घूमते-घूमते कहां पहुंच गये विजय भट्ट और इंद्रेश नौटियाल (तीसरा हिस्सा)

Vijay Bhatt/Indresh Nautiyal

 

ब वापस देहरादून की ओर चलें। चम्बा, काणाताल, जड़ीपानी कद्दुखाल वाला रास्ता फलों के बाग बगीचों के साथ प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है। प्रकृति का आनंद लेते हुये हमारी बाईक कद्दुखाल से रायपुर जाने वाले तीखे ढालदार मार्ग पर चल पड़ी। यह इलाका अपने स्वादिष्ट आलू मटर की खेतों व नगदी फसलों के लिये प्रसि़द्ध है। सकलानी बंधुओं को अन्य गांवों के अतिरिक्त यह क्षेत्र राजा प्रदीप शाह से जागीर में मिला था। 1815में शिवराम सकलानी ने अपने पूर्वजों को दी गई जागीर के आधार पर विलियम फ्रेजर ने इस क्षेत्र का अधिकार पत्र प्राप्त कर लिया, यही कारण है कि सकलानी लोगों को माफेदार भी कहा जाता हैं। इस भूमि ने नागेन्द्र सकलानी जैसे बहादुर टिहरी जनक्रांति के योद्धा, उन्हीे के भाई पर्यावरण प्रेमी व वृक्ष मित्र के उपनाम से विख्यात बिशेश्वर दत्त सकलानी, हिन्दी साहित्य के लब्धप्रतिष्ठित कवि श्री मनोहरलाल उनियाल श्रीमन् जैसे महान व्यक्ति हमारे समाज को दिये हैं। सड़क के दाहिनी ओर खूबसूरत उनियाल गांव दिखाई दे रहा है। इसके बाद सकलानी बंधुओं का हवेली गांव और फिर सत्यों।

 

तभी ध्यान आया कि यहां उन्नत व जैविक खेती करने वाले एक किसान रहते हैं जिनका नाम भागचंद रमोला है, जिनसे मेरा परिचय देहरादून के सर्वे चैक में हर इतवार को लगने वाले जैविक सब्जी बाजार में हुआ था। इस बाजार में उनके साग भाजी के उत्पाद को देखकर मैं रमोला जी की मेहनत व व्यवहार के प्रति आकर्षित तो था ही और आज उनके गांव से होकर गुजरने का अवसर भी था, तो सोचा कि क्यों न रमोला जी से मिल लिया जाय। रास्ते में मंजगांव आ गया जो भागचन्द रमोला का गांव है। हमने रास्ते में खड़े एक आदमी से रमोला जी के घर के बारे में पूछा तो उस सज्जन ने उन्हें कृषक संबोधित करते हुए उनके घर जाने का सटीक मार्गदर्शन कर हमारी मदद कर दी। अब हम पहुॅंच गये रमोला जी के घर। वे घर के बहार वाले खेत में अपनी पत्नि के साथ निलाई गुढ़ाई कर रहे थे। हमने उन्हें सलाम ठोका। वो हमारी तरफ मुखातिब होकर प्रसन्नता के साथ बोले -’’ पंड्जी आज आप आ ही गये आओ आओ बैठो। वो तुरंत काम छोड़कर हमारे साथ घर पर आ गये। हम उनके पुराने वाले परंपरागत पठाल वाले घर की तिबारी पर जा कर बैठ गये। उन्होंने कहा भी कि यहां धूल मिट्टी जमी होगी क्योंकि अब यहां कोई रहता नही है इसलिये आप नये वाले घर पर चलें। हमने उनसे कहा कि इस मिट्टी वाली तिबारी पर बैठने का आनंद हमे लेने दो।

चांठी-डोबरा का बहुचर्चित पुल।

हम बैठे ही थे कि बहनजी मतलब उनकी पत्नि ताजी काखड़ी तोड़ कर ले आई। नमक के साथ ताजी रसीली खुशबुदार काखड़ी खाने का लुत्फ उठाया। अब वो हमें अपने सब्जी के खेत दिखाने ले गये। अब हमें पता चला कि उनके खेतों में तो जापान की सब्जी उगायी जा रही है। जापानी मूली, जापानी कद्दु, जापानी पालक जापानी बीन्स आदि आदि खेत दिखाते हुये वह इन सब्जियों के बारे में बताये जा रहे थे। वे बात करते हुये बार बार इस बात पर भी चिंता जाहिर कर रहे थे कि न जाने क्यों यहां के लोग इस प्रकार की खेती जो कि आय का अच्छा खासा स्रोत भी है, न कर मैदानी इलाकांे को पलायन कर रहे हैं। वो यहां से सब्जी पैक कर, जापानी दूतावास को भेजते हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने बागवानी में अठ्ठारह महिनों का प्रशिक्षण इलाहाबाद में लिया है। वे अपने खेतों में कीवी के पोधे भी दिखाते हैं। भागचंद रमोला जी की इस हरी भरी जैविक खेती को देख कर मन बाग बाग हो गया था। इतने में बहन जी ने हमारे लिये दोपहर का भोजन तैयार कर दिया था। घर पर स्वाद से परिपूर्ण भोजन खा कर हम तृप्त हो गये। दोपहर भोजन के बाद रमोला जी हमें थोड़ा सा दूर के खेत दिखाने ले गये। रास्ते में पानी के प्रेशर से चलने वाले, आटा पीसते गांव के घराट को देखा। अपने उद्गम स्थल से बहती हुई सौंग नदी के दौनो ओर फैली मनमोहक घाटी को भी देखा जहां मटर की खेती तैयार हो रही थी। रमोला जी बताते हैं कि सुरकंडा देवी के पहाड़ से चार नदियां निकलती हैं। जिनमें पश्चिमी ढलान से सौंग व बांदल तो देहरादून से बहती हुई गंगां नदी में मिल जाती हैं और उत्तरी ढलाल से अलगाड़ जौनपुर होती हुई यमुना नदी में मिलती है तथा एक नदी भल्डियाणा में भागीरथी से मिलती है। शाम के चार बज चुके थें। रमोला जी के साथ घर पर चाय पी और उनसे अब जाने की अनुमति मांगी। उन्होंने सम्मोण के बतोर हमारे लिये एक कट्टे मेे अपने खेती के उत्पाद रख दिये थे। अब शाम के पांच बज चुके थे। रमोला जी व उनके परिवर का स्नेह पूर्ण व्यवाहर हमारे दिल की गहराइयों को छू गया था। फिर आने का वायदा कर हमने रमोला जी से विदाई ली और देहरादून के लिये चल पड़े।

 

मरोडा पुल आनन्द चोक होते हुये हम माल देवता की तरफ आगे बढ़ते रहे। दूबड़ा से पहिले अंघेरा हो गया था। धीरे धीरे करके बड़ी सावधनी बरतते हुये हम भरवलकाटा पहुंच गये। माल देवता पहुंच कर हमारी जान में जान आई क्योंकि बाईक में लाइट बहुत कम थी, हार्न बजता नही था और ब्रंेक न के बराबर। वो तो इन्द्रेश था जिसने अनुभव के आधार पर सावधानी के साथ ब्रेक गियर क्लच का संतुलन बनाते हुये सुरक्षित बाइक चलाई। रात आठ बजे हम घर पहुॅंच गये इस तरह तीन दिन का यह रोमांचकारी सफर समाप्त हुआ।

 

लेखकद्वय घुमक्कड़ और सोशल एक्टिविस्ट हैं।

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