खंड-खंड होते उत्तराखंड के लिए जिम्मेवार कौन, कहां बसेंगे उजड़े लोग

यह लेख डाउन टू अर्थ से साभार लिया गया है। पत्रिका के नवम्बर अंक में जोशीमठ में तबाही की आशंका जता दी गई थी।

Raju Sajwan

Trilochan Bhatt

 

क्टूबर का महीना है। आमतौर पर हिमालयी राज्य उत्तराखंड में सितंबर के दूसरे हफ्ते तक बारिश बंद हो जाती है और अक्टूबर की शुरुआत में मानसून विदा हो जाता है। राज्य के प्रमुख शहर जोशीमठ जैसे ऊंचाई वाले नगरों और गांव में अब तक ठंड पांव पसारने लगती है। लोग तेजी से अपने खेत-खलिहानों के काम निपटा रहे होते हैं, ताकि दीपावली से पहले सभी काम पूरे हो जाएं। लेकिन, इस बार ऐसा नहीं है। साल 2022 का अक्टूबर के पहले पखवाड़े में लगातार बारिश हुई। किसानों की फसल खेतों में खराब हो गई, दशहरे पर कारोबारियों का व्यवसाय ठप हो गया। लेकिन इन सबसे बड़ी चिंता जोशीमठ के छावनी बाजार में रह रहे करीब 25 परिवार की थी। वे लगातार हो रही बारिश से बेहद चौकन्ने और भयभीत थे। यहां रह रही विनिता देवी अपने पूरे परिवार के साथ दर्जनों दरारों वाले अपने घर के उस कमरे में बैठी रहीं, जिसे वे सबसे सुरक्षित मान रही थी। परिवार के लोगों ने घर का कुछ जरूरी सामान एक थैले में जमा कर लिया। मानो इंतजार कर रहे हों कि कब उनका घर भरभराकर ढहे और वे किसी तरह जान बचाकर भाग निकलें।

विनिता देवी का परिवार ऐतिहासिक शहर जोशीमठ के उन परिवारों में शामिल है, जिनके घरों में पड़ी दरारें सबसे ज्यादा चौड़ी हैं। विनीता देवी कहती हैं, हम लोग कुछ समय पहले घर छोड़कर किराये के मकान में चले गये थे। लेकिन हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि हर महीने किराया दे सकें, इसलिए किराये का घर छोड़कर वापस इसी असुरक्षित घर में आ गये हैं। इसी बाजार में भवानी लाल अपनी छोटी सी वर्कशॉप भी चलाते हैं। वह कहते हैं, पिछले वर्ष (2021) अक्टूबर में हुई बेमौसमी भारी बारिश के बाद हमने महसूस किया कि यहां जमीन धंस रही है। इसके कुछ दिन बाद हमारे घरों में दरारें दिखने लगी और दरारें लगातार चौड़ी होती चली गई। यह सिलसिला अब भी जारी है। इस वर्ष बरसात के मौसम में ये दरारें और चौड़ी हो गई हैं। कुछ घरों की दरारों से बाहर तक देखा जा सकता है। छावनी बाजार के लोग लगभग सभी अधिकारियों और नेताओं से मिल चुके हैं, ज्ञापन देकर पुनर्वास की मांग कर चुके हैं, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

चमोली जिले का जोशीमठ नगर बदरीनाथ, हेमकुंड साहिब, फूलों की घाटी और औली जैसे धार्मिक और पर्यटन स्थलों का मुख्य पड़ाव है। यह प्राचीन काल में चंद राजवंश की राजधानी रहा है। ऐतिहासिक और पौराणिक होने के साथ ही चीन सीमा के नजदीक होने के कारण सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। सीमा पर तैनात की जाने वाली सेना का यह बेस कैंप है। जोशीमठ की स्थायी आबादी करीब 20 हजार है और हर समय करीब इतने ही सैनिक भी यहां तैनात रहते हैं। इस तरह देखा जाए तो जोशीमठ में कुछ 35 से 40 हजार सिविलियन और सैनिक रहते हैं। हर रोज यहां ठहरने और यहां से गुजरने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या भी हजारों में होती है।

अक्टूबर 2021 में आई भारी बारिश के बाद छावनी बाजार के लोगों ने अपने घरों में दरारें देखीं तो वे डर गए। हालांकि 7 फरवरी, 2021 को नंदादेवी बायोस्फीयर क्षेत्र में हैंगिंग ग्लेशियर टूटने के कारण आई बाढ़ के बाद से उन्हें घर की दीवारों में परिवर्तन महसूस हो रहा था। गौरतलब है कि 7 फरवरी को आई बाढ़ में दो जल विद्युत परियोजनाएं बह गई थी और 200 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी।

