पहाड़ की वहनीय और सहनीय क्षमता का ध्यान रखें

जोशीमठ के भूधंसाव को अलग-अलग नजरियों से देखा जा रहा है। स्थानीय लोग, वैज्ञानिक और सरकार अपने-अपने तरह से इस मामले को लेकर बातें कह रहे हैं। लेकिन एक कारण जिसे सरकार भी तमाम प्रयासों के बावजूद साफ तौर पर नकार नहीं पा रही है, वह है इस क्षेत्र की जल विद्युत परियोजनाएं। इसमें भी मुख्य रूप से निर्माणाधीन तपोवन-विष्णुगाड परियोजना, जिसे एनटीपीसी बना रही है। इस मामले को लेकर दून साइंस फोरम ने भी अपना सुझाव दिया है। फोरम के संयोजक विजय भट्ट का लेख यहां प्रकाशित किया जा रहा है।

आज कल जोशीमठ शहर अपने धंसाव के कारण काफी चर्चाओं में बना हुआ है। सोशल मीडिया से लेकर देश और दुनिया का मीडिया वहां जमा हुआ है और दिन रात रिपोर्टिंग कर टीआरपी बटोर रहा है। स्थानीय प्रभावित लोग भी वहां अपनी मांगों को लेकर धरना प्रर्दशन कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि स्थानीय लोग अब पहली बार धरना प्रदर्शन कर रहे हैं, ये लोग पिछले एक ढेड़ साल से जोशीमठ बचाने के लिए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। 7 फरवरी, 2021 की सुबह रोंठी ग्लेशियर टूटने से नीती घाटी में ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट और निर्माणधीन तपोवन-विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना को तहस-नहस कर दिया था। इस प्राजेक्ट में संविदा पर काम कर रहे 140 मजदूर यहां निर्माणाधीन सुरंग में दफन हो गये थे। इस घटना से चिपको आंदोलन की नेता गौरा देवी के गांव रैणी में खतरा मंडराने लगा था।

दरअसल जोशीमठ में धंसाव इसी घटना के बाद से शुरू हो चुका था और तभी से स्थानीय जागरूक लोग लगातार धरना-प्रदर्शन कर शासन-प्रशासन को आगाह कर रहे थे कि इन परियोजनाओं के चलते इस क्षेत्र में तबाही आने वाली है। मिश्रा कमेटी ने तो सनृ 1976 में ही जोशीमठ पर आने वाले खतरों पर अपनी रिपोर्ट शासन को दी थी। उसके बाद के वैज्ञानिक अघ्ययन भी बता रहे हैं कि जोशीमठ और उसके आसपास के इलाके खतरे की जद में है। यहां चलने वाले मेगा प्रोजेक्ट इस खतरे को बढ़ाने मे ही सहायक होंगे। 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद भी इस प्रकार की रिपोर्ट सामने आयी थी, जिन पर सरकारों ने जानबूझ कर अपनी आंखे मूंद ली। शासन प्रशासन इन सबसे बेखबर तथाकथित विकास के नाम अपनी चहेती कंपनियों के साथ यहां बड़ी-बड़ी परियोजनाओं पर काम करती रही।

आज जब प्राचीन शहर जोशीमठ अपना अस्तित्व खोने जा रहा है और स्थानीय निवासी इस कड़ाके के सर्द रातों में बेघर होकर राहत कैंपों में रहने को मजबूर हैं तब कहीं जाकर मीडिया का जमावड़ा भी यहां हुआ और प्रशासन भी कुछ फौरी काम करता हुआ सा दिखाई पड़ रहा है।
पर सवाल केवल जोशीमठ का ही नहीं है। सवाल तो उत्तराखंड राज्य सहित पूरे हिमालयी राज्यों के अस्तित्व को लेकर है। हिमालय निर्माण की प्रक्रिया से आज हम भलीभांति परिचित हैं। यह तो प्रमाणित सत्य है कि लगभग 650 लाख साल पूर्व भारतीय और यूरेशियाई प्लेट के टकराव के कारण टेथिस सागर हिमालय नामक विशाल पर्वत श्रंखला में बदल गया। इस क्रम में सबसे पहले उच्च हिमालय फिर मध्य हिमालय और अंत में शिवालिक पहाड़ियों की रचना हुई। आज भी भारतीय प्लेट उत्तर की और खिसकती हुई यूरेशियाई प्लेट से टकराकर ऊपर की तरफ उठ रही है।

