निलंबित विधानसभा सचिव को ढूंढो कोई

देहरादून में सरकारी सत्र तो सूने गैरसैंण में भी हुई हलचल

देहरादून में 29 नवम्बर, 2022 उत्तराखंड राज्य की विधानसभा का सरकारी शीतकालीन सत्र शुरू हुआ, तो पूरे साल सूने पड़े रहने वाले गैरसैंण विधानसभा भवन के आसपास भी कुछ हलचल हुई। गैरसैंण को स्थाई राजधानी घोषित करने की मांग को लेकर कुछ आंदोलनकारी गैरसैंण पहुंचे, लेकिन वहां उन्हें पुलिस कर्मियों और गैरसैंण के नायब तहसीलदार के अलावा कोई नहीं मिला। विधानसभा के वे निलंबित सचिव भी वहां नहीं थे, जिन्हें बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके विधानसभा अध्यक्ष ने गैरसैंण अटैच करने की बात कही थी।

राज्य के अस्थाई राजधानी में अवैध रूप से बने एक भवन में जब विधानसभा का शीतकालीन सत्र कवर करने और सरकार की खूबियां गिनाने में माहिर मेन स्ट्रीम मीडिया और सरकारी खैरात पर पलने वाले बहुत सारे पोर्टल के कैमरे तैनात थे तो गैरसैंण में भी जन सरोकारों से जुड़े कुछ पत्रकार मौजूद थे। गैरसैंण से यह रिपोर्ट खासतौर पर तैयार करके यहां प्रकाशित की जा रही है।

अस्थाई राजधानी में आयोजित सरकारी शीतकालीन सत्र के पहले दिन स्थाई राजधानी गैरसैंण संयुक्त संघर्ष समिति ने गैरसैंण में धरना देने का ऐलान किया था। इस धरने में राज्य के अलग-अलग हिस्सों से दर्जनभर लोग पहुंचे। उनसे ज्यादा वहां पुलिस तैनात थी, लेकिन विधानसभा का कोई कर्मचारी वहां नहीं था। संयुक्त संघर्ष समिति के नारायण सिंह बिष्ट की अध्यक्षता में विधानसभा भवन के गेट पर एक सभा का आयोजन किया गया और इसके बाद एक ज्ञापन भी दिया गया। इस सभा में प्रमुख वक्ताओं में सीपीआई एमएल के इंद्रेश मैखुरी, अल्मोड़ा के पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत, कांग्रेस के मुकेश नेगी, आइसा के अतुल सती, संजय बुड़ाकोटी, तीरथ सिंह राही, जसवंत सिंह बिष्ट, देवेन्द्र सिंह बिष्ट, दीपक करगेती आदि शामिल थे।

यहां पहुंचे आंदोलनकारियों ने पूछा कि क्या गैरसैंण विधानसभा भवन में कोई अधिकारी नियुक्त है, तो ज्वाइंट डायरेक्ट लेवल के कोई अधिकारी हैं। उन अधिकारी को ज्ञापन देने के लिए तलाशा गया, लेकिन वे कहीं नहीं मिले। यानी कि विधानसभा स्थल भराड़ीसैंण में वे नहीं थे। प्रदर्शनकारियों ने विधानसभा सचिवालय में बैकडोर से नौकरी लगाने के मामले में निलंबित विधानसभा सचिव मुकेश सिंघल को तलाश किया तो वे भी कहीं नहीं मिले। दरअसल जब राज्य विधानसभा में नियम विरुद्ध नौकरियां लगाने का मामला सामने आया था तो विधानसभा अध्यक्ष में 2016 के बाद बैकडोर से भर्ती किये गये सभी कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया था।

मुख्यमंत्री को भेजा गया ज्ञापन।

इसी मामले में अपने ही दस्तखत से दो बार खुद की पदोन्नति करने के रिकॉर्डधारी विधानसभा सचिव मुकेश सिंघल को भी निलंबित करके गैरसैंण अटैचकर दिया गया था। किसी भी कर्मचारी को निलंबित किये जाने के स्थिति में किसी ऑफिस अटैच कर दिया जाता है। संबंधित कर्मचारी को उस ऑफिस में नियमित रूप से उपस्थित रहना होता है। इस दौरान कर्मचारी को कोई काम नहीं दिया जाता, सिर्फ जीवन निर्वाह भत्ता दिया जाता है। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुकेश सिंघल को गैरसैंण विधानसभा में अटैच करने की बात कही थी। नियमानुसार निलंबित सचिव को वहां मौजूद होना चाहिए था, लेकिन वे नहीं थे। यह भी पता चला कि 9 नवंबर को राज्य स्थापना दिवस के मौके पर खुद विधानसभा अध्यक्ष गैरसैंण आई थी तो तब भी मुकेश सिंघल यहां मौजूद नहीं थे। अध्यक्ष ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की या नहीं, यह पता नहीं चल पाया।

अपने भाषण में सीपीआई एमएल नेता इंद्रेश मैखुरी ने यह बात प्रमुखता से उठाई। उनका कहना था कि यदि मुकेश सिंघल गैरसैंण में अटैच हैं तो उन्हें यहां होना चाहिए। उन्होंने वहां मौजूद पुलिस, प्रशासन और इंटेलीजेंस के अधिकारियों से कहा कि वे कम से इतना पता अवश्य लगायें कि मुकेश सिंघल कहां हैैं। यदि वे गैरसैंण में हैं तो हम उन्हें ही सीएम के नाम ज्ञापन सौंपना चाहेंगे। इंद्रेश मैखुरी ने बात बोलेगी के साथ बातचीत में कहा कि उन्हें पूरा यकीन है कि मुकेश सिंघल गैरसैंण में मौजूद नहीं थे। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि वे उस जगह मौजूद नहीं हैं, जहां निलंबन की अवधि के दौरान उन्हें अटैच किया गया है तो इसका सीधा अर्थ है कि अब भी मुकेश सिंघल मनमानी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन्हीं मनमानियों के कारण बीते 22 वर्षों में उत्तराखंड की ये हालत हुई है।

गैरसैंण में प्रदर्शनकारियों ने दो राजधानियों पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि दो राजधानियांे का कॉन्सेप्ट अंग्रेेजों का था। वे सर्दी के दिनों मैदानों में रहते थे, और गर्मी में ठंडी जगहों पर चले जाते थे। वहीं वे शासन चलाते थे। वे भारत को लूटने आये थे इसलिए राजधानी स्थानान्तरित करने में कोई हर्ज नहीं था। लेकिन उत्तराखंड की आर्थिक स्थिति दो राजधानियों का खर्च वहन करने की नहीं है। इस छोटे से राज्य के लिए दो राजधानियां फिजूलखर्ची है। वक्ताओं का कहना था कि गैरसैंण में इतनी भी ठंड नहीं पड़ती कि ठंड के मौसम में यहां न रहा जा सके। आसपास दर्जनों गांव हैं। इन गांवों में लोग बारह महीने रहते हैं। प्रदर्शनकारियों ने ग्रीष्मकालीन राजधानी को छलावा बताया और देहरादून में राजधानी को अमान्य ठहराया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि स्थाई राजधानी गैरसैंण से कम पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

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