जोशीमठ वालों को संभालने की जरूरत

आपदा का असर लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर

Trilochan Bhatt

 

या साल शुरू हुए आज 9 दिन हुए हैं। मैं उत्तराखंड में चमोली जिले के सुदूर जोशीमठ में हूं। वही जोशीमठ जो लगातार दरक रहा है, धंस है, जमींदोज हो रहा है। जोशीमठ में इन दिनों सरकारी अधिकारियों का डेरा है। सुरक्षा और बचाव एजेंसियों का डेरा है और टीवी चैनलों के नुमाइंदों का डेरा है। घरों की दीवारों, फर्स और छतों की लगातार चौड़ी होती दीवारें दिखाई जा रही हैं, घर खाली करते जोशीमठ की लोगों को आप टीवी पर देख रहे हैं, चीखते-चिल्लाते टीवी एंकर लगातार सनसनी फैला रहे हैं, कुछ चैनल घर टूटने से निराश रोते-बिलखते लोगों को दिखा रहे हैं। प्रयास है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा सनसनी फैलाई जाए और कैसी ज्यादा से ज्यादा टीआरपी बटोरी जाएं। जोशीमठ के बहाने टीवी चैनल जमकर टीआरपी बटोर रहे हैं। प्रभावित लोगों के मुंह में माइक को घुसेड़कर, ‘अब क्या करेंगे’ टाइप बेहूदा प्रश्न पूछे जा रहे हैं, लेकिन जो वास्तव में सबसे जरूरी है, उस मुद्दे को छुआ नहीं जा रहा है। जोशीमठ धंसने की वजहों पर सिर्फ फौरी नजर डाली जा रही है और यह फौजी नजर भी बेहद उथली है।

फिलहाल मैं जोशीमठ में हूं और मुझे लगता है कि जोशीमठ के लोगों के साथ खड़े होने की जरूरत है, उन्हें मानसिक रूप से संभालने की जरूरत है, उन्हें यह विश्वास दिलाने की जरूरत है जिंदगी यहीं खत्म नहीं हो रही? बल्कि आगे एक और जिंदगी, एक और शानदार जिंदगी उनका इंतजार कर रही है, उन्हें काउंसलिंग चाहिए, उजड़ते लोगों की मानसिक स्थिति बेहद खराब है, जिनके घर टूट गये हैं वे उनकी समझ में नहीं आ रहा कि आगे क्या करें। जिनके घर अभी ठीक हैं, उन्हें चिन्ता है कि न जाने कब उनके घर में दरार नजर आ जाए। ठंडी-लंबी रातों में जोशीमठ रातभर सो नहीं पा रहा है।

टूट गया लेकिन घर तो धर ही है।

9 जनवरी की सुबह 11ः00 बजे जोशीमठ पहुंचकर शाम 6ः00 बजे तक मैंने सैकड़ों लोगों से बात की। उन लोगों से भी जिनके घर टूट चुके है,ं उन लोगों से भी जिनके घरों में हल्की दरारे हैं और लोगों से भी जिनके घर अब तक सुरक्षित हैं। मैंने महसूस किया कि जोशीमठ का हर व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान है। वार्ड नंबर 7 सुनील में मुझे एक दुर्गा प्रसाद सकलानी और उनका परिवार मिला। उनका घर बुरी तरह से टूट चुका है और असुरक्षित घोषित किया गया है। यह परिवार तरफ लगातार आने वाले लोगों से परेशान है तो दूसरी तरफ सुरक्षा एजेंसियों के लोगों से, जो बार-बार आकर हिदायतें दे रहे हैं। फोन की घंटी बजते ही वे चिड़चिड़ा जाते है। दुर्गा प्रसाद सकलानी के तीन भाइयों के परिवार में 14 लोग हैं। प्रशासन ने इन्हें घर से कुछ दूर एक कैफे में रहने के लिए कहा है। कैफे वाले ने तीनों परविारों को एक-एक कमरा दिया है।