जोशीमठ में रह रहे सामाजिक कार्यकर्ता अतुल सती कहते हैं कि अक्टूबर की बारिश के बाद साफ हो गया कि कई घर गिर सकते हैं। इसलिए हमने नवंबर 2021 में ही प्रशासन को ज्ञापन देकर प्रभावित लोगों को अन्यत्र बसाने की मांग की, लेकिन जब सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो उनके अनुरोध पर भू-वैज्ञानिकों के दल ने सर्वेक्षण कर एक रिपोर्ट तैयार की। इस दल में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद से जुड़े नवीन जुयाल और कॉलेज ऑफ फॉरेस्ट्री, रानीचौड़ी, टिहरी गढ़वाल के बेसिक एवं सोशल साइंस विभाग के अध्यक्ष एसपी सती और शुभ्रा शर्मा शामिल थे। रिपोर्ट में कहा गया कि जोशीमठ की आसपास की ढलानें बेहद नाजकु स्थिति में हैं और इन ढलानों में अस्थितिरता देखी गई है। इसलिए इस क्षेत्र का व्यापक अध्ययन किया जाना चाहिए।

इस रिपोर्ट के बाद राज्य सरकार हरकत में आई और उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के पीयूष रौतेला, सीएसआईआर-सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट के शांतनु सरकार, आईआईटी रूड़की के बीके माहेश्वरी, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के मनोज केष्ठा, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के स्वपनामिता चौधरी वेदश्वरम ने जोशीमठ का दौरा किया और सितंबर 2022 में एक रिपोर्ट जारी की। जिसमें कहा गया कि क्षेत्र की हालत को देखते हुए तुरंत यहां विकासात्मक गतिविधियां रोक देनी चाहिए। अतुल सती कहते हैं कि जोशीमठ ही नहीं, पूरी नीती घाटी में भूधंसाव हो रहा है। 7 फरवरी, 2021 की तबाही के बाद से यह सिलसिला चल रहा है।

जोशीमठ नगर में धंसाव 1970 के दशक में भी महसूस किया गया था। तब सरकारी स्तर पर गढ़वाल आयुक्त महेश चंद्र मिश्रा की अध्यक्षता में धंसाव के कारणों की जांच के लिए एक कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने 1978 में अपनी रिपोर्ट दी थी। इस रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि जोशीमठ नगर के साथ पूरी नीती और माणा घाटियां हिमोढ़ (मोरेन) पर बसी हुई हैं। ग्लेशियर पिघलने के बाद जो मलबा पीछे रह जाता है, उसे हिमोढ़ कहा जाता है। ऐसे में इन घाटियों में बड़े निर्माण कार्य नहीं किये जाने चाहिए। लेकिन मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट पर कभी किसी ने ध्यान नहीं दिया और इन घाटियांें में दर्जनों जल विद्युत परियोजनाओं के साथ ही कई दूसरे निर्माण भी लगातार हो रहे हैं।

डाउन टू अर्थ ने जोशीमठ के प्रभावित क्षेत्रों का जायजा लिया। छावनी बाजार क्षेत्र में एक भी घर ऐसा नहीं दिखा, जिसमें पिछले एक वर्ष के दौरान दरार न आई हो। ये दरारें लगातार चौड़ी होती जा रही हैं। सड़कों पर कई गहरे गड्ढे भी नजर आ रहे हैं। सेना लगातर इन गड्ढों को भरती है, लेकिन गड्ढे फिर से बन जाते हैं। जोशीमठ से करीब 7 किमी दूर स्थित रैणी गांव भी पूरी तरह असुरक्षित हो गया है और अब विस्थापन की बाट जोह रहा है। रैणी उत्तराखंड के प्रख्यात चिपको आंदोलन की प्रणेता गौरा देवी का गांव है। 7 फरवरी 2021 को ग्लेशियर टूटने से तबाह हुआ रैणी गांव जून 2021 में फिर से आई बाढ़ के कारण पूरी तरह असुरक्षित हो गया था। गांव के ठीक नीचे जमीन अब भी लगातार खिसक रही है।

पर्यावरण पत्रिका डाउन टू अर्थ में जोशीमठ धंसाव पर विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित हुई।

