ऐसे में कैसे होगा रिवर्स पलायन

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Harsh Vardhan Bhatt

 

 

स लेख के लेखक कई नामी प्राइवेट कंपनियों में उच्च पदों पर कार्य करने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वापस गांव आकर रहने की इच्छा है, लेकिन आने की हिम्मत नहीं कर पा रहे। आखिर क्यों? इस लेख में उन्होंने अपने उद्गार व्यक्त किये हैं। ये उन सब लोगों के उद्गार हैं जो गांव लौटना तो चाहते हैं, लेकिन हिम्मत नहीं कर पाते। यह लेख 21 सालों से उत्तराखंड में राज करने वाले राजनीतिक दलों और नेताओं को आइना दिखाता है।                                              – सम्पादक

 

आज 40 -50 साल बीत जाने के बाद भी उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों की स्थिति वही है। थोड़ा-बहुत छोटे स्तर पर अंतर ज़रूर है, लेकिन वह नाकाफी है। सुदूर क्षेत्र के गांवों में एक अस्पताल का होना बेहद जरूरी है। साथ ही अस्पताल में डॉक्टर, फार्मासिस्ट, स्वीपर, वार्ड बॉय और और भी कई पदों पर नियुक्तियां करके सरकार दूर-दराज के क्षेत्रों में नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवाने के साथ भी बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार भी उपलब्ध करवा सकती है। कुछ गांवों में चिकित्सा केन्द्र तो हैं, लेकिन मेडिकल सहायता हेतु इन चिकित्सा केन्द्रों पर जाओ तो शून्य ही हासिल होता है। डॉक्टर न होने से मरीज को या तो अटेंड नहीं किया जाता या अस्पताल में उपलब्ध दो-चार टेबलेट थमा कर विदा कर दिया जाता है। इन सबमें सरकारें कितना पैसा लगाती हैं और उसके बदले में लोगों को क्या लाभ मिल पा रहा है, यह सोचने का विषय है। यह स्थिति उत्तराखंड के लगभग हर क्षेत्र की है। दूर-दराज के क्षेत्रों के साथ ही उन क्षेत्रों की भी जो मोटर मार्ग पहुंच जाने के कारण खुद के विकसित होने का मुगालता पाले हुए हैं।

मैं भी एक ऐसे विकसित गांव से सम्बंधित हूं, जहां एक इंटर कॉलेज है, तहसील भी है और साथ में एक ऐलोपैथिक अस्पताल भी। मैं बसुकेदार नामक उस गांव का यहां पर ज़िक्र कर रहा हूं, जहां मेरा जन्म हुआ, पला-बढ़ा। तब वह उत्तर प्रदेश के चमोली ज़िले एक गांव था और अब उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले एक छोटा कस्बा है।

कभी-कभी 2-3 सालों में पारिवारिक कार्यक्रमों के लिए गांव आना होता है। पर मन में एक अजीब सा डर रहता है, विशेषकर स्वास्थ्य सम्बंधी परेशानियों को लेकर। स्वास्थ्य संबंधी इन्हीं चिन्ताओं के कारण कई बार तो चाहते हुए भी मन मसोसकर इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेना स्थगित करना नियति बन गयी है।

हाल ही में एक पारिवारिक कार्यक्रम में गांव जाना हुआ, जिसका डर था वहीं हुआ। ऐने कार्यक्रम के दौरान परिवार के एक सदस्य की तबीयत बिगड़ गई। गांव में अस्पताल तो है ही, मेडिकल हेल्प के लिए अस्पताल पहुंचे। लेकिन अफसोस वहां मौजूद एक महिला डॉक्टर ने बिना मरीज को देखे ही रुद्रप्रयाग हॉस्पिटल ले जाने का फरमान जारी कर दिया। वे महोदया कौन सी डिग्री हासिल किए हैं, यह तो मालूम नहीं, लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं वे न तो डॉक्टर बनने लायक तो बिल्कुल भी नहीं। दवाइयां और मेडिकल चेकअप न सही, मरीज के साथ सहानुभूति का बर्ताव तो कर ही सकती हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। महोदया ने दूर से ही भगा दिया। ऐसा सिर्फ मेरे साथ नहीं हुआ। बताया गया कि अक्सर यहां यही होता है।

बहरहाल। मुझे सरकारी अस्पताल में सरकारी कर्मचारियों के इस व्यवहार में बेहद तकलीफ हुई, हालांकि मुझे इससे ज्यादा फर्क इसलिए नहीं पड़ा कि मेरे पर संसाधन थे और मैं बिना देर किये अपने साधनों से रुद्रप्रयाग और उससे भी आगे के हॉस्पिटल जा सकता था। लेकिन, हर एक के साथ ऐसा नहीं है। गांव में रहने वाले ज्यादातर लोगों के पास ये सुविधा नहीं है। वे सरकार के भरोसे हैं, सरकारी अस्पताल के भरोसे हैं। लेकिन, यह भरोसा बार-बार तोड़ा जा रहा है। यही वजह है कि गांव में रहने वाला व्यक्ति किसी न किसी तरह बाहर शहर में सैटल होने की सोच रहा है और रिवर्स पलायन के नारे के बावजूद बाहर रहने वाला व्यक्ति चाहते हुए भी वापस गांव जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है।

लेकिन इस बात पर गौर तो जरूर किया जाना चाहिए कि अस्पतालों में जहां डॉक्टर कार्यरत हैं, वेे दूर से ही मरीज को बिना परीक्षण किए भगा देते हैं या दूसरे अस्पताल को जाने को कहते हैं, जबकि वे जानते हैं कि दूसरा अस्पताल बहुत दूर है और वहां पहुंचने तक मरीज की स्थिति ज्यादा बिगड़ सकती है। यदि इन अस्पतालों में प्राथमिक चिकित्सा की भी कोई व्यवस्था नहीं तो इनके होने पर सवालिया निशान तो लग ही जाता है। मेरा मानना है कि अस्पतालों में ऐसे डॉक्टरों और कर्मचारियों की नियुक्ति फिजूल है और सरकारी धन का दुरुपयोग है।

एक बार और अपनी तकलीफ़ों को लेकर बड़े सरकारी नुमाइंदु से सम्पर्क करो तो उनके मोबाइल नम्बर और ई-मेल, जो उत्तराखंड डिस्ट्रिक्ट पोर्टल पर उपलब्ध हैं, ज्यादातर गलत हैं। अगर कोई सही भी निकला तो वह आम लोगों को जवाब देना पसंद नहीं करता। उस अधिकारी के लिए प्राथमिकता आम लोगों की शिकायत पर ध्यान देकर उनकी तकलीफ दूर करना नहीं, बल्कि अपने कर्मचारी का बचाव करना होता है।
शायद उनके पास एक आम आदमी की परेशानियों से बढ़कर भी बहुत काम है। मुझे नहीं पता कि ये प्रणाली की विफलता है या सिस्टम ही ऐसा ढाल दिया गया है। जो भी है स्थिति बेहद दुखद है।

मुझे तो लगता है कि पर्वतीय क्षेत्रों में सरकारी व्यवस्थाओं का निश्चित समय के अंतराल में नियमित रूप से निरीक्षण ज़रूरी है। पर सवाल फिर वही कि करे कौन? इस सम्बंध में जनप्रतिनिधि कुछ करें तो अच्छा होगा। हमें भी अगली बार बिना किसी संकोच और बिना किसी डर के गांव आ सकेंगे।

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