उत्तराखंड का इतिहास – 3

(ग्यारह)
-गोरखाओं ने 1790 में कुमाऊं पर अधिकार करने के बाद 1791 में गढ़वाल पर भी हमला किया, लेकिन इस युद्ध में वे बुरी तरह से हार गये।

-1803 ई॰ में गढ़वाल में भयंकर भूकम्प के कारण सब कुछ तहस-नहस हो गया था।

-इसका लाभ उठाकार गोरखाओं ने 1804 में फिर गढ़वाल पर आक्रमण किया और राजधानी श्रीनगर तक पहुंच गये।

-तत्कालीन गढ़वाल नरेश प्रद्युम्न शाह का पीछा करते हुए गोरखा सेना देहरादून तक पहुंच गई।

-देहरादून के खुड़बुड़ा मैदान में दोनों सेनाओं के बीच युद्ध हुआ और 14 मई, 1804 को प्रद्युम्न शाह को मार दिया गया।

-इसी के साथ कुमाऊं के अलावा सम्पूर्ण गढ़वाल पर भी गोरखाओं का आधिपत्य हो गया।

-गोरखाओं ने इस क्षेत्र पर क्रूर अत्याचार किये, जिन्हें आज भी गोरख्याणी नाम से याद किया जाता है।

-कुछ वर्षों के बाद प्रद्युम्न शाह के पुत्र सुदर्शन शाह ने अंग्रेज गवर्नर लॉर्ड हेस्टिंग्स से मदद मांगी।

-अक्टूबर, 1814 में अंग्रेजों ने गोरखाओं के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

-1815 ई॰ में देहरादून के खलंगा में अंग्रेज सेना और गोरखा सेना की बीच निर्णायक लड़ाई हुई, जिसमें गोरखाओं की अंतिम हार हुई।

– अंग्रेजों ने सुदर्शन शाह से युद्ध व्यय के रूप में 7 लाख रुपये मांगे, सुदर्शन शाह ये रकम नहीं दे सके।

-परिणाम स्वरूप अंग्रेजों ने गढ़वाल राजाओं की राजधानी श्रीनगर सहित राज्य का पूर्वी क्षेत्र अपने अधीन कर लिया।

-सुदर्शन शाह को भागीरथी घाटी का क्षेत्र दिया गया, जो वर्तमान में टिहरी और उत्तरकाशी जनपद हैं।

-सुदर्शन शाह ने भिलंगना और भागीरथी के संगम स्थल को अपनी राजधानी बनाया और इस साम्राज्य का नाम टिहरी रियासत रखा गया।

– इसके बाद अंग्रेजों ने कुमाऊं क्षेत्र से भी गोरखाओं का खदेड़ दिया।

-18 नवम्बर, 1815 को बिहार के चम्पारण में अंग्रेजों और गोरखों के बीच सिंगोली की संधि हुई।

-इस संधि के अनुसार टिहरी रियासत को छोड़कर संम्पूर्ण गढ़वाल और कुमाऊं अंग्रेजों ने कब्जे में ले लिया।
– सिंगोली संधि मार्च 1816 में लागू हुई।

(बारह)
-गढ़वाल और कुमाऊं के जिस क्षेत्र पर अंग्रेजों ने कब्जा किया उसे 27 अप्रैल, 1815 को कुमाऊं जनपद के नाम से स्थापित किया गया।

-पौड़ी गढ़वाल को कुमाऊं जनपद का एक परगना बनाया गया।

-कैप्टेन ई॰ गार्डरन कुमाऊं जनपद के पहले कमिश्नर नियुक्त किये गये।

-पौड़ी परगना को ब्रिटिश गढ़वाल के नाम से जाना गया, जिसका मुख्यालय श्रीनगर बनाया गया।

-गढ़वाल साम्राज्य में शामिल देहरादून को 1817 ई॰ में मेरठ मंडल के सहारनपुर जनपद में मिला दिया गया।

-हरिद्वार पहले से ही सहारनपुर जनपद का एक हिस्सा था।

-1840 ई॰ में पौड़ी परगना को अलग जनपद बना दिया गया और इसका मुख्यालय श्रीनगर से पौड़ी किया गया।