इस गांव के होकर चीन सीमा तक सेना को रसद पहुंचाने का एक मात्र मोटर मार्ग बार-बार टूट रहा है। कुछ परिवार अपने घर छोड़कर ज्यादा सुरक्षित समझे जा रहे दूसरों के घरों में रह रहे हैं तो कुछ परिवार जोशीमठ आ गये हैं। राज्य सरकार की ओर से गांव का भूगर्भीय सर्वेक्षण करवाया गया। रिपोर्ट में गांव के निचले हिस्से के परिवारों का तुरंत पुनर्वास की जरूरत बताई गई। प्रशासन ने इन परिवारों को पास के सुभाईं तोक में बसाने का वादा किया गया। ग्राम प्रधान भुवान सिंह रावत ने डाउन टू अर्थ को बताया कि एक वर्ष से ज्यादा का वक्त गुजर गया है, लेकिन अब तक गांव के लोगों को कहीं बसाया नहीं गया है।

रैणी की तरह राज्य में अब 484 उगांवों को राज्य सरकार ने संवदेनशील मानते हुए पुनर्वास करने के लिए चिन्हित किया है। इसके लिए बाकायदा उत्तराखंड सरकार के आपदा एवं पुनर्वास विभाग ने 19 अगस्त 2011 को पुनर्वास नीति घोषित की है। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण व पुनर्वास विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 2016 से लेकर 31 सितंबर 2022 तक चमोली जिले में 61 गांवों को संवेदनशील घोषित किया गया, जिसमें आठ गांवों का पुनर्वास कर दिया गया है। इसी तरह उत्तरकाशी में 64 में से सात, पिथौरागढ़ में 129 में से आठ, टिहरी में 33 में चार, रुद्रप्रयाग में 14 में से छह, बागेश्वर में 42 में चार, अल्मोड़ा में 12 में से एक, चम्पावत में 13 में से एक गांव का पुनर्वास किया गया है। जबकि पौड़ी में 28, देहरादून में तीन, ऊधम सिंह नगर में एक, नैनीताल में छह गांवों को संवेदनशील घोषित किया जा चुका है, परंतु इन जिलों में एक भी गांव का पुनर्वास नहीं किया गया है।

पुनर्वास की हकीकत जानने के लिए डाउन टू अर्थ ने आपदा से सबसे अधिक प्रभावित जिले चमोली के पांच गांवों का दौरा किया। इनमें रैणी के अलावा चाई, पैंग मुरांडा, चमेली (छिनका) और गणाईं शामिल थे। रैणी के पुनर्वास के लिए जिस गांव सुभाईं का चयन किया गया, वह रैणी से लगभग 5 किलोमीटर दूर है। जहां तक पहुंचने के लिए कच्चा रास्ता है और बीच में जंगल है। रैणी के पवन राणा बताते हैं कि सुभाईं में इतनी जगह है ही नहीं और यह जगह भी बहुत ज्यादा सुरक्षित नहीं है। जबकि सुभाई गांव के लोग भी रैणी के इन परिवारों को अपने गांव में बसाने का विरोध कर रहे हैं।

उनका कहना है कि उनके गांव में पैंग मुरांडा के कुछ परिवारों को बसाया गया है, जिससे आबादी बढ़ रही है और जल, जंगल, जमीन जैसे संसाधन सीमित हैं। उनके पशुओं के लिए चारे और ईंधन का संकट बढ़ जाएगा। चमोली जिले के ही चमेली (छिनका) गांव भी संवेदनशील है। गांव के ठीक नीचे बह रही अलकनन्दा नदी की तरफ लगातार भूकटाव हो रहा है। गांव में करीब 40 परिवार हैं। ग्रामीणों ने पुनर्वास की मांग की तो प्रशासन ने प्रति परिवार 4 लाख रुपए देकर जमीन की व्यवस्था खुद करने को कहा। कुछ परिवारों ने 4 लाख रुपए मुआवजा राशि लेकर चमोली, गोपेश्वर और छिनका बाजार जैसी जगहों पर मकान बना लिये हैं। ग्रामीण कहते हैं कि पूरे परिवार के लिए मकान बनाने में कम से कम 10 लाख रुपये चाहिए। गरीब परिवार अब भी गांव में रह रहे हैं और पूरी तरह से असुरक्षित हैं।

