कहीं धूप कहीं छाया, विकास की है ऐसी माया

Vijay Bhatt/Indresh Nautiyal 

 

देहरादून मे मालदेवता दून वासियों, विशेष रूप से नौजवानों का एक पसंदिदा पिकनिक स्थल बनता जा रहा है। यहां पिकनिक खास तौर पर दो नदियों के किनारे मनायी जाती हैं। एक नदी को बांदल नदी कहा जाता है जो सुवाखोली मसूरी के पश्चिमी ढलान से बहती हुई सौंग नदी में मिल जाती है। सौंग नदी टेहरी जिले के कद्दूखाल क्षेत्र की पश्चिमी ढलान से  बहती परवादून के डोईवाला क्षेत्र को पार करती हुई क्लेमेन्टाउन क्षेत्र के भूमिगतजल ’’ओगल’’ से अस्तित्व में आई सुसवा नदी में मिल कर गंगा नदी में समाहित हो जाती है। सौंग नदी अपने साथ काफी बड़ी मात्रा में खनिज संपदा साथ लेकर आती है। देहरादून के पुराने मकानों की बुनियाद में इस नदी के पत्थर ही भवन के आधार को मजबूती प्रदान करते थे। इसी नदी से परवादून के बड़े कृषि भूभाग को सिंचित करने वाली खलंगा नहर निकलती है। खलंगा नहर का निर्माण ब्रिटिश हकूमत ने सन् 1859-60 में करवाया था। आज अंधे विकास की इस दौड़ में यह नहर भी अपना अस्तित्व खोती जा रही है। बांदल और सौग नदी देहरादून और टिहरी के बीच में सीमाओं का निर्धारण भी करते हैं। अब इस नदी के प्रवाह को रोकने के लिये प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत का ड्रीम प्रोजेक्ट ’’सौंग बांध पेयजल परियोजना’’ निर्माणाधीन है।
बरसाती चैमासे में इस इलाके के हरे भरे लहलाते खेत खलिहान, पहाड़ जंगल नदी सड़के और आस पास बसे  गांव को देखने और उनमें रहने वाले लोगों से मिलने मैं व साथी इन्द्रेश इधर चल आये। मालदेवता से आगे कद्दूखाल वाली सड़क पर लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर बांदल नदी पर लोहे का पुल आता है। इसे लाल पुल कहते हैं। इसे पार करते ही आप टिहरी जिले की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं। यहीं पर दांई ओर पूर्वी दिशा में टिहरी जिले का सीमान्त गांव बसा हुआ है। इस गांव का नाम कुमाल्डा है जो सकलाना पट्टी के जोनपुर ब्लाक की भरवाकाटल पंचायत में आता है। बांदल और सौग नदी के बीच बसा यह एक खूब सूरत गांव है। यहां धान के हरे भरे खेत मन मोह लेते हैं। इस गांव में पोस्ट आफिस, सहकारिता बैंक, राजस्व चैकी , पशु चिकित्सालय, प्रा0 स्वा0 केन्द्र , पंचायत भवन सामुदायिक भवन, स्कूल, जंगलात चैकी, सस्ते गल्ले की दुकान, राष्ट्रीयकृत बैंक, पुलिस चैकी आदि सभी कुछ सुविधायें एक किलोमीटर के दायरे में दिखाई दी। इनमें लोग भी सब काम करते हुये दिखाई दिये। राजस्व विभाग के दफतर में पटवारी जी अपने काम पर मुस्तैदी के साथ बैठे थे और ग्रामीणों के काम सहज भाव से निपटा रहे थे। इनका नाम नरेश उनियाल है । इन्होंने अपने कार्यालय की दिवारों को सभी सूचनाओं और आदर्श व दार्शिनिक वाक्यों से सुसज्जित किया हुआ था। पटवारी सहाब का व्यवहार और कार्यकुशलता देख मन को अच्छा लगा। सहकारी बैंक में भी कर्मचारी अपने काम पर लगे थे। यहां पर सिरपुर में स्टर्लिंग फार्म नाम से मशरूम फैक्ट्री भी है इसका कचरा हमें बाहर पड़ा मिला जो यहां की पारिस्थिकी को जरूर गड़बड़ कर रहा होगा। कुल मिलाकर इसे एक आदर्श गांव की संज्ञा दी जा सकती है।  