हवा-पानी साफ, पर जीवन प्रत्याशा में पीछे उत्तराखंड

एस. राहुल

 

हाल ही में रिजर्व बैंक ने राज्यों के आंकड़ों की एक हैंड बुक जारी की है। इसमें राज्यवार अलग-अलग आंकड़े जारी किए गए हैं। बात बोलेगी ने इन आंकड़ों का विश्लेषण किया तो पाया कि स्वास्थ्य की दिशा में आगे बढ़ने की बजाय राज्य पीछे खिसक रहा है। ज्यादातर मामलों में केरल देश में सबसे आगे है। आगे इसे विस्तार से समझते हैं।

जीवन प्रत्याशा दर

बेशक यह माना जाता हो कि उत्तराखंड में साफ हवा के कारण जीवन काफी स्वस्थ होता है, लेकिन इसके बावजूद जीवन प्रत्याशा दर के मामले में उत्तराखंड नौंवे नंबर पर है। उत्तराखंड की जीवन प्रत्याशा दर 70.6 वर्ष है। जबकि केरल की जीवन प्रत्याशा दर देश में दूसरे नंबर पर है। केरल में लोग औसतन 75.2 साल तक जीते हैं। जबकि दिल्ली सबसे ऊपर है। यहां की जीवन प्रत्याशा दर 75.9 है।

जीवन प्रत्याशा दर का मतलब है कि उस राज्य में लोगों की औसत उम्र क्या है।

जीवन प्रत्याशा दर के मामले में जारी आंकड़े बताते हैं कि 2015 से 2019 के दौरान देश की जीवन प्रत्याशा दर 69.7 वर्ष थी, जिसमें महिलाओं की दर 71.1 और पुरुषों की 68.4 वर्ष थी।यानी कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले 2.7 साल अधिक जीती हैं।

उत्तराखंड की अगर बात करें तो यहां की जीवन प्रत्याशा दर 70.6 है, जबकि हिमाचल प्रदेश की 73.1 है, जम्मू कश्मीर की 74.2 है। महाराष्ट्र की 72.7 पंजाब की 72.8, पश्चिम बंगाल की 72.1 है। इस तरह उत्तराखंड का नंबर सातवां है।

इसकी बड़ी वजह राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को माना जा सकता है। बेशक राज्य में स्वच्छ हवा और स्वच्छ पानी है, लेकिन कुपोषण और समय पर इलाज न मिलने के कारण लोगों को जितना समय जीना चाहिए, उतना वे जी नहीं पाते।

डॉक्टर बढ़ने की बजाय कम हुए

आरबीआई की इसी रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों जैसे, सर्जन, बाल रोग विशेषज्ञ, फिजीशियन आदि के कुल 236 पद स्वीकृत हैं, लेकिन केवल 52 पद ही भरे हैं। 184 पद खाली हैं। मतलब 78 प्रतिशत पद खाली हैं। खास बात यह है कि 2005 में उत्तराखंड में 71 पद भरे थे और 92 खाली थे। यानी कि राज्य में पदों की स्वीकृति तो बढ़ गई, लेकिन डॉक्टर बढ़ने की बजाय कम होते जा रहे हैं।

राज्य के पीएचसी यानी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी 115 डॉक्टरों के पद खाली हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जीवन प्रत्याशा दर के मामले में उत्तराखंड अपने समकक्ष राज्यों से क्यों पिछड़ा हुआ है।

मृत्यु दर

इसके अलावा कुछ और आंकड़ों पर भी नजर डालें तो उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत सामने आ जाती है। राज्य में मातृ मृत्यु दर (डंजमतदंस डवतजंसपजल त्ंजपव, डडत्) 101 प्रति एक लाख है। एमएमआर के मामले में भी केरल एक नंबर पर है। केरल का एमएमआर 30 है। एमएमआर यानी मातृ मृत्य दर का मतलब है कि प्रति एक लाख जीवित बच्चों को जन्म देने वालों मांओं की मौत की दर।

इसके अलावा नवजात मृत्यु दर के मामले में भी केरल नंबर एक पर है। यहां एक लाख पर 4.4 नवजातों की मौत होती है, लेकिन उत्तराखंड में नवजात मृत्यु दर (प्दंिदज डवतजंसपजल त्ंजम) 39.1 है। जो केरल से लगभग 10 गुणा अधिक है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों (न्दकमत-5 डवतजंसपजल त्ंजम) की मौत के मामले में भी केरल पूरे देश में सबसे बेहतर स्थिति में है। यहां औसतन एक लाख पर 5.2 मौतें होती हैं। जबकि उत्तराखंड में यह दर 45.6 है।

सांस्थानिक प्रसव दर के मामले में भी केरल सबसे ऊपर है। इसका मतलब है कि महिलाओं का प्रसव किसी न किसी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में स्वास्थ्य कर्मियों की देखरेख में होता है। केरल में यह दर 99.8 प्रतिशत है, जबकि उत्तराखंड में यह 83.2 प्रतिशत है।

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