बेमौसमी बारिश में तबाह उत्तराखंड

Trilochan Bhatt

 

मानसून बीत चुका था और उत्तराखंड में सामान्य जनज-जीवन पटरी पर लौटने लगा था। इस बार 117 दिन तक सक्रिय रहे मानसून सीजन में राज्य के ज्यादातर इलाकों में हालांकि बारिश सामान्य से कम हुई थी, लेकिन परेशानी बारिश ने लोगों को उतना ही किया था, जितनी हर साल करती है। मौसम विभाग बाकायदा राज्य से मानसून के विदा होने की घोषणा कर चुका था। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण इस मानसून सीजन में हुए कुल नुकसान का लेखा-जोखा दर्ज करने में जुट गया था। मानसून विदा होने की घोषणा हुए अभी एक हफ्ता भी नहीं बीता था कि मानसून विभाग ने राज्य में एक बार फिर तेज बारिश का अलर्ट जारी कर दिया। कोई विश्वास करने के लिए तैयार नहीं था कि मानसून गुजर जाने के बाद अक्टूबर के साफ-सुथरे मौसम में बारिश होगी और वह भी बहुत भारी। 14 अक्टूबर को जारी किया गया मौसम विभाग का ऑरेंज अलर्ट 15 अक्टूबर को रेड अलर्ट में बदल दिया गया। लोगों के फोन पर मैसेज के रूप में इस अलर्ट की जानकारी पहुंचने लगी। लेकिन, चटक खिली धूप के बीच किसी ने इस अलर्ट को गंभीरता से नहीं लिया।

17 अक्टूबर की सुबह से राज्य के ज्यादातर हिस्सों में बारिश शुरू हो गई। दिनभर राज्य के ज्यादातर जिलों में छिटपुट बारिश हुई। कहीं से कोई नुकसान की सूचना नहीं मिली। 18 अक्टूबर को बारिश तेज हो गई। जगह-जगह सड़कें बंद हो गई। शाम तक 6 लोगों को मौत हो जाने की सूचना मिली। मौसम विभाग ने बारिश के जो आंकड़े जारी किये, वे चौंकाने वाले थे। राज्य के 13 में से 9 जिलों में भारी से अत्यधिक भारी बारिश हुई थी। चम्पावत जिले के पंचेश्वर में 230 मिमी, पौड़ी जिले के लैंसडौन में 229 मिमी, ऊधमसिंह नगर जिले के गूलरभोज में 148 मिमी, बागेश्वर के सामा में 121 और पिथौरागढ़ में 112 मिमी बारिश दर्ज की गई थी। राज्य के चमोली, रुद्रप्रयाग अल्मोड़ा जिलों में भी अलग-अलग स्थानों पर 64.5 मिमी मिली से ज्यादा बारिश हुई थी। मौसम विभाग के मानकों के अनुसार 64.5 मिमी से ज्यादा बारिश को भारी बारिश कहा जाता है।

18 अक्टूबर की शाम से गढ़वाल मंडल के चमोली और रुद्रप्रयाग जिलों को छोड़कर बाकी सभी जिलों में बारिश कम हो गई थी। देहरादून में लगातार 36 घंटे की रिमझिम बारिश के बाद मौसम खुल चुका था। लेकिन, ठीक इसी दौरान कुमाऊं मंडल में पिछले दो दिनों से तेज बारिश शुरू हो गई। नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और चम्पावत जिलों आधी रात के बाद से छोटे-छोटे पहाड़ी नाले उफनने और गाद-मलबे के साथ निचले क्षेत्रों में आकर तबाही मचाने लगे। घरों के बहने या दबने का सिलसिला शुरू हुआ और लोग आधी रात तेज बारिश में घर छोड़कर सुरक्षित जगहों की तलाश में भागने लगे। बचने-बचाने के तमाम प्रयासों के बाद भी करीब 70 लोगों की मौत हुई। संपत्ति का कितना नुकसान हुआ, इसका आकलन करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री से केंद्र से अधिकारियों की टीम भेजने को कहा है।

