सेलंग गांव : जिसके गर्भ में एक पूरा कस्बा

तपोवन-विष्णुगाड परियोजना का पावर हाउस और कई अन्य निर्माण हैं इस गांव के नीचे

त्रिलोचन भट्ट

प्रसिद्ध गढ़वाली गायक नरेंद्र सिंह नेगी जी का एक गीत हम सब ने सुना है- उत्तराखंड कि धरती यून डमुंन डाम्याली रे, डामुन डाम्यली रे सुरंगुन खैण्याली रे। अर्थात उत्तराखंड की धरती इन्होंने बांधों से दाग दी है और सुरंगों से खोद ली है। उत्तराखंड के दर्जनों गांव जल विद्युत परियोजनाओं के कारण खोखले हो चुके हैं। सेलंग ऐसा ही एक गांव है। जानकारों की माने तो इस गांव के नीचे सुरंगें के खोद कर बड़े मैदान बना दिये गये हैं। यहां इस परियोजना के अंडर ग्राउंड 600 मेगावाट का पावर हाउस तो है ही, कई अन्य निर्माण भी किये गये हैं। बताया जाता है कि एक बहुमंजिला भवन भी यहां बनाया गया है।

जोशीमठ भूधंसाव के बाद मैंने आस-पास के गांव में भी हालात का जायजा लिया। इनमें रैणी, रिंगी, सुभाईं और सेलंग जैसे गांव शामिल हैं। सबसे पहले मैं आपको सेलंग गांव ले चलता हूं। सेलंग में हमें जो भी लोग मिले, सभी का कहना था कि उन्हें सब्जबाग दिखाकर ठगा गया। कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें जबरन मुआवजा थमाया गया। जो सुविधाएं देने का आश्वासन दिया गया था, वे सुविधाएं नहीं दी गई और अब तो पूरा ही गांव धंस रहा है। मकानों में दरारें बढ़ रही हैं। दरअसल एनटीपीसी की तपोवन-विष्णुगाड परियोजना का तमाम इंफ्रोस्ट्रक्चर इसी गांव के नीचे है। गांव में जमीन से बाहर एक हेड बना नजर आता है, जिसकी सुरक्षा के लिए यहां सीआईएसएफ तैनात है। जहां यह निर्माण है इसके बराबर उुंचाई पर तपोवन में वह जगह है, जहां से इस परियोजना की टनल शुरू होती है।

सेलंग गांव में एनटीपीसी का एक निर्माण। यहां पहुंचेगा टनल से पानी। फिर फोर्स से भेजा जाएगा डेढ़ किमी नीचे टर्बाइन में।

टनल जोशीमठ के ठीक नीचे से होकर इस जगह पर आएगी, यानी सेलंग गांव से कुछ मीटर नीचे। यहां से पानी तीखी ढाल से करीब डेढ़ किमी नीचे धरती के भीतर उस जगह जाएगा, जहां डेढ़-डेढ़ सौ मेगावाट की 4 टर्बाइन चलेंगी। हर टर्बाइन 150 मेगावाट की।

यह पहाड़ का दुर्भाग्य है कि जहां भीं इस तरह की बड़ी योजनाएं बनी हैं, लोग नासमझी और लालच के शिकार हुए हैं। जब परियोजना शुरू होती है तो कंपनियां कई तरह के लालच देती हैं। पैसा भी मिलता है। कुछ लोगों को डंपर देकर उस डंपर को कंपनी में ही लगा दिया जाता है। लोग खुश हो जाते हैं। लेकिन, जब गांव की धरती फाड़कर भूमिगत मैदान बना दी जाती है तो तब लोगों को अपनी गलती का अहसास होता है। लेकिन, तब तक देर हो चुकी होती है। जैसा कि सेलंग में हुआ।