2011 की पुनर्वास नीति में कहा गया है कि आपदा से प्रभावित गांवों या परिवारों के विस्थापन के लिए जमीन का चयन करते वक्त यह खास ख्याल रखा जाएगा कि प्रभावित गांव से जितना नजदीक हो सके सुरक्षित स्थान का चयन किया जाए, ताकि विस्थापित परिवार जीवन यापन के लिए जमीन पैतृक जमीन पर खेतीबाड़ी या अपना परंपरागत व्यवसाय जारी रख सके। जहां परिवारों को बसाया जा रहा है, वह क्षेत्र न केवल सुरक्षित हो, बल्कि ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित बनाने के उपाय किए जाएंगे। आपदा प्रभावित क्षेत्र में जिन लोगों के अपने घर हैं, उन्हें चिन्हित क्षेत्र में निशुल्क जमीन दी जाएगी। यह जमीन अधिकतम 250 वर्ग मीटर हो सकती है।

गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे परिवारों को राज्य व केंद्र सरकार की आवास योजनाओं का लाभ दिया जाएगा। जबकि जिनका अपना घर या भवन था, उन्हें भवन निर्माण के लिए तीन लाख रुपए दिए जाएंगे। ऐसे प्रभावितों को जो अपनी कृषि भूमि का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें निर्धारित सर्कल रेट के आधार पर कृषि भूमि के बराबर मूल्य की भूमि या पैसा देने का यथासंभव प्रयास किया जाएगा। अगर ऐसे परिवारों को बंजर जमीन दी जाती है तो उन्हें बंजर भूमि के सुधार के लिए न्यूनतम 15 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से एक मुश्त सहायता दी जाएगी। साथ ही, गौशाला निर्माण के लिए 15 हजार की सहायता भी दी जाएगी।

लेकिन पुनर्वास नीति की ज्यादातर बातें धरातल पर नहीं उतर पाई हैं। 1999 में आए बड़े भूकंप के बाद चमोली जिले के सुदूरवर्ती पैंग-मुरंडा गांव को असुरक्षित घोषित कर दिया गया। इस गांव के 40 परिवारों को मुआवजे के तौर पर 25 हजार रुपए प्रति परिवार दिए गए। वर्ष 2000 में कुछ परिवारों ने जोशीमठ के पास रविग्राम में बंजर पथरीली भूमि 18 हजार रुपये प्रति नाली (200 वर्ग मीटर) के हिसाब से खरीद ली और मुआवजे का पैसा जमीन खरीदने में लगा दिया। सरकारी संस्थान हुडको ने मकान बनाने के िलए 35 हजार रुपए दिये और जिन परिवारों का एक भी सदस्य सरकारी नौकरी में नहीं था, उन्हें इंदिरा आवास योजना के तहत 25 हजार रुपए अलग से मिले।

इस बस्ती को अब न्यू पैंग-मुरंडा के नाम से जाना जाता है। करीब 20 परिवारों ने यहां घर बना दिये हैं। कुछ लोग जोशीमठ या दूसरी जगहों पर किराये के मकान में रह रहे हैं और करीब 15 परिवार अब भी गांव में हैं। लेकिन जो नए गांव में बस चुके हैं, वो भी सुविधाओं का अभाव झेल रहे हैं। स्थानीय निवासी मदन सिंह राणा बताते हैं कि उनकी बस्ती में पीने के पानी का इंतजाम तक नहीं हैं। जिस वजह से पड़ोसी गांव पर निर्भर रहना पड़ता है। जोशीमठ के पूर्व ब्लाॅक प्रमुख प्रकाश रावत कहते हैं कि पैंग-मुरंडा के आसपास सुरक्षित जमीन नहीं थी, इसलिए उन्हें करीब 25 किमी दूर बसाया गया। कृषि भूमि के बदले जमीन या मुआवजा भी नहीं दिया गया। अभी भी लोग असुरक्षित घोषित गांव में रह रहे हैं।

जोशीमठ तहसील मुख्यालय के ठीक सामने अलकनन्दा नदी के दूसरी तरफ स्थित है, गांव का नाम हैं चाईं। 150 परिवारों और करीब 700 की जनसंख्या वाला यह गांव 1993 से पहले एक भरा-पूरा गांव था, जब तक कि यहां जय प्रकाश पावर वेंचर्स लिमिटेड कंपनी ने 400 मेगावाट की विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना का निर्माण शुरू नहीं किया था। चाईं गांव के लिए संघर्ष करने वाले अतुल सती कहते हैं, बिजली परियोजना का काम शुरू हुआ तो गांव के पास बने निकासी क्षेत्र से विस्फोट करने के लिए इस्तेमाल किये गये बारूद के साथ सुरंग का मलबा बाहर छोड़ा जाने लगा। इस मलबे ने सबसे पहले गांव के मवेशियों को प्रभावित किया।