नैनीताल जिले के तल्ला रामगढ़ में एक छोटे से पहाड़ी नाले ने मचाई तबाही।

देहरादून स्थित राज्य मौसम विज्ञान केन्द्र के आंकड़े बताते हैं कि 18 अक्टूबर शाम से 19 अक्टूबर शाम तक 24 घंटे के दौरान हुई बारिश ने कुमाऊं मंडल में बारिश के सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिये थे। कुमाऊं मंडल में इस दौरान औसतन 197.5 मिमी और गढ़वाल मंडल में 65.5 मिमी बारिश दर्ज की गई। कुमाऊं मंडल के दो पुराने वेदर स्टेशन में अब तक हुई बारिश के ऑल टाइम रिकॉर्ड काफी पीछे छूट चुका था। नैनीताल जिले में पंचेश्वर में 1 मई 1897 से मौसम संबंधी सूचनाएं दर्ज की जा रही हैं। यहां 24 घंटे में बारिश का ऑल टाइम रिकॉर्ड 18 सितम्बर 1914 को दर्ज किया गया था, जब यहां 254.5 मिमी बारिश दर्ज की गई थी। लेकिन 18 से 19 अक्टूबर को 24 घंटे के दौरान मुक्तेश्वर में 340.8 मिमी बारिश हुई। इसी तरह ऊधमसिंह नगर जिले के पंतनगर में, जहां 25 मई 1962 से मौसम के आंकड़े एकत्रित किये जा रहे हैं, सबसे ज्यादा बारिश 10 जुलाई 1990 को 228 मिमी दर्ज की गई थी। यहां भी 19 अक्टूबर को सबसे ज्यादा बारिश का ऑल टाइम रिकॉर्ड टूट गया। पंतनगर में 24 घंटे में 403.2 मिमी बारिश हुई।

24 घंटों के दौरान राज्य के कुमाऊं क्षेत्र में कई जगहों पर अप्रत्याशित बारिश हुई। चम्पावत में 579 मिमी, इसी जिले के पंचेश्वर में 508 मिमी, ़ऊधमसिंह नगर जिले के रुद्रपुर में 484 मिमी और पिथौरागढ़ के गनाई गंगोली और नैनीताल जिले के हल्द्वानी में 325 मिमी बारिश हुई। चम्पावत, नैनीताल, ऊधमसिंह नगर, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा, पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग और टिहरी जिले के कई अन्य स्थानों पर भी 100 से 300 मिमी तक बारिश दर्ज की गई।

अक्टूबर के महीने में उत्तराखंड में तीन दिन में बेमौसमी और अप्रत्याशित बारिश में ताजा आंकड़ों के अनुसार मरने वालों की कुल संख्या 72 हो चुकी है। 26 लोग घायल हैं और 4 अभी लापता बताए जा रहे हैं। मरने वालों की यह संख्या इस वर्ष मानसून सीजन में मरने वालों की कुल संख्या से दोगुनी है। मानसून सीजन में राज्य के अलग-अलग जिलों में 36 लोगों की मौत हुई थी। इस तरह से वर्ष 2021 में उत्तराखंड में आपदाओं में मरने वालों की कुल 330 हो चुकी है। इसी वर्ष चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने से ऋषिगंगा में आई आपदा में 222 लोगों की मौत हुई थी।

राज्य में पिछले वर्षों में आपदा में मरने वालों की कुल संख्या देखें तो वर्ष 2013 के अलावा पिछले वर्षों में कभी इतनी बड़ी जनहानि नहीं हुई। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़े बताते हैं कि 2013 के जून में राज्य को अब तक की सबसे बड़ी आपदा का सामना करना पड़ था। केदारनाथ धाम और मन्दाकिनी घाटी बुरी तरह तबाह होने के साथ ही राज्य के अन्य हिस्सों में भी भारी जनहानि हुई थी। उस समय शुरुआती दौर में 225 लोगों की मौत और 4 हजार से ज्यादा लोगों के लापता होने की सूचना दर्ज की गई थी। बाद में जल प्रलय से बचने के ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में गये कई लोगों के शव मिलने और लापता लोगों को मृत घोषित किये जाने के बाद इस आपदा में मरने वालों की संख्या 4,246 हो गई थी।

नैनीताल जिला सबसे ज्यादा प्रभावित
17 से 19 अक्टूबर तक हुई भारी बारिश में उत्तराखंड का नैनीताल जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। आपदा के पांच दिन बाद मोंगाबे ने इस जिले के सबसे ज्यादा प्रभावित रामगढ़ और रामनगर विकासखंड का दौरा किया। रामगढ़ क्षेत्र में सबसे ज्यादा मौतें हुई होने के साथ ही यहां काश्तकारों को भी भारी नुकसान हुआ है। इस क्षेत्र में फल उत्पादन काश्तकारों का मुख्य व्यवसाय है। लेकिन, क्षेत्र में भारी बारिश के बाद छोटे-छोटे नालों में आये उफान से सैकड़ों की संख्या में फलों के बगीचे नष्ट हो गये हैं। रामगढ़ ब्लॉक के बोहराकोट में 93 वर्षीय दीवान सिंह के फलों का बगीचा पूरी तरह नष्ट हो गया। दीवान सिंह के अनुसार उनके दो बेटे हैं। दोनों की आजीविका इसी बगीचे से चलती थी। बगीचे में सेब और आड़ू के करीब 1500 पेड़ थे। अब सिर्फ दो दर्जन पेड़ बाकी हैं।

