2022: आंदोलनों में नेतृत्व की भूमिका में रही महिलाएं

2022 में दर्जनभर से ज्यादा बड़े जनांदोलन हुए उत्तराखंड में

त्रिलोचन भट्ट

2022 का वर्ष उत्तराखंड एक बार फिर आंदोलनों के नाम रहा। ऐसी परिस्थितियों में जबकि केन्द्र और राज्य में बैठी सरकारें किसी भी आंदोलन को कुचलने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा देती हैं, ऐसे में जन आंदोलनों की भूमि उत्तराखंड में विभिन्न मुद्दों पर लोगों का सड़कों पर उतरना संतोष देता है। कहा, जाता है कि सड़कें सूनी हो जाएंगी तो संसद आवारा हो जाएगी। एक तरह से उत्तराखंड के जन मानस ने इस वर्ष भी संसद को आवारा होने से बचाने में अपना भरपूर सहयोग दिया। कहना न होगा कि एक बार फिर राज्य में आंदोलनों की अगुवाई महिलाओं के हाथ रही। कुछ आंदोलन तो ऐसे भी हुए, जिनमें सिर्फ महिलाएं ही नजर आई। चमोली जिले के थराली ब्लॉक स्थित जबरकोट में स्टोन क्रशर के खिलाफ चल रहा आंदोलन इसका उदाहरण है।

इस वर्ष यूं तो राज्य के अलग-अलग हिस्सों में लगातार आंदोलन होते रहे। लेकिन कुछ आंदोलन बेहद खास रहे, जिनमें महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। अंकिता हत्याकांड के राज्यव्यापी आंदोलन से पहले इस वर्ष उत्तराखंड में हेलंग आंदोलन सबसे जोरदार तरीके से चला। चमोली जिले के हेलंग का एक वीडियो जुलाई के महीने पर सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इस वीडियो में हेलंग-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना की सुरक्षा में तैनात केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल और स्थानीय पुलिस के जवान महिलाओं की पीठ पर लदा घास का गट्ठर छीनते नजर आये। जिस महिला के साथ यह बदसलूकी की गई उनका नाम हेलंग गांव की मंदोदरी देवी बताया गया।

पूरे उत्तराखंड में इस वीडियो का लेकर हलचल हुई। इसे उत्तराखंड में महिलाओं की अस्मिता पर हमला माना गया। पहले राज्यभर में जगह-जगह आंदोलन हुए और फिर 24 जुलाई को राज्यभर से लोग हेलंग में एकत्रित हुए। उत्तराखंड आंदोलन में अग्रणी भूमिका में रही उत्तराखंड महिला मंच ने पूरे हेलंग आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खासकर देहरादून, नैनीताल और हल्द्वानी में महिला मंच से जुड़ी महिलाओं की सक्रियता ने इस आंदोलन को हवा दी। हालांकि राज्य के तमाम अन्य जन सरोकारों से जुड़े संगठनों ने भी इस आंदोलन में हिस्सेदारी की। दो बार हेलंग चलो का सफल आयोजन हुआ। कुमाऊं कमिश्नरी का घेराव किया किया और देहरादून में भी गढ़वाल कमिश्नर कार्यालय पर महिलाओं की अगुआई में प्रदर्शन किया गया।

अंकिता हत्याकांड में भी राज्यभर में चलाए गये आंदोलन में महिलाएं अग्रणी भूमिका में रही। ऋषिकेश में यूकेडी और अन्य संगठनों से जुड़ी तमाम महिलाएं हत्याकांड के बाद से ही लगातार सड़कों पर रही। पुलिस से भिड़ी, गिरफ्तार हुई और फिर लंबा धरना भी चला। इस धरने में महिलाएं रात-दिन धरना स्थल पर जुटी रही। अंकिता मामले को लेकर देहरादून में भी हुए धरने-प्रदर्शनों में भी महिलाओं की भूमिका अग्रणी रही। खासकर 2 अक्टूबर को राज्यव्यापी बंद के दौरान दून की सड़कों पर उमड़े हुजूम में महिलाओं की संख्या उल्लेखनीय रही। उत्तराखंड महिला मंच की पहल पर बाद में देशभर के महिला संगठनों की एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने अंकिता हत्याकांड से जुड़े तमाम पहलुओं की जांच की। ये टीम घटनास्थल पर भी गई, अंकिता के माता-पिता से भी मिली और इस मामले से जुड़े तमाम अधिकारियों से भी। हाल ही में इस टीम की रिपोर्ट नैनीताल में जारी कर दी गई है।

इस वर्ष राज्य में एक ऐसा आंदोलन भी हुआ, जिसे पूरी तरह महिलाओं ने चलाया। आंदोलन अब भी चल रहा है। चमोली जिले के थराली ब्लॉक के जबरकोट में गांव वालों की सहमति के बिना एक स्टोन क्रशर लगाया जा रहा है। गांव की महिलाओं ने इस स्टोन क्रशर के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर दिया। महिलाओं का कहना था कि गांव के पास स्कूल के ठीक नीचे लगाये जा रहे इस स्टोन क्रशर से गांव की हवा खराब होगी, लोग टीबी और केंसर जैसी बीमारियों की चपेट में आएंगे और गांव वालों की खेती भी बर्बाद होगी। सत्ता प्रतिष्ठान की तरफ से इन महिलाओं को डराने-ध्मकाने के खूब प्रयास किये गये। अंकिता हत्याकांड में राजस्व पुलिस क्षेत्र बताकर हाथ खींचने वाली पुलिस जबरकोट के राजस्व क्षेत्र होने के बावजूद गांव में घुस गई। महिलाओं पर मुकदमे दर्ज किये। लेकिन, इन महिलाओं ने उस समय प्रशासन को आइना दिखाया, जब थराली एसडीएम कोर्ट में जमानत करवाया कर बाहर निकली और अंकिता हत्याकांड के विरोध में धरने पर बैठ गई।

राजधानी देहरादून में पेड़ काटने के खिलाफ इस वर्ष कई आंदोलन हुए। सहस्रधारा रोड और मोहंड में बडी संख्या में पेड़ काटे गये। दोनों जगहों पर आंदोलन हुए और दोनों जगहों पर महिलाओं, खासकर छात्राओं की उपस्थिति अन्य लोगों से ज्यादा रही। पेड़ बचाने के इन आंदोलनों में बड़ी संख्या में छात्राएं पेड़ों से लिपटती और पुलिस से उलझती नजर आई। कई बार तो पुलिस से दो-दो हाथ करती युवतियों के वीडियो भी नजर आये। इस तरह के आंदोलनों में युवतियों की भागीदारी ने आश्वास्त किया कि बढ़ती उम्र की राज्य आंदोलनकारी महिलाओं की जगह लेने के लिए अब नई उम्र की लड़कियां सामने आ रही हैं और मातृशक्ति के संघर्ष से मिला यह प्रदेश आने वाले समय में भी मातृशक्ति के नेतृत्व का लाभ उठाता रहेगा।

 

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