जोशीमठ अकेला नहीं दरकने वाला

भूवैज्ञानिक डॉ. एस.पी. सती के साथ त्रिलोचन भट्ट की बातचीत

जोशीमठ के भूधंसाव के बाद इसे लेकर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। कई भूवैज्ञानिक इस शहर के स्थायित्व के लेकर बात रख रहे हैं कि तमाम टीवी चैनल इन जोशीमठ की दरारों में सनसनी तलाश रहे हैं। जोशीमठ के लोगों पर इन सब बातों का ज्यादा फर्क नहीं पड़ रहा। जोशीमठ के लोगों की चिंता उनके टूटते हुए घर हैं। उनकी चिंता यह है कि तमाम उम्र मेहनत करके बसाया गया घर टूट जाएगा तो उनकी आगे की जिंदगी का क्या होगा। आशाओं और निराशाओं के बीच जोशीमठ के लोग हर रोज तहसील कार्यालय पर जाकर धरना देते है।ं शाम को लौट आते हैं।

जोशीमठ की जमीनी हकीकत जानने के बाद मैनें देहरादून आकर भू-वैज्ञानिक डॉ. एस.पी. सती के साथ जोशीमठ के मौजूदा हालात को लेकर बातचीत की। डॉ. सती भू वैज्ञानिकों की उस स्वतंत्र टीम में शामिल थे जिसने कुछ महीने पहले जोशीमठ जाकर वहां हो रहे धंसाव की जांच की थी। इस कमेटी ने यह जांच जोशीमठ के लोगों के आग्रह पर की थी। जांच रिपोर्ट जोशीमठ की जनता को सौंपी गई थी और यह रिपोर्ट बाद में सरकार को भेजी गई थी। बाद के दिनों में सरकार ने उत्तराखंड आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के हेड डॉ. पीयूष रौतेला के नेतृत्व में एक टीम जोशीमठ भेजी और इस टीम की जांच रिपोर्ट को भी सरकार को सौंपा गया। डॉ. सती के साथ बात बोलेगी ने इन तमाम मसलों पर बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ अंश।

प्रश्न : आप भू वैज्ञानिकों की उस टीम के सदस्य रहे हैं जिसने जोशीमठ में भूधंसाव की शुरुआती जांच की थी। क्या था उस रिपोर्ट में और आखिर ऐसा क्या हुआ सरकार ने उस रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया?
उत्तर : नहीं उसमें नजर अंदाज करने जैसी कोई बात नहीं थी। हम लोग जोशीमठ के स्थानीय लोगों के कहने पर जांच करने गए थे और इस जांच में हमारी जो फाइंडिंग थी, वही लगभग लगभग सरकारी जांच समिति की फाइंडिंग भी थी। हमने अपनी जांच में यह नहीं कहा था कि भूधंसाव इस कारण से हो रहा है, बल्कि यह कहा था कि यह भूधंसाव इस कारण से हो रहा है या नहीं इसकी जांच की जाए। हमारी जांच के बाद सरकार को चाहिए था कि एक जांच कमेटी भेजे और जो संभावनाएं हमने दर्ज हैं उनकी जांच करे कि वह सच है या नहीं और सरकार ने वही किया।

प्रश्न : बताया गया है कि सरकारी रिपोर्ट में एनटीपीसी की उस टनल का जिक्र तक नहीं है जिसे जोशीमठ के धंसाव का कारण माना जा रहा है। उस रिपोर्ट में सिर्फ ड्रनेज की समस्या की बात की गई है।
उत्तर : ड्रेनेज भी वहां एक बड़ी समस्या है। दरअसल जोशीमठ भूस्खलन के मलबे पर बसा हुआ है। यहां एक कन्फ्यूजन यह है कि कुछ लोग इसे ग्लेशियल मोरेन पर बसा हुआ बताते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। यह एक पुराने भूस्खलन का मलबा है। जाहिर है अंदर से खोखला है। ड्रेनेज की समस्या बड़ी समस्या है। जोशीमठ में ही नहीं, पहाड़ के हर शहर और हर कस्बे की यह समस्या है। जमीन के अंदर गड्ढे बनाकर जल निकासी की गई है। जहां तक टनल की बात है तो 2009 में पहली बार एनटीपीसी टनल बोरिंग मशीन फंस गई थी। 2015 में एक जर्मन वैज्ञानिक का इस बारे में पर्चा आया था। उस पर्चे में कहा गया था कि जहां यह मशीन फंसी है, वह मिट्टी दो पहाड़ों के टकराव के कारण भुरभुरी हो गई है। होना यह चाहिए था कि जहां वह गुफा बनी है, जहां से पानी रिस रहा है, उसका ट्रीटमेंट किया जाता, लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसा किया गया है।

