बिजली के लिए तबाह गांव का आधा-अधूरा पुनर्वास

Trilochan Bhatt

त्तराखंड सरकार की रिपोर्ट कहती है कि राज्य में 350 गांव आपदा की दृष्टि से संवेदनशील हैं। इनमें 51 गांव अति संवेदनशील हैं और उन्हें जल्दी विस्थापित किये जाने की जरूरत है। इसके अलावा अन्य 350 गांवों के 600 परिवारों को भीं दूसरी जगह बसाये जाने की जरूरत है। हाल ही राज्य के आपदा प्रबंधन और पुनर्वास राज्य मंत्री धनसिंह रावत ने पुनर्वास कार्यों संबंधी समीक्षा बैठक में दावा किया था कि राज्य में 2011 में विस्थापन नीति लागू होने के बाद से 43 गांवों के 1086 परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है।

राज्य में विभिन्न कारणों से खतरे की जद में आने वाले गांवों के विस्थापन को लेकर कई वर्षों तक असमंजस की स्थिति बने रहने के बाद उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2011 में विस्थापन नीति की घोषणा की। राज्य सरकार के विस्थापन संबंधी तमाम दावों के बावजूद आज भी सैकड़ों ऐसे गावों के हजारों परिवार बेहद खतरनाक स्थितियों में रह रहे हैं। जिन परिवारों को दूसरी जगहों पर बसाया गया है, उनकी स्थिति भी कोई संतोषजनक नहीं है। डाउन टू अर्थ ने राज्य में आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में से एक चमोली जिले के जोशीमठ ब्लॉक के कुुछ गांवों में जानकर पुनर्वास की जमीनी हकीकत जानने का प्रयास किया।

इस ब्लॉक में कुल गांवों की संख्या 50 है और वर्ष 2013 में तैयार की गई सूची के अनुसार इस ब्लॉक के 17 गांव रहने लायक नहीं थे और उन्हें दूसरी सुरक्षित जगहों पर बसाये जाने की जरूरत बताई गई थी। खास बात यह है कि इस ब्लॉक में गांवों के असुरक्षित हो जाने के अलग-अलग कारण हैं। नदियों के किनारे बसे गांव लगातार होने वाले कटाव से असुरक्षित हो गये हैं तो पहाड़ियों के ऊपर बसे गांव भूस्खलन के कारण खतरे की जद हैं। एक गांव ऐसा भी है, जिसे एक बिजली परियोजना ने पूरी तरह से तबाह कर दिया है। यह गांव जोशीमठ तहसील मुख्यालय के ठीेक सामने अलकनन्दा नदी के दूसरी तरफ स्थिति है, गांव का नाम हैं चाईं।

चाईं गांव में एक घर के आंगन में हुआ गड््ढा। लगातार मिट्टी-पत्थर भरने के बाद भी यह गड््डा नहीं भरता।

150 परिवारों और करीब 700 की जनसंख्या वाला यह गांव 1993 से पहले एक भरा-पूरा गांव था, जब तक कि यहां जय प्रकाश पावर वेंचर्स लिमिटेड कंपनी ने 400 मेगावाट की विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना का निर्माण शुरू नहीं किया था। इस परियोजना में चाईं गांव के पीछे की तरफ तीन पहाड़ियों के पार लामबगड़ से अलकनन्दा का पानी टनल से गांव के नीचे बने पावर हाउस में पहुंचाया गया है। इस परियोजना ने गांव को दो तरह से प्रभावित किया। गांव के ठीक नीचे भूमिगत पावर हाउस ने और गांव के पीछेे बनाई गई टनल ने।