जोशीमठ को बर्बाद करने वाली एनटीपीसी को विरोध बर्फबारी में ऐसे किया जा रहा है।

यही कारण है कि भूगर्भीय दृष्टि से हिमालय सर्वाधिक संवेदनशील है और इसकी कई पहाड़ियां काफी कमजोर हैं। इसलिये यहां प्राकृतिक आपदायें आना स्वाभाविक प्रक्रिया हैं। परन्त,ु अनावश्यक मानवीय छेड़छाड़ आपदाओं से होने वाले नुकसान को कई गुना बढ़ा रही है। यहां विकास के नाम पर चल रही योजनायें आज हिमालय के साथ यहां बसने वाले लोगों के लिये विनाशकारी साबित हो रही हैं। इसलिये दून साइंस फोरम का कहना है कि –

1- जोशीमठ के लोगों का मुख्य व्यवसाय और आर्थिकी तीर्थाटन पर निर्भर है इसलिये जोशीमठ के निवासियों का इसी के अनुरूप तत्काल सुरक्षित स्थान पर विस्थापन किया जाय तथा उनकी नष्ट हुई चल अचल संपत्ति का सही प्रकार से आंकलन कर उचित मुआवजा देने का उत्तरदायित्व सरकार का हो।

2- उच्च हिमालयी क्षेत्रों में चल रही जल विद्युत परियोजनाओं, सड़क चौड़ीकरण आदि परियोजनाओं को तत्काल प्रभाव से रोका जाय।

3- उत्तराखंड राज्य का निर्माण पहाड़ी राज्य की प्रकृति के अनुरूप विकास की नीतियों के निर्माण तथा नीतियां बनाने से लेकर क्रियान्वयन की प्रक्रिया में स्थानीय निवासियों की भागेदारी को सुनिश्चित करने को लेकर हुआ था। आज अतिकेन्द्रीयता के चलते तथाकथित विकास योजनाओं को यहां के निवासियों पर थोप रही है जिसके दुष्परिणाम सामाने आ रहे हैं। इसलिये दून साइंस फोरम का मानना है कि यहां किसी भी प्रकार का निर्माण पहाड़ की वहनीय और सहनीय क्षमता के अनुरूप हो और सत्ता का विकेन्द्रीयकरण किया जाय।

4- आल वेदररोड़ के निर्माण के लिये पहाड़ों का कटाव, मलवे का निस्तारण, रेल परियोजनाओं व जल विद्युत परियोजनाओं के लिये सुरंगों का निर्माण और विस्फोट हिमालय की पारिस्थितिकी का विपरीत है। इनसे होने वाले प्रभाव का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया जाना जरूरी है।

5- तीर्थाटन पर आने वाले यात्रियों को यहां की वहनीय क्षमता के अनुरूप रेगुलेट करने की जरूरत है साथ ही धार्मिक पर्यटन के लिये निजी वाहनों का आवागमन न्यून कर सार्वजनिक यातायात की व्यवस्था की जानी जरूरी है। हेलीकोप्टर सेवाओं से पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभाव का आंकलन भी किया जाना चाहिये।

6- उत्तराखंड के विकास की जनपक्षीय सतत सहनीय और वहनीय नीति निर्धारण के लिये भूवैज्ञानिकों, भूगर्भीय और पर्यावरणीय विशेषज्ञों, जनप्रतिनिधियों को शामिल करते हुये हाई पावर कमेटी का गठन किया जाय।
हम महसूस करते हैं कि हिमालयी राज्यों को लेकर जनपक्षीय विकास व हिमालय के पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर एक विस्तृत समूह के निर्माण की दिशा में काम किये जाने की जरूरत है। इस दिशा में काम किया जा रहा है।

 

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