उत्तराखंड का इतिहास-4 : राज्य स्थापना के बाद-एक

उत्तराखंड का इतिहास प्राचीन काल से लेकर राज्य स्थापना तक तीन खंडों में पहले प्रकाशित किया जा चुका है। इस अंक में राज्य स्थापना से लेकर केदारनाथ आपदा और तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को हटा दिये जाने तक का इतिहास है। घटनाओं को संग्रह समाचार पत्रों और अपनी डायरी किये गये संकलन के आधार पर किया गया है। किसी तथ्य में भूल हो गई हो तो सुधारने में सहयोग की उम्मीद करूंगा।
– त्रिलोचन भट्ट

एक
-लम्बे संघर्ष के बाद उत्तराखण्ड के लोगों को 9 नवम्बर, 2000 को अपना राज्य मिला।
– हालांकि केन्द्र और उत्तर प्रदेश ने तब तक राज्य का नाम बदलकर उत्तरांचल और स्थाई राजधानी गैरसैंण के बजाय अस्थाई राजधानी देहरादून कर दी थी।
– 8-9 नवम्बर की मध्य रात्रि को 12 बजे के कुछ बाद प्रथम राज्यपाल के रूप सुरजीत सिंह बरनाला ने शपथ ली।
– 9 नवम्बर, 2000 की सुबह मुख्यमंत्री के रूप में नित्यानन्द स्वामी ने शपथ ली।
– प्रकाश पन्त राज्य के पहले विधानसभा अध्यक्ष बनाये गए।
– पहली अंतरिम सरकार में काबीना मंत्री के रूप में केदार सिंह फोनिया, मातबर सिंह कंडारी, मोहनसिंह रावत गांववासी, अजय भट्ट, बंशीधर भगत और नारायण रामदास शामिल हुए।
– राज्यमंत्री के रूप में नारायण सिंह राणा, तीरथ सिंह रावत, सुरेश आर्य और निरूपमा गौड़ शामिल किये गये।
– अंतरिम विधानसभा में सदस्यों की संख्या 30 थी, जो राज्य के सभी 13 जिलों के उस समय के विधानसभा सदस्यों और उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्यों को मिलाकर गठित की गयी थी।
– भारतीय जनता पार्टी में लगातार खींचतान के कारण 30 अक्टूबर, 2021 को नित्यानन्द स्वामी को हटाकर भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाया गया।

दो
– 14 फरवरी, 2002 राज्य विधानसभा का पहला चुनाव संपन्न हुआ।
– 16 फरवरी को जब चुनाव परिणााम घोषित किया गया।
– भाजपा को 19, कांग्रेस का 36, बसपा को 7, उक्रांद को 4 और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 1 सीट मिली। 3 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार सफल रहे।
– 3 मार्च 2002 को नारायण दत्त तिवारी को उत्तरांचल राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गयी।
– यशपाल आर्य को विधानसभा अध्यक्ष मनोनीत किया गया।
– नारायण दत्त तिवारी को विधानसभा सदस्य बनाने के लिए रामनगर विधायक योगम्बर सिंह रावत ने इस्तीफा दिया।
– नारायण दत्त तिवारी रामनगर क्षेत्र से उप चुनाव जीतकर विधिवत विधानसभा सदस्य बने।
– नारायण दत्त तिवारी पांच वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे। इस दौरान वे लाल बत्ती बांटने को लेकर काफी चर्चित हुए।
– उन्होंने 125 से अधिक लोगों को लाल बत्ती देकर दायित्वधारी बनाया।
-दूसरा विधानसभा चुनाव आने से पहले नारायण दत्त तिवारी सरकार ने उत्तरांचल का नाम बदलकर उत्तराखंड कर दिया।

तीन
– 21 फरवरी 2007 को विधानसभा के दूसरे चुनाव सम्पन्न हुए।
– इस बार 69 सीटों पर ही चुनाव हुए थे। बाजपुर सीट पर बाद में चुनाव कराये गये।
– 27 फरवरी को चुनाव नतीजे घोषित हुए। कांग्रेस को 21, भाजपा को 34 बसपा को 8, उक्रांद को 3 सीटें मिलीं। 3 सीटें स्वतंत्र उम्मीदवारों जीती।
– उक्रांद और एक निर्दलीय विधायक ने भाजपा को समर्थन दिया।
– 8 मार्च, 2007 को भुवनचंद्र खंडूड़ी ने राज्य के चौथे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
– हरबंस कपूर को विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया।
– भाजपा का एक खेमा लगातार भुवनचंद्र खंडूरी का विरोध करता रहा।
– 7 अगस्त, 2008 को श्रीनगर में मेडिकल कालेज का उद्घाटन किया गया, तो उद्घाटन के पत्थर पर रमेश पोखरियाल निशंक का नाम नहीं था।
– इससे निशंक नाराज हो गये और खंडूड़ी विरोधी खेमे के प्रमुख नेता बन गये।
– 9 अगस्त, 2008 को निशंक के नेतृत्व में 24 विधायकों ने दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और अन्य नेताओं से मुलाकात की।
– खंडूड़ीं का हटाने की जोरदार मांग हुई। लेकिन, नेताओं ने मांग टाल दी।
– 13 मई, 2009 को उत्तराखंड की पांचों संसदीय सीटों के लिए चुनाव हुए।
– 6 मई को हुई मतगणना में भाजपा को सभी पांचों सीटों पर पराजय का मुंह देखना पड़ा।
– मुख्यमंत्री खंडूड़ी एक बार फिर निशाने पर आ गये और भाजपा में फिर से उन्हें हटाने की मांग उठने लगी।।
– 24 विधायक दिल्ली तक पहुंच गये थे उनमें से 10 को खंडूड़ी ने मना लिया।
– 14 असंतुष्ट इस्तीफा देने की चेतावनी दी। उनका कहना था कि यदि खंडूड़ी बने रहे तो 2012 का विधानसभा चुनाव जीतना भी कठिन होगा।
– 24 जून 2009 को भाजपा हाईकमान ने नई दिल्ली में पार्टी के विधायकों की एक बैठक बुलाई।
– बैठक मंे मुख्यमंत्री के रूप में रमेश पोखरियाल निशंक के नाम पर सहमति बनी।