सकलानी परिवार रात को सोने के लिए कैफे में चला जाता है और दिन में ये लोग अपने धरकते घर में आ जाते हैं। घर के साथ ही इस परिवार की गौशाला है। जिसमें 14 गायें हैं। घर में खाना बनाने और खाने के अलावा लोग अपने पशुओं की भी देखरेख कर रहे हैं। लेकिन, अधिकारी और पुलिसकर्मी बार-बार यहां आकर लोगों को घर में न आने की हिदायत दे देते हैं। जब मैं इस परिवार के बीच था, इसी दौरान पीडब्ल्यूडी का एक् अधिकारी दो पुलिस वालों के साथ पहुंच गया। लगभग डांटते हुए उसने पूछा, यहां घर में क्या कर रहे हो, फटाफट अपना सामान निकालकर यहां से चले जाओ। सकलानी परिवार के लोग अनुनय-विनय करते रहे कि हम कैफे के एक कमरे में क्या करेंगे, हम दिन में आकर यहां खाना बनाते हैं अपने मवेशियों को देखते हैं और रात को वहां चले जाते हैं। लेकिन पीडब्ल्यूडी का अधिकारी इस बात पर आमादा था की अभी अपना पूरा सामान निकालो और कैफे में चले जाओ।

घर से खदेड़ने पर आमादा प्रशासन और अपनी समस्या बताते लोग।

परिवार के लोगों ने बताया कि पिछले 3 दिनों से बार-बार सरकारी अधिकारी और पुलिस के लोग आकर उन्हें घर में न आनेक के लिए कह रहे हैं। परिवार के लोग सवाल करते हैं कि वे बरसो से जुटाया गिरस्थी का सामान कैफे में कहां रखेंगे? आने वाले दिनों में जोशीमठ में अब बर्फ पड़ने वाली है, बर्फबारी से पहले लगभग 2 महीने का राशन और अन्य जरूरी सामान वे घर में रखते हैं, क्या यह सारा सामान कैफे के एक कमरे में आ पाएगा? उनके बर्तन, बिस्तर, फर्नीचर क्या एक कमरे में आ जाएगा? क्या उनके 14 मवेशी भी कैफे में ही रहेंगे? इन सब सवालों के जवाब अधिकारियों के पास नहीं हैं। बस उनके पास आदेश है, अभी के अभी घर छोड़ दो।

इसके अलावा चैनलों के रिपोर्टर बार-बार लोगों के मुंह में माइक घुसेड़ देते हैं। यह सब अब जोशीमठ के पीड़ितों केे बरदाश्त के बाहर हो चुका है। जैसे कि मैंने कहा, लोग मानसिक रूप से परेशान हो गये हैं। चिड़चिड़े हो गए हैं। कई तरह के मानसिक दबाव के बीच उन्हें यह बुरा वक्त गुजारना पड़ रहा है। मैं लोगों से पूछता हूं कि क्या कोई डॉक्टर यहां आया? जवाब मिलता है कि हां, डॉक्टर आये थे, जो जुकाम, बुखार, पेट दर्द, ब्लड प्रेशर आदि के बारे में पूछ रहे हैं और परेशानी होने पर दवा दे रहे हैं। लेकिन, वास्तव में इस समय जोशीमठ के हर व्यक्ति को मानसिक उपचार की जरूरत है, उन्हें काउंसिलिंग की जरूरत है। उनके साथ खड़े होने की जरूरत है। मैं इस लेख के माध्यम से उत्तराखंड की सरकार से अपील करना चाहता हूं कि जोशीमठ के पीड़ितों के मानसिक स्वास्थ्य की जांच करने और उन्हें जरूरी काउंसलिंग वह मेडिसिन उपलब्ध कराने की सख्त जरूरत है। अधिकारियों को यह समझाने की जरूरत है कि इस तरह से लोगों से पेश न आएं जैसे कि वह पीडब्ल्यूडी का अधिकारी पेश आ रहा था। फिलहाल हम जोशीमठ बचा पाएं या नहीं, जोशीमठ के एक-एक व्यक्ति को बचाने के लिए हम सबको आगे आने की जरूरत है।

सहयोग की अपील

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