विज्ञान की जरूरत क्यों?

विज्ञान हमारे जीवन, प्रकृति ,समाज और संस्कृति को बहुत प्रभावित किया है। दैनिक जीवन के कार्यों से लेकर प्रयोगशालाओं में कार्य करने और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों जैसे- शिक्षा, चिकित्सा, रक्षा, कृषि, अंतरिक्ष जल- थल- नभ सभी में विज्ञान शामिल है और उसके बिना हम पल भर भी अपना काम नहीं कर सकते हैं। प्राचीनकाल में भारत में विज्ञान और अध्यात्म का एक ऐसा संतुलन रहा है, जिसके कारण भारत लंबे समय तक अध्यात्म से लेकर गणित, खगोलशास्त्र और विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी रहा है।

भारत का यह ज्ञान अन्य देशों में भी फैला और अन्य देश भी वैज्ञानिक प्रगति करने लगे। दूसरे देशों के लोग संस्कृति में लिखी गणित, खगोलशास्त्र और चिकित्साविज्ञान की पुस्तकों का अपनी भाषा में अनुवाद कर उससे ज्ञान प्राप्त करते थे, जितनी प्रगति भारत में विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में हुई, उतनी यूरोप तक में भी नहीं हुई थी, लेकिन आज देखिए विज्ञान के क्षेत्र में अपना भारत विकसित देशों से 10 कदम पीछे है।

वैज्ञानिक प्रगति का क्षेत्र सीमित रह गया
ऐसी क्या बात हो गई जिससे हमारे देश का स्तर इतना नीचे पहुंच गया? जब तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी हमारी सभ्यता और संस्कृति से नहीं जुड़ेंगी, तब तक उसका लाभ समाज को नहीं मिल सकता है। ऐसा नहीं है कि हम विज्ञान के क्षेत्र में बहुत पिछड़े हुए हैं या वैज्ञानिक प्रगति हो ही नहीं रही है। थोड़ी तरक्की तो है लेकिन आम व्यक्ति में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव होने से वैज्ञानिक प्रगति का क्षेत्र सीमित रह गया है।

विद्यालयों, विश्वविद्यालय और संस्थानों में विज्ञान विषय पढ़ाए जरूर जाते हैं लेकिन वह पढ़ाई परीक्षा पास करने के लिए या डिग्री प्राप्त करने का माध्यम मात्र बनकर रह गई है। वैज्ञानिक तथ्यों को गहराई से समझकर उसको समाज के लिए उपयोग करने की योग्यता अधिकांश नगण्य ही है बल्कि हमें जरूरत है विज्ञान दृष्टि का विकास और प्रसार करने की और हमारी सोच का आधार तथ्यात्मक हो जिसे वैज्ञानिक विवेक अनुप्राणित कर सके।

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