-1854 में कुमाऊं का एक और मुख्यालय नैनीताल बना दिया गया।

-1883-84 में पहले हल्द्वानी तक और फिर काठगोदाम तक रेलवे ट्रैक बिछाया गया।

-इसका मुख्य उद्देश्य पहाड़ के जंगलों की बेशकीमती लकड़ी का ढुलान करना था।

-24 अप्रैल, 1884 को इस रूट पर पहली ट्रेन लखनऊ से चली।

-1891 में नैनीताल को कुमाऊं का दूसरा जनपद बनाया गया।

– इस तरह देश की आजादी तक इस सम्पूर्ण क्षेत्र में तीन जनपद अल्मोड़ा, नैनीताल और पौड़ी गढ़वाल थे।

(तेरह)
– देश की आजादी के साथ ही ये तीनों जनपद भारतीय संघ का हिस्सा बन गये।

-टिहरी नरेश मानवेन्द्र शाह ने भारतीय संघ में शामिल होने से मना कर दिया।

-उस समय टिहरी रियासत की जनता राजा के अत्याचारों ने त्रस्त थी, जनता ने विद्रोह कर अंतरिम सरकार गठित कर दी।

-इसी दौरान 1 अगस्त, 1949 को मानवेन्द्र शाह ने भारत के गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई के साथ टिहरी संघ को भारतीय संघ में मिलाने का समझौता कर लिया।

-इस तरह मानवेन्द्र शाह ने अपने लिए अच्छे-खासे प्रिवीपर्स की व्यवस्था कर दी।

-प्रिवीपर्स भारतीय संघ में विलय होने वाली रियासतों के राजाओं को भारत सरकार की ओर से मिलने वाला आर्थिक लाभ था, जिसे इंदिरा गांधी ने बंद करवाया।

-24 फरवरी 1960 को टिहरी से अलग करके उत्तरकाशी, पौड़ी से अलग करके चमोली और अल्मोड़ा से अलग करके पिथौरागढ़ जनपद की स्थापना की गई।

-1970 में चमोली, पौड़ी, टिहरी और उत्तरकाशी जनपदों को मिलाकर गढ़वाल मंडल और अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ व नैनीताल जिलों को मिलाकर कुमाऊं मंडल बनाया गया।

-1975 में देहरादून को सहारनपुर जनपद से हटाकर गढ़वाल मंडल में एक जनपद के रूप में शामिल किया गया।

-1988 में हरिद्वार को भी एक जनपद के रूप में गढ़वाल मंडल में शामिल किया गया।

-26 दिसम्बर, 1995 को नैनीताल से अलग करके ऊधमसिंह नगर जनपद बनाया गया।

-15 सितम्बर, 1997 को पिथौरागढ़ जनपद से अलग करके चम्पावत जनपद की स्थापना की गई।

-तीन दिन बाद 18 सितम्बर, 1997 को चमोली जिले से अलग कर रुद्रप्रयाग और अल्मोड़ा से अलग कर बागेश्वर जनपद बनाया गया।

(चौदह)
-1 अगस्त, 2000 को लोकसभा में उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक पारित किया गया।

-10 अगस्त, 2000 को राज्यसभा में भी इस विधेयक को मंजूरी दे दी गई।

-28 अगस्त, 2000 को तत्कालीन राष्ट्रपति के॰आर॰ नारायणन ने इस बिल पर हस्ताक्षर किये।

-9 नवम्बर, 2000 को उत्तरांचल भारत का 27वां राज्य बना।

-उत्तर प्रदेश विधानसभा और विधान परिषद में इस क्षेत्र के तत्कालीन सदस्यों को मिलाकर भारतीय जनता पार्टी की अंतरिम सरकार बनाई गई।

-नित्यानन्द स्वामी अंतरिम सरकार के पहले मुख्यमंत्री बने। बाद में उनकी जगह भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाया गया।

-2002 ई॰ विधानसभा के लिए पहले चुनाव में कांग्रेस की जीत हुई और नारायण दत्त तिवारी पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री बने।

– 1 जनवरी, 2007 को उत्तरांचल का नाम बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया।

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