बारूद सनी घास से पशु बीमार पड़ने लगे। गाय, भैंस और बकरियों के बच्चे पेट में ही मरने लगे। कुछ ही समय में पशुधन लगभग समाप्त हो गया। गांव के ठीक नीचे बड़ी-बड़ी सुरंग बनने से जमीन का पानी सूखने लगा। जमीन बंजर हो गई और फल और सब्जियों को उत्पादन बहुत कम हो गया। सती कहते हैं कि जोशीमठ के आसपास के कदम, टिंगणी, सेमा जैसे दर्जनों दूसरे गांव भी ऐसी ही स्थिति का सामना कर रहे हैं।

चाईं गांव के पुष्कर सिंह चौहान कहते हैं, जब तक परियोजना बन रही थी, तब तक कुछ पता नहीं चला। 2006 में बिजली उत्पादन शुरू हुआ और 2007 में जमीन खिसकने लगी। प्रशासन से शिकायत की तो 22 परिवारों को खतरे में माना गया और उन्हें जोशीमठ की नीचे मारवाड़ी में प्रति परिवार 250 वर्ग मीटर जमीन की गई। 3.35 लाख मुआवजा और 25 हजार रुपये आपदा मद में देने की बात हुई। केवल 10 परिवारों ने जमीन और पैसा लिया। हमने और बाकी 11 परिवारों ने मना कर दिया। इतनी जमीन और इतने पैसे में हमारे परिवार के लायक मकान नहीं बन सकता था। खेती की जमीन का मुआवजा देने की भी कोई बात नहीं थी। एक अन्य प्रभावित नरेन्द्र सिंह बिष्ट के अनुसार मकान और जमीन अब भी लगातार धंस रहे है। तेज बारिश होते ही घबराहट शुरू हो जाती है। गांव के नीचे से भी जमीन खिसक रही है और ऊपर से भी।

वहीं, गांव छोड़कर मारवाड़ी में आकर रह रहे परिवार यहां अव्यवस्थाओं से परेशान हैं। मारवाड़ी की चाईं कालोनी में रह रहे 10 परिवारों की अपनी समस्या हैं। बस्ती में रह रहे बांकेलाल कहते हैं, यहां मकान बनाने को थोड़ी सी जगह मिली, लेकिन जो 3.65 लाख रुपये मिले, उससे रहने लायक घर बनाना संभव नहीं था, किसी तरह पैसे की व्यवस्था करके रहने लायक बनाया। गांव की जमीन छोड़ना संभव नहीं, क्योंकि गुजारे की और कोई व्यवस्था नहीं है। बीच-बीच में गांव जाकर खेती करते हैं, हालांकि अब पहले जैसी उपज नहीं होती।

पुनर्वास की विफलता पर जब लगातार उंगली उठ रही थी तो सरकार ने 31 दिसंबर 2021 को पुनर्वास नीति में संशोधन कर दिया। इस संशोधित नीति की खास बात यह है कि विस्थापन हेतु भूमि का चयन के जंगल की जमीन का प्रस्तव भी शामिल कर लिया गया है। संशोधित नीति में कहा गया है, “जहां आवश्यकता हो वहां परिवारों के विस्थापन हेतु वन विभाग की भूमि हस्तांतरण की कार्रवाई की जाए एवं विस्थापित परिवारों की संवेदनशील व अनुपयोगी (असुरक्षित) भूमि वन विभाग को हस्तांतरित की जाए। इसके अलावा संशोधित नीति में तीन लाख की बजाय चार लाख रुपए देने की बात कही गई है। साथ ही, अगर किसी विस्थापति को शहर में जगह दी जाती है तो 100 वर्ग गज ही जगह दी जाएगी।

दरअसल राज्य सरकार की सबसे बड़ी समस्या यही है कि उसके पास पुनर्वास के लिए सुरक्षित जमीन ही नहीं है। केदारनाथ विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक मनोज रावत कहते हैं कि पुनर्वास के लिए सरकार के पास पर्याप्त जमीन नहीं है। यही वजह है कि आपदा ग्रस्त गांवों की पहचान होने के बावजूद पुनर्वास का काम काफी धीमी गति से चल रहा है। इसके अलावा जमीन देने के बाद सरकार चाहती है कि लोग घर खुद बनाएं। इसके लिए तीन लाख की बजाय चार लाख रुपए कर दिया गया है, लेकिन पिछले कुछ सालों मे लगातार महंगाई बढ़ रही है।