चुकुम गांव में तबाही का मंजर

फलों से हर सीजन में करीब 8 लाख रुपये आमदनी होती थी। इसके अलावा गायें पालकर उनके दोनों बेटे रोजी-रोटी चलाते थे। लेकिन, आपदा में बगीचा बहने के साथ ही छह गायें भी दबकर मर गई। इसी ब्लॉक के तल्ला रामगढ़ में 12 मकान पूरी बह गये या मलबे में दब गये। गांव के लोगांें ने घरों से भागकर जान बचाई। गांव की दीपा देवी ने बताया कि 19 अक्टूबर को सुबह तीन बजे के करीब नाले में भारी उफान आ गया था। पहले वे उम्मीद करते रहे ही पानी थम जाएगा, लेकिन जब मलबा उनके घरों में आने घुसने लगा तो घर से बाहर निकल कर सुरक्षित जगह की तरफ भागे। उनकी जान बच गई, लेकिन घर का बाकी कोई सामान नहीं बचा पाये। दीपा के परिवार के पास अब न राशन है और न बर्तन। वे सरकारी सहायता की उम्मीद कर रहे हैं, जो अब तक बहुत कम मिल पाई है। इस ब्लॉक के झुतिया और खैरना क्षेत्रों में भी व्यापक तबाही हुई है। आपदा के एक हफ्ते बाद भी इन क्षेत्रों में बिजली व्यवस्था बहाल नहीं हो पाई है। सड़क संपर्क कटा हुआ है और संचार सुविधा भी बंद है।

नैनीताल जिले के रामनगर ब्लॉक में कोसी नदी ने भी कुछ गांवों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इन्हीं में से एक गांव है चुमुक है। यह जिले का ऐसा गांव है, जो बरसात के दिनों में कोसी का जलस्तर बढ़ने के साथ ही दुनिया से कट जाता है। कोसी नदी में पुल बनाने की मांग इस गांव के लोग लगातार करते रहे हैं, लेकिन उनकी मांग पूरी नहीं हो पाई है। करीब 65 परिवारों के लोग मानसून सीजन शुरू होने से पहले ही 4 महीने का राशन और जरूरी चीजें जमा कर लेते हैं। बाकी दिनों में नदी में पानी कम होने से लोग तैरकर दूसरी तरफ जाते हैं। लेकिन, इस बार मानसून के बाद हुई बारिश ने गांव के सामने संकट खड़ा कर दिया है। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि अब क्या करें। मोंगाबे राफ्ट की व्यवस्था करके गांव तक पहुंचा। ग्रामीणों ने बताया कि इस बारिश में कोसी नदी ने अप्रत्याशित रूप से अपना रास्ता बदल लिया। पहले नदी गांव से करीब डेढ़ किमी दूर बहती थी, लेकिन अब गांव के पास बह रही है।

19 अक्टूबर की रात नदी में इतना पानी आया कि पूरे गांव में पानी भर गया। लोगों ने जान बचाकर ऊंचाई की तरफ भागकर जान बचाई। इस अप्रत्याशित बाढ़ में गांव के करीब 30 घर बह गए। गांव की चंपादेवी ने नदी की धारा के दूसरी तरफ करीब 500 मीटर दूर इशारा करते हुए बताया कि वहां उनका पक्का घर था। साथ में कई खेत थे, जिनमें धान का खेती की थी। अब वहां सिर्फ पत्थर और नदी का मलबा है। मुन्नी देवी का मकान और गौशाला भी इस बाढ़ में बह गई। जिन 30 परिवारों के घर बह गये हैं, वे अब टैंट लगाकर रह रहे हैं। गांव के रमेश का घर में का एक हिस्सा बह गया है और उनका घर अब रहने लायक नहीं है। रमेश कहते हैं कि फिलहाल टैंट में रह रहे हैं। जानवर खुले में हैं, जबकि गांव के दूसरी तरफ घना जंगल है, जो दूर तक फैला हुआ है। जंगली जानवर रात को गांव में घुस जाते हैं। ऐसे में टैंटों में रहना खतरे से खाली नहीं है। जानवरों को भी जंगली जानवर अपना निवाला बना रहे हैं।