प्रश्न : कारण सिर्फ टीबीएम है या कुछ और भी हो सकता है?
उत्तर : टनल बनाते समय विस्फोटकों का भारी मात्रा में इस्तेमाल किया जा रहा है। चाहे वह हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के लिए बनाई जा रही टनल हैं या ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल लाइन की। जब विस्फोट होता है तो आसपास का पूरा क्षेत्र बुरी तरह हिल जाता है। श्रीनगर जैसे शहर में भी यही हाल हैं। टनल बोरिंग मशीन इसीलिए होती है कि बिना विस्फोट किए टनल बनाई जा सके। लेकिन, जब मशीन ही फस गई तो जाहिर है वहां विस्फोट किए जा रहे होंगे। परियोजनाओं की टनल बनाने के लिए विस्फोटकों का किस तरह इस्तेमाल किया जाता है जोशीमठ के सामने का चाईं गांव इसका उदाहरण है। विष्णुगाड परियोजना के लिए इस गांव के अंदर टनल बनाई गई और इतने विस्फोट किए गए चाईं गांव का पूरा क्षेत्र धंस गया और आज भी यह गांव पूरी तरह असुरक्षित है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन पर भी इसी तरह विस्फोटकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। अनकंट्रोल्ड विस्फोट एक बड़ी समस्या है। परियोजना निर्माताओं को लगता है कि जमीन के अंदर विस्फोट करेंगे तो किसी को पता नहीं चलेगा, लेकिन वास्तव में धरती के ऊपर रहने वालों को सब कुछ पता चलता रहता है। बात बोलेगी के एक वीडियो में 2 जनवरी की रात के जोशीमठ के नीचे कोई बड़ा विस्फोट किये जाने की आशंका जताई गई है। मैं इस आशंका से पूरी तरह से सहमत हूं।

प्रश्न : आपने कहीं लिखा है कि जोशीमठ के अलावा उत्तराखंड में कई और जगह हैं जो इसी तरह धंस सकती हैं। यह मामला क्या है?
उत्तर : हां ऐसी कई जगह हैं। दरअसल वहां की परिस्थितियां ठीक वैसी हैं जैसे जोशीमठ की हैं। सबसे प्रमुख समस्या अर्बन ड्रेनेज सिस्टम का न होना है। हमने नगर बसाने के नाम पर प्राकृतिक ड्रेनेज सिस्टम का भी गला घांट दिया, जो जोशीमठ जैसी समस्याओं का कारण कारण बन सकते हैं। जोशीमठ जैसी परिस्थिति वाले अन्य नगरों की बात करें तो चमोली का जिला मुख्यालय गोपेश्वर, पौड़ी जिला मुख्यालय, श्रीनगर का ऊपर वाला हिस्सा, अगस्तमुनि का ऊपरी हिस्सा, गुप्तकाशी, ऊखीमठ, पोखरी, कर्ण्ाप्रयाग का ऊपर का हिस्सा, नैनीताल का एक बड़ा हिस्सा, धारचूला और दूसरी भी कई ऐसी जगह हैं जिन पर जोशीमठ जैसा खतरा मंडरा रहा है

प्रश्न : आप एक एक्टिविस्ट भी हैं। जोशीमठ का अब क्या होगा, क्या जोशीमठ बचाया जा सकता है और वहां के लिए सरकारी स्तर पर क्या करने की जरूरत है? भूवैज्ञानिक और एक्टिविस्ट होने के नाते आप क्या महसूस करते हैं?
उत्तर : दोनों की नजरिये से खुद को असहाय महसूस करता हूं। जहां तक भूवैज्ञानिक नजरिये की बात है, मुझे नहीं लगता जोशीमठ को हम बचा पाएंगे। जब पूरा अर्थ मैटेरियल खिसक रहा हो तो कहां तक बचाएंगे। जो घर टूट गए हैं, वे तो दुबारा बनेंगे नहीं। अन्य जगहों पर भी ऐसी ही नौबत आ सकती है। एक्टिविस्ट के नजरिये से बात करें तो मैं चाहता हूं कि जोशीमठ के लोगों को किसी अन्य जगह पर विस्थापित किया जाए। हर तरह की सुविधाएं लोगों का वहां पर उपलब्ध करवाई जाएं। हालांकि मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ हो पाएगा। उत्तराखंड में सरकारी सूची में करीब 500 और गैर सरकारी सूचियों में 3000 से ज्यादा ऐसे गांव हैं जिनका पुनर्वास किया जाना है। लेकिन, सरकार के पास जमीन नहीं है। ऐसे में जोशीमठ की बड़ी आबादी को किसी अन्य जगह बसाना इतना आसान नहीं होगा। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि मैं खुद को असहाय महसूस कर रहा हूं।

 

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