पहाड़ों में निर्माण सामग्री वैसे ही मैदानी इलाकों के मुकाबले ज्यादा महंगा पड़ती है, इसलिए इस रािश को और बढ़ाना चाहिए। वहीं, पलायन एक चिंतन नामक संस्था के संयोजक रतन सिंह असवाल कहते हैं कि उनकी संस्था ने कुछ समय पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के समक्ष यह मुद्दा उठाया था कि पुनर्वास के लिए वन भूमि को इस्तेमाल में लाया जाए। रावत ने उनकी बात मान ली थी। अब यह प्रस्ताव नीति में शामिल तो कर लिया गया है, लेकिन अभी तक पुनर्वास की दिशा में कोई खास तेजी नहीं आई है। सवाल यह भी है कि कब तक गांव उजड़ते रहेंगे और हम उनके लिए पुनर्वास नीति बनाते रहेंगे।

दोषी कौन

लेकिन पहले यह जानना जरूरी है कि उत्तराखंड के पहाड़ दरक क्यों रहे हैं? उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं में भूकंप, भूस्खलन, बादल फटना, अतिवृष्टि, अचानक बाढ़, बाढ़, हिमस्खलन, सूखा, आकाशीय बिजली, शीत लहरों, ओलावृष्टि, वनाग्नि जैसी घटनाओं को शामिल किया जाता है। लेकिन क्या इन आपदाओं को प्राकृतिक आपदा कहना सही है? इस पर जानकार अकसर नाराज हो जाते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि प्रकृति में आ रहे बदलाव के लिए ही जब इंसान दोषी हैं तो उसे मानव जनित क्यों नहीं कहा जाना चाहिए? हिमालयी राज्य उत्तराखंड प्राकृतिक खतरों की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है।

भूगर्भ विज्ञानी एसपी सती कहते हैं कि बेशक कवियों ने हिमालय को अटल और दृढ़ता का प्रतीक बताया है, लेकिन हकीकत यह है कि हिमालय अत्यंत भंगुर पर्वतमाला है। यह विश्व की सर्वाधिक शिशुवत श्रेणियां हैं और हिमालय के बनने की प्रक्रिया अब भी निरंतर जारी है। इसके चलते यहां भूगर्भीय हलचलें होती रहती हैं। जिसे भूकंप कहा जाता है। उत्तराखंड भारत के भूकंप जोन मैप के जोन चार और पांच में आता है। इसके अलावा मौसमी घटनाओं की वजह से भूस्खलन, बाढ़, हिमस्खलन होता है और लोगों को भारी नुकसान होता

ग्राफिक डाउन टू अर्थ

है। मौसमी घटनाओं से आशय जलवायु परिवर्तन से है।

जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से हिमालय को बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेंट चेंज (आईपीसीसी) ने 2007 में हिमालय में बढ़ती गर्मी को लेकर चेताया था। आईपीसीसी ने अंदेशा जताया था कि यदि तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो 2035 तक हिमालय के सभी ग्लेशियर पिघल जाएंगे। हालांकि तब ही भारत सरकार ने इसका खंडन किया था, लेकिन इसके बाद से हिमालय को लेकर चिंता और अध्ययनों का सिलसिला बढ़ता चला गया।

हिमालय के अन्य राज्यों की तरह उत्तराखंड भी जलवायु परिवर्तन के नजरिए से संवेदनशील है। कुछ समय पहले आए एक अध्ययन में कहा गया कि साल 2021-2050 के बीच उत्तरखंड का औसत अधिकतम तापमान 1.6-1.9 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। जर्मनी की संस्था पोट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट रिसर्च (पीआईके) और भारत की संस्था द एनर्जी एन्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) ने मिल कर यह अध्ययन “लॉक्ड हाउसेज, फैलो लैंड्स: क्लाइमेट चेंज एंड माइग्रेशन इन उत्तराखंड, इंडिया” किया। इस अध्ययन रिपोर्ट में उत्तराखंड में बारिश को लेकर अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2021-2050 के बीच राज्य में होने वाली वार्षिक वर्षा के 6 से 8 फीसदी बढ़ने का अनुमान है। राज्य के दक्षिणी जिलों ऊधम सिंह नगर, नैनीताल, चम्पावत और पौड़ी-गढ़वाल में निकट भविष्य में वर्षा की वार्षिक औसत मात्रा के राज्य के अन्य भागों की तुलना में सबसे अधिक रहने का अनुमान है।