इस गांव की कुछ जमीन एनटीपीसी के एक्वायर की। सिर्फ वह जमीन जिस पर धरती के बाहर कोई निर्माण होना था। गांव के पेट फाड़कर बनाये गये निर्माण इसमें शामिल नहीं हैं। जमीन का सरकारी रेट से चार गुना ज्यादा पैसा दिया गया। इस पैसे से लोगों ने अच्छे-अच्छे घर बनाये। खुले हाथ खर्चा किया गया। लेकिन, जब धरती के नीचे भारी-भरकम डायनामाइट विस्फोट होने लगे तो गांव के सभी नये और पुराने मकान दरकने लगे। अब सेलंग गांव तबाही के मुहाने पर है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक जमीन के नीचे काम चलता रहा, तब तक लगातार विस्फोट होते रहे और जमीन हिलती रही। लोग कुछ नहीं कर पाये, क्योंकि कंपनी पैसे, लालच और धोखा देकर सब कुछ छीन चुकी थी।

पहाड़ के गांव केवल परियोजनाओं के कारण नहीं दरक रहे, बल्कि दूसरे कारणों से भी दरक रहे हैं। इन्हीं में से एक गांव है सुभाईं। समुद्र की सतह से करीब 32 सौ मीटर की उुंचाई पर यह सुभाईं गांव है। जोशीमठ से करीब 22 किमी दूर। तपोवन से 8 किमी कच्ची सड़क से होकर मैं यहां पहुंचा है। गांव से कुछ ही दूर हिमरेखा शुरू हो जाती है। इस गांव में दूर-दूर तक कोई परियोजना नहीं है। फिर भी गांव दरक रहा है। खास बात यह है कि वर्ष 2021 में 7 फरवरी और 16 जून के आपदा के बाद असुरक्षित हुए चिपको नेता गौरादेवी के गांव रैणी को इसी सुभाईं में विस्थापित करने की बात हुई थी, लेकिन सुभाईं अब खुद असुरक्षित है।

इस तरह से उजड़ रहा है सेलंग गांव।

गांव के लोगों का मानना है कि 7 फरवरी की आपदा के कारण यह गांव असुरक्षित हुआ है। गांव वाले नीती-मलारी सड़क के चौड़ीकरण के लिए बड़े पैमाने पर पहाड़ काटे जाने को भी सुभाईं के दरकने का कारण मान रहे हैं। चीन बॉर्डर तक जाने वाली सामरिक महत्व की इस सड़क को चौड़ा करने के लिए पिछले कुछ सालों से तेजी से काम चल रहा है। सुभाईं गांव में एक दर्जन से ज्यादा घर हमने देखे, जिन पर दरारें आई हुई हैं। इनमें से कुछ घर तो रहने लायक नहीं रह गये हैं। इसके बावजूद कुछ परिवार इन खतरनाक हो चुके घरों में रह रहे हैं। गांव वालों ने कहा कि दरारें आने का सिलसिला हाल के दिनों में ही तेज हुआ है। याने कि ठीक उन दिनों जिन दिनों जोशीमठ में दरारें बढ़ी हैं। हालांकि जोशीमठ और सुभाईं गांव की दरारों का कोई सीधा संबंध हमें प्रतीत नहीं हुआ। फिलहाल दूर-दराज के इस गांव में कोई भूवैज्ञानिकों की टीम भी नहीं पहुंची है। गांव वालों को कहना है कि हमसे पहले कोई भी गांव के हालात देखने नहीं आया। न कोई अधिकारी आया, न नेता और न ही हमसे पहले मीडिया को कोई व्यक्ति वहां पहुंचा। हमारे गांव में पहुंचते ही लोगों में अपने घरों की दरारें दिखाने की होड़ लग गई, हालांकि समय कम होने के कारण हम सभी घरों की दरारें नहीं देख पाये।

 

सहयोग की अपील

आज जबकि मुख्यधारा का मीडिया दलाली और भ्रष्टाचार के दलदल में है। पोर्टल वालों को सत्ता की तरफ से साफ निर्देश हैं कि सरकारी लाभ पाना है तो सिर्फ सरकार की तारीफ करो। ऐसे में हम ‘सरकार नहीं सरोकारों की बात’ ध्येय वाक्य के साथ बात बोलेगी पोर्टल और यूट्यूब चैनल चलाने का प्रयास कर रहे हैं। इस मुहिम को जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की आवश्यकता है।

इस बार कोड को स्कैन कर यथासंभव आर्थिक सहयोग करें।

Leave A Reply

Your email address will not be published.