चाईं गांव के लोगों की सुरक्षा के लिए कई वर्षों तक संघर्ष करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अतुल सती कहते हैं, यह गांव फलों और दूध-घी के लिए जाना जाता था। संतरा, केला, पुलम, नाशपाती जैसे कई तरह के फल, मौसम सब्जियां और मिर्च यहां भरपूर होती थी। लोग गाय-भैंस पालते थे और दूध-घी की जोशीमठ, पांडुकेश्वर और बदरीनाथ में आपूर्ति करते थे। बिजली परियोजना का काम शुरू हुआद तो गांव के पास बने एग्जिट प्वॉइंट से विस्फोट करने के लिए इस्तेमाल किये गये बारूद के साथ सुरंग का मलबा बाहर छोड़ा जाने लगा। इस मलबे ने सबसे पहले गांव के मवेशियों को प्रभावित किया। बारूद सनी घास से पशु बीमार पड़ने लगे, गाय, भैंस और बकरियों के बच्चे पेट में ही मरने लगे। कुछ ही समय में पशुधन लगभग समाप्त हो गया। गांव के ठीक नीचे बड़ी-बड़ी सुरंगंे बनने से जमीन का पानी सूखने लगा। जमीन रूखी हो गई और फल और सब्जियों को उत्पादन बहुत कम हो गया। संतरा और केला का पूरी तरह खत्म हो गया।

डाउन टू अर्थ को चाईं गांव में पुष्कर सिंह चौहान मिले। उनका 6 कमरों का दोमंजिला घर विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना के पावर हाउस से ठीक ऊपर है। कमरों में दरारें पड़ी हुई हैं। आंगन टेढ़ा हो गया है और घर के नीचे खेत में एक गहरा गड््ढ़ा है, जो लगातार बड़ा होता जा रहा है। पुष्कर सिंह चौहान के अनुसार जब तक परियोजना बन रही थी तब तक कुछ पता नहीं चला। 2006 में बिजली उत्पादन शुरू हुआ और 2007 में जमीन खिसकने लगी। प्रशासन से शिकायत की तो 22 परिवारों को खतरे में माना गया और उन्हें जोशीमठ की नीचे मारवाड़ी में प्रति परिवार 250 वर्ग मीटर जमीन की गई। 3.35 लाख मुआवजा और 25 हजार रुपये आपदा मद में देने की बात हुई। केवल 10 परिवारों ने जमीन और पैसा लिया। हमने और बाकी 11 परिवारों ने मना कर दिया। इतनी जमीन और इतने पैसे में हमारे परिवार के लायक मकान नहीं बन सकता था। खेती की जमीन का मुआवजा देने की भी कोई बात नहीं थी।

एक अन्य प्रभावित नरेन्द्र सिंह बिष्ट के अनुसार मकान और जमीन अब भी लगातार धंस रहे है। तेज बारिश होते ही घबराहट शुरू हो जाती है। गांव के नीचे से भी जमीन खिसक रही है और ऊपर से भी। अब घर छोड़कर भी कहीं जा नहीं सकते। बरसात के दिनों में कोशिश करते हैं कि बच्चे घरों में न रहें। जोशीमठ में कमरा लेकर रहें या कुछ और व्यवस्था करें।

जेपी की विनाशकारी जल विद्युत परियोजना।

चाईं में रह रहे परिवार अपने सुरक्षा को लेकर चिन्तित हैं तो गांव छोड़कर मारवाड़ी में आकर रह रहे परिवार यहां अव्यवस्थाओं से परेशान हैं। मारवाड़ी की चाईं कॉलोनी में रह रहे 10 परिवारों की अपनी समस्या हैं। इस बस्ती में बांकेलाल मिलते हैं। वे कहते हैं, यहां मकान बनाने को थोड़ी सी जगह मिली, लेकिन जो 3.65 लाख रुपये मिले, उससे रहने लायक घर बनाना संभव नहीं था, किसी तरह पैसे की व्यवस्था करके रहने लायक बनाया। गांव की जमीन छोड़ना संभव नहीं, क्योंकि गुजारे की और कोई व्यवस्था नहीं है। बीच-बीच में गांव जाकर खेती करते हैं, हालांकि अब पहले जैसी उपज नहीं होती। बांकेलाल कहते हैं कि 13 साल से रह रहे हैं, लेकिन पानी तक की व्यवस्था नहीं है। पाइप लाइन आई है, इसमें कभी-कभी ही पानी आता है। घर से करीब 500 मीटर नीचे प्राकृतिक जलस्रोत है, उसी से पानी ढोना पड़ता है।

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