एक ओर जहां राज्य में तापमान बढ़ रहा है, वहीं ग्लेशियर पिघलने की दर भी तेजी से बढ़ रही है। साथ ही बेमौसमी अतिवृष्टि की घटनाओं ने आग में घी का काम किया है। साल 2021 के अक्टूबर महीने में जब मॉनसून विदाई कर चुका था, इतनी ज्यादा बारिश हुई कि 76 लोगों की जान चली गई और घरों व खेतों का नुकसान हुआ था, सो अलग। एक अक्टूबर से 21 अक्टूबर 2021 के बीच पूरे राज्य में इस अवधि के लिए सामान्य से 6 गुना अधिक बारिश हुई। 18 अक्टूबर को राज्य में सामान्य से 14 गुना बारिश हुई।

राज्य के जिलों में चंपावत में सबसे अधिक 115.6 मिमी बारिश हुई, जो उस दिन की सामान्य बारिश का 21 गुना थी। उसके बाद 19 अक्टूबर को बारिश और बाढ़ कई गुना बढ़ गई। उस दिन राज्य में आमतौर पर होने वाली बारिश से सौ गुने से भी ज्यादा बारिश हुई। नैनीताल जिले में तो रिकार्ड लगभग 280 मिमी बारिश हुई, जो औसतन होने वाली 1.1 मिमी बारिश से लगभग 250 गुना ज्यादा थी। अक्टूबर में बारिश का सिलसिला 2022 में भी जारी रहा। एक अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2022 तक राज्य में सामान्य से 324 प्रतिशत अधिक बारिश हो चुकी है।

बागेश्वर में 818 प्रतिशत, अल्मोड़ा में 787 प्रतिशत, ऊधम सिंह नगर में 627 प्रतिशत, नैनीताल में 592 प्रतिशत अधिक बारिश हो चुकी है। बीते मॉनसून सीजन एक जून से 30 सितंबर के दौरान राज्य में सामान्य से तीन फीसदी कम बारिश हुई थी। एसपी सती कहते हैं कि अन्य राज्यों की तरह उत्तराखंड में भी बारिश के दिन कम हो रहे हैं, लेकिन अतिवृष्टि वाले दिन बढ़ रहे हैं, जो आपदा का कारण बन रहे हैं। आठ साल पहले दिल्ली से वापस अपने गांव लौटकर खेती-किसानी कर रहे सुधीर सुंदरियाल भी कहते हैं कि राज्य में बारिश की प्रवृत्ति ही बदल गई है। जब बारिश होनी चाहिए, तब नहीं हो रही है और जब नहीं होनी चाहिए, तब बहुत ज्यादा बारिश हो रही है। इस साल भी उनको फसल का नुकसान हुआ है। राज्य में बादल फटने की घटनाएं भी बढ़ी हैं। विशेषज्ञ पहाड़ी इलाकों में बढ़ते तापमान को इसकी वजह बताते हैं।

लेकिन क्या मौसमी घटनाओं को दोषी मानते हुए स्थानीय लोगों को आपदाओं के भरोसे छोड़ देना चाहिए? भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के निदेशक रह चुके उत्तम सिंह रावत कहते हैं कि अतिवृष्टि या मौसमी घटनाओं का बहाना बना कर सरकारें जनता को गुमराह करती हैं। जबकि एक ओर सरकार की विकास नीति खराब है, दूसरी ओर आपदा प्रबंधन के प्रति सोच नहीं है। मैरीलैंड विश्वविद्यालय में जलवायु वैज्ञानिक रघु मुतुर्गुडडे कहते हैं कि प्रकृति हमें बारिश देती है, लेकिन हम भूमि-उपयोग में परिवर्तन (लैंड यूज चेंज) करके बारिश को बाढ़ में बदल देते हैं।

तो एसपी सती कहते हैं कि राज्य के गठन के बाद विकास के नाम पर जहां बांधों की संख्या में तेजी आई, वहीं सड़कों के अंधाधुंध निर्माण ने एक बड़ी समस्या खड़ी कर दी। वर्ष 2000 में राज्य के गठन से पहले उत्तराखंड में सिर्फ 8,000 किलोमीटर सड़कें थी, लेकिन अब सड़कों की यह लंबाई 40 हजार किलोमीटर से अधिक हो चुकी है। सती के मुताबिक पहाड़ों में एक किलोमीटर सड़क बनाने में 20 से 60 हजार घन मीटर मलबा पैदा होता है तो इस तरह केवल सड़क निर्माण से राज्य में लगभग दो अरब घन मीटर मलबा पहाड़ी ढलानों पर डाला जा चुका है, जिससे पहाड़ों की वनस्पतियों को भारी नुकसान पहुंचा है।

