उत्तराखंड का इतिहास – 2

(सात)

-कार्तिकेय वंश के शासनकाल में ही आदि शंकराचार्य उत्तराखंड क्षेत्र में आये।

– उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रभाव को खत्म किया।

-उन्होंने इस क्षेत्र में बदरीनाथ और केदारनाथ सहित कई मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया।

-मान्यता है कि इससे पहले बदरीनाथ एक बौद्ध मठ था, जिसे सम्राट अशोक ने बनवाया था।

-महापंडित नाम से प्रख्यात लेखक राहुल सांकृत्यायन ने भी बदरीनाथ में विष्णु प्रतिमा के बौद्ध प्रतिमा होने की बात कही है।

-शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों में चार मठ स्थापित किये। इनमें बद्रिकाश्रम भी शामिल है।

– 820 ई॰ में केदारनाथ में शंकराचार्य की मृत्यु हुई।

-केदारनाथ में उनकी समाधि 2013 ई॰ की आपदा के दौरान ध्वस्त हुई।

 

(आठ)

-कार्तिकेय वंश जोशीमठ से कत्यूरघाटी जाकर कुमाऊं पर शासन करने लगा।

-यही वंश कुमाऊं का पहला राजवंश माना जाता है।

-कुमाऊं क्षेत्र में इस वंश का प्रथम शासक वसंतदेव था।

-वसंतदेव ने परमभद्वारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की थी।

-कार्तिकेय वंश के बाद इसी वंश की एक शाखा कत्यूरी वंश ने कुमाऊं पर शासन किया।

– जल्दी की कत्यूरी वंश तीन हिस्सों में विभाजित हो गया।

-इनमें रजवार वंश ने असकोट, मल्ल वंश ने डोती और आसंतिदेव के नेतृत्व में कत्यूर वंश ने कत्यूर घाटी में शासन किया।

-इसी दौरान 1191 ई॰ में पश्चिमी नेपाल के राजा अशोक चल्ल ने कत्यूरी राजा पर आक्रमण किया और कुमाऊं के कुछ हिस्सों पर अधिकार कर लिया।

-कत्यूरी वंश का अंतिम शासक ब्रह्मदेव था, जिसे बीरम देव या बीरदेव भी कहा गया है।

-बीरम देव के समय ही 1398 ई॰ में मुगल शासक तैमूर लंग ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किया।

-हरिद्वार में तैमूर और बीरम की सेना के बीच युद्ध हुआ बीरम देव मारा गया।

-इसी के साथ कत्यूरी वंश का अंत हो गया।

(नौ)

-कत्यूरी वंश के दौरान ही कुमाऊं के कुछ क्षेत्रों में चंद राजवंश ने अपने पैर जमाने शुरू कर दिये थे।

-1398 ई॰ में बीरम देव की मृत्यु के बाद सम्पूर्ण कुमाऊं क्षेत्र पर चंद वंश ने अपना शासन स्थापित कर दिया।

-चंद वंश का पहला राजा थोहरचंद था। उसकी राजधानी चम्पावत थी।

-यह एक गौभक्त राजवंश था। इनका राजचिन्ह भी गाय थी।

-इस वंश के एक राजा भीष्म चंद ने राजधानी चम्पावत से अल्मोड़ा ले जाने की ठानी।

-भीष्म चंद ने अल्मोड़ा में  एक किला भी बनाया, जिसे खगमरा किला कहा गया।

-यह किला 1560 ई॰ में बनकर तैयार हुआ, लेकिन ठीक इसी समय भीष्म चंद की मृत्यु हो गई।

-1593 ई॰ में बालो कल्याण चंद राजधानी चम्पावत से अल्मोड़ा ले गया।

-बालो कल्याण चंद ने अल्मोड़ा में लाल मंडी का किला और मल्ला महल किला बनवाया।

-चंद राजाओं के मुगल सम्राटों से अच्छे संबंध थे।

-1790 ई॰ में गोरखाओं ने कुमाऊं पर दूसरा आक्रमण किया।

– इस युद्ध में चंद वंश के अंतिम राजा महेन्द्र चंद की हार हुई। और इस तरह पूरा कुमाऊं क्षेत्र गोरखाओं के अधीन हो गया।

(दस)

-9वीं शताब्दी तक गढ़वाल क्षेत्र 52 छोटे-छोटे रजवाड़ों में बंट चुका था।

-सभी राजाओं के अपने-अपने गढ़ यानी किले थे।

-इनमें एक गढ़ चांदपुर गढ़ भी था। 888 ई॰ में भानु प्रताप चांदपुर गढ़ का राजा था।

-इस दौरान गुजरात का एक राजकुमार कनकपाल चांदपुर गढ़ आया और भानु प्रताप की पुत्री के साथ विवाह कर यहीं बस गया।

-इस तरह कनकपाल ने 888 ई॰ में चांदपुर गढ़ में परमार या पंवार वंश की स्थापना की।

-परमार वंश का 37वां राजा अजयपाल सर्वाधिक शक्तिशाली था।

-अजयपाल ने 1515 ई. में इस क्षेत्र के सभी छोटे-छोटे रजवाड़ों को जीत लिया और पूरे क्षेत्र पर एकछत्र राज्य स्थापित कर दिया।

-अजयपाल ने अपने इस नये और बड़े साम्राज्य का नाम गढ़वाल रखा।

-उसने देवलगढ़ में अपनी राजधानी बनाई।

-1517 ई॰ में अजयपाल ने राजधानी देवलगढ़ से श्रीनगर स्थानान्तरित कर दी।

-गढ़वाल के परमार शासकों के दिल्ली के मुगल शासकों के साथ अच्छे संबंध थे।

-इस वंश के राजा बलभद्र को दिल्ली के लोदी शासक बहलोल लोदी ने शाह की उपाधि दी थी।

-इसके बाद इस वंश के सभी राजा अपने नाम के साथ शाह की उपाधि लगाते रहे।

 

नाक काटी राणी

-1636 ई. में परमार शासक महीपति शाह की मृत्यु के बाद उसके नाबालिग पुत्र पृथ्वीपति शाह को गद्दी पर बिठाया गया।

– अल्पवयस्क होने के कारण रानी कर्णावती उसकी संरक्षिका बनाई गई।

-इसी दौरान मुगल सम्राट शाहजहां के सेनापति मवाजुद खां ने दून घाटी पर आक्रमण कर दिया।

-रानी कर्णावती की सूझबूझ से हमला नाकाम हुआ और कुछ मुगल सैनिक पकड़े गये।

-रानी कर्णावती के आदेश इन सैनिकों के नाक काट दिये गये।

-इसके बाद कर्णावती नाक काटी रानी के नाम से प्रसिद्ध हुई।

 

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