनसम्मेलन में विपक्षी दलों, अनेक सामाजिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया।

4 दिसम्बर 2022 को देहरादून की ख़ुशी राम पब्लिक लाइब्रेरी में हुए संयुक्त सम्मेलन में राज्य के प्रमुख विपक्षी दल – कांग्रेस, सीपीएम, समाजवादी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल के प्रतिनिधियों के साथ ही सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों, वकीलों और पत्रकारों ने राज्य में बिगड़ती हुई कानून व्यवस्था पर आक्रोश जताया और कानून का राज स्थापित करने की मांग की। कहा गया कि एक तरफ माफिया तंत्र, अपराध और हिंसा बढ़ोत्तरी पर है और दूसरी तरफ सरकार कानून को पूरी तरह से ताक पर रख कर पुलिस प्रशासन का दुरुपयोग कर रही है। मज़दूरों, महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यक समुदायों के बुनियादी हक़ों पर माफिया और सरकारी विभाग दोनों हमला कर रहे हैं, और अपराधियों पर सख्त कार्रवाई करने के बजाय उनको बचाया जा रहा है।

 

वक्ताओं ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य में यूपी की तर्ज पर बुल्डोजर राज स्थापित किया जा रहा है। अगर क़ानूनी प्रक्रिया के बिना इस रूप में बुलडोजरों का इस्तेमाल किया जायेगा तो ऐसे ही कदमों से अपराधों को छुपाने के लिए भी कोशिश की जा सकती है। अंकिता हत्याकांड में यह साफ नजर आया। वक्ताओं ने यह भी कहा कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर प्रशासन कार्रवाई नहीं कर रहा है। बिना कोई क़ानूनी प्रक्रिया कर मज़दूरों के घरों को तोडे़ जा रहे हैं। अंकिता और जगदीश के केस में सीधा पक्षपात और लापरवाही दिखाई दे रही है और अल्प संख्यक और दलित समुदायों पर हो रहे हमलों में सरकार मूकदर्शक बन कर बैठी है। अगर पुलिस प्रशासन और कानून के राज को इस रूप में कमज़ोर किया जायेगा, अपराधों में बढ़ावा होना स्वाभाविक है।

जन सम्मेलन में कांग्रेस की प्रदेश प्रवक्ता गरिमा दसौनी, उत्तराखंड महिला मंच के निर्मला बिष्ट, बार कौंसिल के पूर्व अध्यक्ष रज़िया बैग, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य उप सचिव रविंदर, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव डॉ. एनएस सचान, आल इंडिया किसान सभा के राज्य अध्यक्ष सुरेंद्र सजवाण और महामंत्री गंगाधर नौटियाल, एसएफआई के नितिन मलेठा, सर्वाेदय मंडल के हरबीर सिंह कुशवाहा, उत्तराखंड लोकतांत्रिक मोर्चा के अध्यक्ष एसएस पांगती, जनवादी महिला समिति की राज्य सचिव इंदु नौटियाल आदि ने संबोधित किया। गढ़वाल सभा के नत्था सिंह पंवार, उत्तराखंड इंसानियत मंच के डॉ. रवि चोपड़ा, जन संवाद समिति के सतीश धौलखंडी, चेतना आंदोलन के सुनीता देवी, प्रभु पंडित, मुकेश उनियाल, जनता दल (सेक्युलर) के हरजिंदर सिंह सहित कई लोग जन सम्मेलन में मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन चेतना आंदोलन के शंकर गोपाल ने किया।

तीन प्रस्ताव पारित किये गये

– अंकिता, जगदीश, पिंकी, किरण नेगी की हत्या के केस में, और शोषित जातियों और अल्पसंख्यक लोगों के साथ हो रही घटनाओं के मामले में जिन अधिकारियों ने लापरवाही की, उन पर तुरंत कार्रवाई की जाए। अंकिता के केस में बुलडोज़र का इस्तेमाल के लिए किसने आदेश दिया, उसकी भी जांच किया जाए।

– उच्चतम न्यायालय के 2006 के फैसले के अनुसार राज्य में एक पुलिस शिकायत आयोग होना चाहिए, जो स्वतंत्र होगा। अगर पुलिस प्रशासन किसी घटना में लापरवाही करेगा या किसी पर अत्याचार करेगा तो इस आयोग द्वारा ज़िम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जा सकती है। कागज़ों पर उत्तराखंड में ऐसा आयोग अस्तित्व में है, लेकिन उसको सीमित और कमज़ोर कर दिया गया है। इसलिए स्वतंत्र पुलिस शिकायत आयोग को बनाया जाए।

– उच्चतम न्यायालय के 2018 के फैसले के अनुसार भीड़ की हिंसा पर रोक लगाने के लिए हर जिले में नोडल अधिकारी होना चाहिए और जातिवादी और सांप्रदायिक गतिविधियों पर तुरंत कार्रवाई करने के लिए व्यवस्था बनना चाहिए, जो उत्तराखंड में आज तक नहीं दिख रहा है।

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