कुछ देर यहां घूम फिर कर हम सौंग नदी पार कर आगे की और निकल पड़े।
हमारे घुमक्कड़ विजय भट्ट
हमने घुत्तु वाले रास्ते पर जाना तय किया। सौंग नदी के किनारे कुछ युवा अब भी पिकनिक मना रहे थे। नदी के किनारे बने चुल्हों से धुंवा निकल रहा था। खलंगा नहर के हैड पर बना जलप्रपात बरसात के इन दिनों अपने पूरे शबाब में बड़ा लुभावना लग रहा था। नदी भी अपने पूरे वेग से बह रही थी। हमारी पुरानी टीवीएस बाईक कच्चे पथरीले उबड़ खाबड़ रास्ते पर आगे बढ़ रही थी। रास्ते में रंगबिरंगी तितलियों के झुण्ड लवण का रसपान करते दिखाई दिये। रास्ते में छोटी छोटी जलधारायें उपरी पहाड़ी से बहती अपना रास्ता खुद बनाती हुई सड़क पार कर नीचे की ओर बहकर मुख्य नदी में मिलने को आतुर बह रही थी। कई जगह प्रकृति के इन मनोहारी दृश्यों को देख हम इनको तबियत से निहारने के मोह को त्याग न पाये और आखिर रूक कर इन दृश्यों को निहारा और फोटो भी ली। सड़क खराब थी और बाइक पुरानी इसलिये चढ़ाई पर कई जगह मुझे उतरना भी पड़ता। पांच किलोमीटर चलने पर आगे लैण्ड स्लाइड मिला जिसने सड़क को रोका हुआ था। बाइक खडी कर हम पैदल निकल पड़े पर कुछ ही मीटर आगे चलने पर सड़क फिर अवरूद्ध दिखाई दी। अब हमने वापिस जाकर नीचे नदी के किनारे गट्टु वाली पुरानी सड़क से जाने का निर्णय लिया।  दो तीन किलोमीटर वापिस आये और नदी की ओर जाकर पुरानी सड़क पर आगे बढ़ चले।
    नदी के किनारे किनारे चलते बेर की झाड़ियों को पार करते हम एक गांव के पास पहुंचे। यह हिलांसवाली गांव है जो देहादून जिले के रायपुर ब्लाक में आता है। शहर के घंण्टाघर से इस गांव की दूरी बमुश्कििल बीस किलोमीटर होगी और विकासखण्ड मुख्यालय से दस बारह किमी की, पर पक्की सड़क के अभाव में यहां आना कठिन ही नही जोखिम भरा भी है। कई जगह सांसे अटक जाती है। रात बिरात को यहां के लोग आपात स्थिति में चिकित्सा सुविधा के लिये कैसे व्यवस्था करते होंगे कल्पना करना भी मुश्किल है। सब कुछ राम भरोसे। हल बैलों के द्वारा यहां अभी भी पांरपरिक तरीके से खेती हो रही है। धान की अच्छी फसल है। दो किलो मीटर आगे चलने पर पंवार जी एक दुकान मिलती है। यहां हम अपनी गाड़ी खड़ी कर देते हैं। फटे जूते होने के कारण बारीश और रास्ते की हालात को देखते हुए मैने पंवार जी की दुकान से हवाई चप्पल खरीद ली। सड़क आगे रगड़ गांव होती हुई धुत्तु जाती है पर हमने  आज की घुमक्कडी को यहीं पर रोक नदी पार के गांव जाने का निर्णय लिया।