चार
– 27 जून, 2009 को डरमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को राज्य के पांचवंे मुख्यमंत्री के रूप शपथ दिलाई गई।
– अपना जनाधार बढ़ाने के लिए निशंक ने एनडी तिवारी की राह अपनाई और 96 लोगों को लालबत्ती दी।
– उस दौरा में पूरा राज्य निशंक के बैनर होल्डर से पट गया। अखबारों में रोज बड़े विज्ञापन छपे।
– तमाम असफलताओं के बावजूद 2011 में निशंक के कार्यकाल में औली में दक्षिण एशियाई शीतकालीन खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया।
– इस बीच हरिद्वार कुम्भ में कराये गये निर्माण कार्यों को लेकर निशंक विवादों में रहे।
– निशंक के मुख्यमंत्री बनने के तीन महीने बाद ही भुवनचंद्र खंडूड़ी ने उन्हें हटाने की मुहिम छेड़ दी।
– उन्होंने दिल्ली में ठीक इसी दौरान चल रहे अन्ना और केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को हथियार बनाया और रैली निकाली।
– रैली में देहरादून के मेयर विनोद चमोली ने भाजपा का झंडा लहराने का प्रयास किया तो खंडूड़ी की धर्मपत्नी ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।
– निशंक के खिलाफ शिकायतें बढ़ती गई। आखिरकार पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उन्हें हटाने की घोषणा कर दी।
– 11 सितम्बर, 2011 को खंडूड़ी ने फिर से उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
– अपने दूसरे कार्यकाल के प्रारम्भ खंडूड़ी ने भ्रष्टाचार विरोधी और सुशासन के नारे के साथ किया।
– खंडूड़ी ने 01 नवम्बर, 2011 को विधानसभा में लोकायुक्त विधेयक पारित करवा दिया।
– दिल्ली में आंदोलन कर रहे अन्ना हजारे और उनके साथियों ने भी इसके लिए श्री खंडूड़ी की प्रशंसा की।
– बाद में कांग्रेस सरकार ने उनके लोकायुक्त विधेयक में अनेक कमियां निकालकर उसे रद्द कर दिया और अपना नया विधेयक पारित करवा दिया।

पांच
– 30 जनवरी, 2012 को राज्य विधानसभा के तीसरे चुनाव हुए।
– इस दौरान कई अन्य राज्यों में भी विभिन्न चरणों में मतदान हुआ।
– 06 मार्च 2012 को सभी राज्यों में एक साथ मतगणना हुई।
– किसी भी पार्टी को स्पष्ट जनादेश नहीं मिल पाया।
– भाजपा को 31, कांग्रेस को 32, बसपा को 3, उक्रांद को 1 और निर्दलियों को 3 सीटें मिली।
– मुख्यमंत्री भुवनचन्द्र खंडूड़ी कोटद्वार सीट से चुनाव हार गये।
– भारतीय संसदीय इतिहास में यह तीसरा अवसर था, जब कोई कार्यरत मुख्यमंत्री चुनाव हार गया हो।
– बसपा और निर्दलियों के सहयोग से कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा पेश किया।
– कांग्रेस ने किया चुने हुए विधायक को मुख्यमंत्री बनाने के बजाए टिहरी सांसद विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की।
– विजय बहुगुणा ने 13 मार्च, 2012 को मुख्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली।
– गोविन्द सिंह कुंजवाल को विधानसभा अध्यक्ष और अनुसूया प्रसाद मैखुरी को विधानसभा उपाध्यक्ष चुना गया।
– विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने से रिक्त हुई टिहरी लोकसभा सीट पर उप चुनाव भाजपा की माला राज्यलक्ष्मी शाह ने जीता।
– मुख्यमंत्री बनने के साथ ही विजय बहुगुणा और उनके बेटे साकेत पर कई गंभीर आरोप लगे।
– 16-17 जून, 2013 की त्रासदी ने राज्य को और भी अस्त-व्यस्त कर दिया।
– राज्य सरकार राहत और बचाव कार्यों में पूरी तरह से असफल रही।
– केदारनाथ में भारी तबाही के तत्काल बाद जो कदम उठाये जाने चाहिए थे वे नहीं उठाये जा सके।
– विजय बहुगुणा लगातार विपक्षियों और अपनी ही पार्टी के विरोधियों के निशाने पर थे।
– उनके बेटे साकेत बहुगुणा के राज्य के कार्यों में दखल देने और गैर कानूनी तरीके से सम्पत्ति अर्जित करने के आरोप लगातार तेज होते जा रहे थे।
– 01 फरवरी, 2014 को पार्टी हाईकमान ने विजय बहुगुणा को पद से हटाने और हरिद्वार सांसद हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाने की घोषण कर दी।

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