युुुुवा रहेगा तो धर्म बचेगा धामी जी!

अंकिता, केदार, विपिन, नितिन आखिर कब तक मारा जाता रहेगा पहाड़ा का युवा

स वक्त जब चंद घंटे चली उत्तराखंड के विधानसभा में धर्मान्तरण विधेयक पेश हुआ, उसे बिना किसी चर्चा के पारित किया गया और उसके बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपनी थपथपाते हुए इसे एक बड़ी उपलब्धि बताया। ठीक उसी समय, पौड़ी की अंकिता का वीआईपी कहीं छुट्टा घूम रहा था, उसके माता-पिता न्याय की उम्मीद में बैठे हुए थे। ठीक उसी समय उत्तरकाशी के केदार के मां-बाप अपने बेटे के लौटने के उम्मीद लगाये हुए, जो उत्तराखंड के पुलिस की ज्यादातियों का शिकार हो चुका है। ठीक उसी समय चमोली का विपिन देहरादून में एक जानलेवा हमले के बाद अस्पताल में जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहा था और आखिरकार जिन्दगी हार बैठा। ठीक उसी समय पौड़ी के नितिन का शव हरिद्वार जिले के भगवानपुर में एक कंटेनर में सड़ रहा था।

इस चारों मामलों में समानता यह थी कि चारों रोजी-रोटी के लिए घर से निकले थे। चारों सुनहरे भविष्य के सपने लिए और माता-पिता के सपनों को पूरा करने के इरादे से सुदूर पहाड़ों से मैदानों की तरफ आये थे। चारों मार डाले गये। अंकिता ऋषिकेश के पास एक रिजॉर्ट में काम कर रही थी, जहां सत्ताधारी पार्टी से जुड़े लोगों ने एक तथाकथित वीआईपी के लिए उसके शरीर का सौदा करना चाहा, लेकिन उसने इससे इंकार किया तो मारा डाला गया। केदार अग्निवीर बनने के लिए घर से निकला था। ऋषिकेश के पास पुलिस के हत्थे चढ़ गया। चोरी के आरोप में पुलिस ने कथित रूप से प्रताड़ित किया। वह लापता हो गया। संभवतः गंगा में डूब गया या मारकर फेंक दिया गया। अब तक उसका कोई अता-पता नहीं है।

मृतक विपिन रावत का फाइल फोटो।

विपिन रावत लैब टेक्नीशियन की नौकरी ढूंढने नेताओं की राजधानी देहरादून आया था। एक होटल में खाना खाते समय हुए मामूली विवाद में गुंडों के हमले का शिकार हुए और करीब एक हफ्ते तक कॉमा में रहने के बाद जिन्दगी की जंग हार गया। उधर पौड़ी के पाबो के नितिन हरिद्वार जिले के भगवानपुर में किसी कारखाने में काम करके रोजी-रोटी चला रहा था। मार डाला गया। उसका शव कई दिनों से एक कमरे में कंटेनर में रखा सड़ता रहा।

इस तरह के मामलों को लेकर एक्टिविस्ट और सीपीआई एमएल के नेता अतुल सती की एक टिप्पणी गौर करने योग्य है। जो उन्होंने देहरादून में विपिन रावत की हत्या को लेकर लिखी है। वे लिखते हैं- जोशीमठ क्षेत्र के द्वींग गांव के विपिन रावत की देहरादून शहर में सरेआम हत्या डबल इंजन धाकड़ सरकार के फेल होने कानून व्यवस्था के मटियामेट होने का एक और उदाहरण है। नौजवान जो अपने सपने पूरे करने शहर जा रहे हैं, वह सरकार की लचर कानून व्यवस्था के चलते अपने जीवन गंवा रहे हैं। और उसके बाद न्याय पाने के उनके अधिकार भी कुचले जा रहे हैं। क्योंकि अधिकांश अपराधियों के तार सत्ता से जुड़े हैं। सो उन्हें सत्ता का संरक्षण मिल जा रहा है, बल्कि कहें कि प्रदेश में अपराध बढ़ने का बड़ा कारण ही यही है कि अपराधियों को खुली छूट है। अपराधियों का नाता उन्हीं से जिन्हें अपराध रोकने को सत्ता मिली है।

अंकिता का मामला हो या केदार भंडारी का। दलित हत्याएं हों या बलात्कार। प्रदेश अन्य क्षेत्रों में तरक्की कर रहा है या नहीं परन्तु अपराध में वह भी जघन्य अपराधों के मामले में निरंतर प्रगति पर है। अक्षम और औसत नेतृत्व का खामियाजा प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ रहा है।

राज्य में जब कानून व्यवस्था पूरी तरह चौपट हो चुकी है। अंकिता मामले में भाजपा नेता को पार्टी से बर्खास्त करके अप्रत्यक्ष रूप से सरकार उसकी मदद करती है और विपिन रावत के मामले में एक दारोगा को निलंबित करने का स्वांग किया जाता है। यह सिर्फ इन घटनाओं का विरोध कर रहे लोगों को बरगलाने के लिए हो रहा है। वरना भाजपा नेता के बेटे को रिजॉर्ट में क्या चलता था, और दारोगा कितनी घूस लेता था, ऐसा नहीं हो सकता कि इस बारे में किसी को जानकारी न रही हो।

इस सबके बीच सरकार धर्मान्तरण विधेयक को अपनी उपलब्धि बताती है। हमने नहीं सुना कि उत्तराखंड में सामूहिक रूप से धर्मान्तरण का कोई मामला कभी समाने आया हो, जिसके लिए यह कानून बनाया गया है। यानी के एक ऐसी समस्या के समाधान के लिए कानून बनाया गया है, जो राज्य में है ही नहीं। उत्तराखंड में आज सबसे बड़ी जरूरत युवाओं का जीवन बचाने की है। पहाड़ का जनमानस आखिर कब तक अपने बच्चों को यूं ही गंवाता रहेगा। सरकार को यह अच्छी तरह समझने की जरूरत है कि उत्तराखंड के किसी धर्मान्तरण कानून की जरूरत नहीं है। सबसे बड़ी जरूरत युवाओं का जीवन बचाने की है, जिसे मैदान में आते ही खत्म किया जा रहा है। और दूसरी सबसे बड़ी जरूरत युवाओं को रोजगार दिलाने की है, जिसके लिए वे मैदानों का रुख करते हैं और मार दिये जाते हैं।

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