चुमुक गांव को तुरंत मदद पहुचाने की अभी सरकारी और से कोई गंभीर व्यवस्था नहीं की गई है। गांव तक पहुंचने के लिए फिलहाल रामनगर की एक एडवेंचर कंपनी ने अपनी राफ्ट और कर्मचारी लगाये हैं। इस राफ्ट की मदद से अब तक इस गांव के लोगों को राशन, तिरपाल और सोलर लैंप भेजे गये हैं। बिजली व्यवस्था बहाल करने और लोगों को दवाइयां आदि उपलब्ध करवाने वाले कर्मचारी भी इसी राफ्ट के जरिये गांव तक पहुंच रहे हैं। हाल के दिनों में कुछ नेता भी इस राफ्ट से गांव में जाकर आश्वासन देकर लौट आये हैं। राफ्ट चलाने वाली कंपनी वाइल्ड रिवर एडवेंचर के दीप गुणवंत कहते हैं कि इस सेवा के बदले उन्हें सरकार और प्रशासन की ओर से कोई मदद नहीं मिल रही है। सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों और नेताओं को गांव तक पहुंचाने के साथ ही वे राफ्ट से जरूरी सामान भी पहुंचा रहे हैं।

क्या है बेमौसमी तबाही का कारण
अक्टूबर के महीने में इस अप्रत्याशित बारिश का कारण और इससे इतनी बड़ी संख्या में हुई तबाही के कारणों के बारे में मोंगाबे ने मौसम वैज्ञानिकों से बातचीत की। देहरादून स्थिति मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक और मौसम वैज्ञानिक बिक्रम सिंह के अनुसार 17 से 19 अक्टूबर तक राज्य में एक ताकतवर पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय था, जिसके बारे में पहले ही सूचना दे दी गई थी। पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने के साथ ही बंगाल की खाड़ी की तरफ से हवाओं ने राज्य के कुमाऊं क्षेत्र को हिट किया। जिसका असर कुछ हद तक गढ़वाल क्षेत्र के जिलों तक भी पहुंचा। यही वजह कि कुमाऊं मंडल के जिलों में ज्यादा बारिश हुई। कुमाऊं से लगते गढ़वाल मंडल के चमोली और पौड़ी जिलों पर भी काफी असर देखा गया, जबकि हरिद्वार, देहरादून और उत्तरकाशी जिलों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। उनका कहना है कि मॉनसून जाने के इस तरह के बारिश पहले कभी दर्ज नहीं की गई। 24 घंटे में सबसे ज्यादा बारिश का ऑल टाइम रिकॉर्ड अब तक मानसून सीजन में ही बना था, जो इस बार ऑफ मानसून सीजन में टूट गया।

भूगर्भ वैज्ञानिक डॉ. एसपी सती इस बेमौसमी बारिश को क्लाइमेंट चेंज की घटना से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि इस बार मानसून सीजन में उत्तराखंड में सामान्य से कम बारिश हुई, लेकिन मानसून के बाद हुई बारिश ने पिछले कई रिकॉर्ड तोड़ दिये। डॉ. सती के अनुसार इतनी ज्यादा बारिश के बावजूद यदि आप साल के अंत में बारिश का एवरेज निकालेंगे तो वह पिछले वर्षों जितना ही होगा। वे कहते हैं कि हाल के वर्षों में मौसम में इस तरह के परिवर्तन नजर आए हैं। साल के कुछ दिनों में भारी से बहुत भारी बारिश हो जाती है और बाकी दिन लगभग सूखे की स्थिति रहती है। वे कहते हैं कि हम मौसम के मिजाज को कभी भी ठीक से नहीं जान पाये हैं और जितना जान पाये थे, उसमें भी अब बदलाव आ रहा है। हाल की बारिश में तबाही के लिए वे अनियोजित विकास और अनियोजित निर्माणों को जिम्मेदार ठहराते हैं। नैनीताल जिले के चुकुम गांव का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि कोसी नदी इस गांव से करीब 1 किमी दूर बहती थी। लेकिन नदी के दूसरी तरफ हाल के सालों में बड़े-बड़े रिजॉर्ट बन गये। नदी में पानी बढ़ा तो स्वाभाविक धारा में रिजॉर्ट अड़चन बन गये और नदी की धारा को रुख बदलकर गांव की तरफ चला गया। उनका कहना है कि रामगढ़ क्षेत्र में जिस नाले से सबसे ज्यादा तबाही की वह छोटा ही सही लेकिन ऊंचाई वाले क्षेत्र से आता है। यहां भी नाले के आसपास बड़ी संख्या में घर बनाये गये हैं, नाले में उफान आते ही इन घरों को नुकसान पहुंचना स्वाभाविक था।

 

यह लेख सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणा पत्रिका मोंगाबे हिन्दी और अंग्रेजी के प्रकाशित हुआ। बाद में scroll.in ने उद्धृत किया।

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