नदियों में भी मलबे की मात्रा में कई गुणा वृद्धि हो चुकी है, जिस वजह से जब नदियों में सैलाब आता है तो यह मलबा बड़े नुकसान की वजह बनता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण ( एनजीटी) के आदेश पर जिलावार पर्यावरण प्लान बनाया गया है। चमोली जिले के प्लान में जल विद्युत परियोजनाओं को पहाड़ को खतरों और चार धाम परियोजना से भविष्य में बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं बढ़ने की आशंका जताई गई है।

लेकिन इससे उलट राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने केंद्र सरकार से जल विद्युत परियोजनाओं को चालू करने की मांग की है। उल्लेखनीय है कि विभिन्न आपत्तियों के चलते गंगा और उसकी सहायक नदियों पर प्रस्तावित और निर्माणाधीन 24 बड़ी बिजली परियोजनाओं पर अंतरिम रोक लगी हुई है। डाउन टू अर्थ ने 2015 के बाद से राज्य में आई आपदाओं, गांवों का विस्थापन और जल विद्युत परियोजनाओं का विश्लेषण किया तो पाया कि जिन जिलों में परियोजनाएं अिधक हैं, वहीं आपदाएं भी ज्यादा आ रही हैं और गांवों का विस्थापन भी अधिक हो रहा है। (देखें, “त्रासद भरा विकास”,)।

अब उसी सवाल पर फिर से लौटते हैं कि खंड-खंड होते उत्तराखंड को कैसे बचाया जाए। हिमालयी राज्यों में जलवायु परिवर्तन के तीव्र असर को देखते हुए यूनाइटेड नेशंस डेवलेपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) के निर्देशन में देहरादून में राज्य जलवायु परिवर्तन केन्द्र (एससीसीसी) की स्थापना की गई है। वर्ष 2017 में एससीसीसी के सुझाव पर तत्कालीन राज्य सरकार ने 66 विभागों को अपने कुल बजट की एक प्रतिशत राशि जलवायु परिवर्तन संबंधी कार्यों में खर्च करने के आदेश दिये थे। लेकिन, इस आदेश पर किसी विभाग ने अमल नहीं किया।

बाद में नई सरकार ने इस आदेश को यह कहकर वापस ले लिया कि जलवायु परिवर्तन के मामले में कोई नई व्यवस्था की जाएगी, हालांकि अब तक यह नई व्यवस्था नहीं हो पाई है। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अधिशासी निदेशक पीयूष रौतेला कहते हैं कि आपदाओं की वजह से उजड़े गांवों को बसाने के लिए सरकार के पास पर्याप्त जमीन और बजट नहीं है। इसलिए हमें यह सोचना होगा कि आपदाओं की संख्या कैसे घटाई जाए और नुकसान को कैसे कम किया जाए। इसके लिए नीति, नियमों से ज्यादा जरूरी मनोवैज्ञानिक बदलाव लाने होंगे। (पढ़ें: केवल नीति-नियम बनाने से नहीं चलेगा काम)।

दिक्कत यह भी है कि राज्य में जलवायु परिवर्तन की बात हो या आपदाओं का विश्लेषण सरकारें वैज्ञानिक अध्ययनों को अनदेखी करती है। नवीन जुयाल और एसपी सती दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं। जुयाल कहते हैं कि सरकार को स्वतंत्र शोधकर्ताओं के अध्ययनों को गंभीरता से लेना चाहिए। पढ़ें: उत्तराखंड को बचाने के लिए समर्पित और ईमानदार वैज्ञानिक हस्तक्षेप की आवश्यकता

वहीं, राज्य के मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक विक्रम सिंह कहते हैं कि सही समय पर मौसम के पूर्वानुमान से आपदाओं का नुकसान कम हो सकता है और आपदा प्रबंधन बेहतर हो सकता है। वह कहते हैं कि स्थानीय स्तर पर चरम मौसमी घटनाओं का सबसे सटीक अनुमान डॉप्लर वेदर राडार से ही संभव है। अभी तक राज्य में सिर्फ एक ही राडार मुक्तेश्वर में थी, लेकिन सुरकंडा में लगाई गई डॉप्लर वेदर राडार से सूचनाएं मिलनी शुरू हो गई हैं, जबकि राज्य में कम से 6 और डॉप्लर वेदर राडार लगाने की जरूरत है।

अब देखना है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों के बीच पहाड़ों पर रह रहे लोगों को बचाने के लिए राज्य और केंद्र सरकार क्या कदम उठाती हैं?

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