 

पंवार जी की दुकान के पीछे सौंग नदी बह रही है। नदी पार एक गांव है जिसक नाम सौंदणा हैं, यह टिहरी जिले में पड़ता है क्योकि यह नदी पार है और इस वार दुकान और आगे रगड़गांव देहरादून जिले का हिस्सा है। नदी पार जाने के लिये गरारी लगी हुई है। गरारी मतलब लोहे की मोटी तार पर पुली से लटका हुआ लोहे का झूला या पिंजरा जिसे रस्से की मदद से खींच कर नदी पार जाया जा सकता है। रोप वे पर सवारी द्वारा अपने हाथों से खींचती चलती यह ट्राली किसी सरकार या विभाग के किसी इंजिनियर ने नहीं बल्कि गांव वालों ने खुद अपने श्रम व जुगत से इसे अपने लिये बनवाया है। चैमासे में गांव जाने आने का यही एक मात्र रास्ता है। अपनी जरूरतों का पूरा करने के लिये यह पुरानी लोक तकनीक और विज्ञान का बेहतर नमूना है। हमने ने इस पर सवार होकर नदी पार कर ली। इस झूले से उतरते ही भारी बारिश ने हमारा गांव प्रवेश पर स्वागत किया। सामने ही दिखाई देने वाले घर पर हमने शरण ली। अनजाने आदमी को अपने घर में सीधा घुसते देख घर के मालिक पहले हमें सवाल पूछती निगाहों से देखा फिर सवाल दागा कि ’’आप कौन’’? हमने बारिश से बचने का हवाला देते हुए अपना परिचय दिया और घर के बरामदे में खड़े हो गये। सामने घान के हरे भरे खेत बारिश में बेहद खूबसूरत लग रहे थे। घर के मालिक पदम सिंह पंवार थे जिन्होंने सहज होने पर हमारे बैठने के लिये कुर्सी मंगवाई। फिर शुरू हुआ बातचीत का दौर। श्री पंवार जी बताने लगते हैं कि इस गांव में ही सौंग बांध पेय जल परियोजना निर्माणाधीन है। उनके गांव सौंदणा के साथ अन्य गांव भी डूब क्षे़त्र में आने के कारण 275 परिवार विस्थापित होने को है पर उचित मुआवजा व सही जगह पर पुर्नवास की अभी तक कोई योजना नही है। वह कहते हैं कि उन लोगो को थानों के बाद जाखन नदी के रवाड़े पर जमीन दिखाइ जहां बसना उन्हे पसंद नही हैं। वह यह भी कहते हैं कि जब तक उन्हें उनके पसंद की जमीन रहने को नही मिलती तब तक वे लोग इस जगह को नही छोड़ेगे। पदम सिंह कहते हैं कि यदि सरकार चाहे तो उन्हे उनकी पसंद के अनुसार रायपुर स्र्पोर्ट कालेज के पास खाली पड़ी जमीन या बालावाला में बांसों के जंगल वाली जमीन पर उन्हें विस्थापित कर सकती है।
दून घाटी का हरा-भरा गांव: तस्वीर इंद्रेश नौटियाल ने खींची
कहते हैं कि यह बांध देहरादून के दस लाख शहरियों को 2050 तक चैबीस घंटे पेयजल की आपूर्ति कर सकेगा। 130.60 मीटर उंचाई और 225 मीटर लंबाई वाली 1580 करोड़ की प्रस्तावित लागत से बनने वाली झील से जहां 275 परिवार विस्थापित होंगे वहीं 10.641 हैक्टयर भूमि भी प्रभावित होगी। एक तरफ कृर्षि भूमि को खत्म कर कांक्रीट के जंगलों का निर्माण कर देहरादून शहर के पुराने वाटर रिचार्ज सिस्टम को तहस नहस किया जा रहा है वहीं दूसरी और नदी का गला घोट कर बेशकीमती संपदा को नष्ट करना कहां का तुक है। विकास के नाम पर यह काम प्रकुति के विपरीत परवादून क्षेत्र के पानी के रिचार्ज सिस्टम को खत्म करने जैसा है।

 

हमारे बैठने के लिये जो लड़का कुर्सी लाया था उसका नाम नवीन सिंह पंवार है। नवीन सिंह राजकीय इण्टर कालेज द्वारा में ग्यारहवीं का छात्र हैं। नवीन बताता है कि उसे और उस जैसे बीच बच्चे पांच किलोमीटर पैदल चल कर पढ़ने के लिये द्वारा वाले स्कूल में जाते है। इसी तरह बीस बच्चे राजकीय इण्टर कालेज रगड़ गांव जाते हैं जिसकी दूरी भी पांच किलोमीटर है। जून से सितम्बर तक हर साल चार महिने इन बच्चों को स्कूल जाने के लिये इसी झूले नुमा खटोले पर सवार होकर नदी पर करनी होती है। नवीन बताता है कि स्कूल पहुंचने पर रास्ते की थकावट से पहली घंटी की पढ़ाई में सुस्ती आती रहती है। इस इक्कीसवीं सदी में भी राजधानी देहरादून से इतने नजदीक किसी गांव में बच्चों को इस तरह पढ़ाई करने जाना पड़े तो यह असमान विकास की अवधारणा को प्रमाणित करता है। अधेड़ उम्र के पदम सिंह पंवाार बताते हैं कि नदी पार करने के लिये इस ट्राली को उन्होंने ही बनाया। इस गांव में एक ’’घराट’’ पन चक्की भी है। उन्होंने हमे चाय भी पिलाई जिसने हमारे लिये उर्जा देने का काम किया। बारिश रूक चुकी थी। उसी गरारी पर बैठ कर हमने नदी पार की और पंवार जी से विदा लेकर वापिस घर लौट आये।
(दोनों घुमक्कड1 साथी भारत ज्ञान विज्ञान समिति से जुड़े हैं)

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