अब जोशीमठ की जड़ पर प्रहार

ऐतिहासिक नगर जोशीमठ का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है

जोशीमठ शहर धंस रहा है। इस पोर्टल के सहयोगी यूट्यूब चैनल ने इस वर्ष की शुरुआत में इस पर तीन वीडियो बनाए थे। ये वीडियो देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह एक पूरा का पूरा शहर धंस रहा है और इस ऐतिहासिक नगर का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है। हाल के दिनों में कई चैनलों पर और मीडिया में इस बारे में खबरें छपी। वैज्ञानिकों के एक स्वतंत्र कमेटी के बाद एक सरकारी कमेटी ने भी जायजा लिया और माना कि अब मोरेन में बसे जोशीमठ क्षेत्र में क्षमता से ज्यादा निर्माण हो चुके हैं। इसलिए अब बस करना होगा।

लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। अब जोशीमठ की जड़ पर ही प्रहार हो रहा है। हेलंग से विष्णु प्रयाग तक बाईपास रोड बनाने की जो योजना वर्षों पहले रोक दी गई थी, वह फिर से शुरू कर हो चुकी है। यह बाइपास रोड अलकनन्दा नदी के किनारे-किनारे उस चट्टापन को काटकर बनाई जा रही है, जिस पर जोशीमठ टिका हुआ है। यानी कि धंसते हुए जोशीमठ की जड़ काटने का काम शुरू हो चुका है। ऐसे में अब यह शहर, जिसे बचाने के लिए लगातार आवाज उठाई जा रही थी, पूरी तरह से खतरे में डाल दी गई है।

जोशीमठ और आसपास के लोग इसका विरोध कर रहे हैं। इस बारे में पिछले दिनों एक बैठक भी हुई। बैठक के बाद प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन भेजा गया। यह ज्ञापन अपने आप में एक दस्तावेज है। यह ज्ञापन जोशीमठ की वस्तुस्थिति को बयान करने के लिए काफी है। लेकिन, ज्ञापन देने का कोई लाभ हो तब न। मौजूदा राज्य और केन्द्र की सरकारों के लिए ज्ञापन जैसी चीजों की कीमत कागज के एक पुलिंदे से ज्यादा कुछ नहीं। सरकारें और उसके अधिकारी तो ज्ञापन पढ़ेगे नहीं। लेकिन यह महत्वपूर्ण ज्ञापन हर किसी को पढ़ना चाहिए, इसलिए यहा प्रकाशित किया जा रहा है।

जोशीमठ के इस क्षेत्र में हो रहा भूधंसाव।

जोशीमठ उत्तराखण्ड में भारत चीन सीमा पर बसा अंतिम नगर है। इस नगर का ऐतिहासिक महत्व है। कत्यूरी राजवंश की राजधानी होने से इसका उत्तराखण्ड के इतिहास में खास महत्व है। शंकराचार्य के यहां आने ज्ञान पाने व प्रथम मठ स्थापना के बाद इस नगर का धार्मिक सांस्कृतिक महत्व पिछले 13 सौ सालों में लगातार बढ़ा ही है। पिछले 30 चालीस सालों में इस नगर का पर्यटन महत्व भारत की सबसे लंबे रोपवे बनने से व औली के स्कीइंग केंद्र बनने से बढ़ता गया है।

सेना, आईटीबीपी, गढ़वाल स्काउट्स के यहां मुख्यालय होने से इस नगर का रणनीतिक महत्व है। पिछले एक दशक में इसके महत्व बढ़ने से इस नगर की आबादी में भी बहुत वृद्धि हुई है।

यह क्षेत्र पूर्व से ही भूस्खलन का क्षेत्र रहा है। भू गर्भ शास्त्रियों के अनुसार यह मोरेन पर बसा है। उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा गठित 1976 की मिश्रा कमेटी ने इस पर विस्तृत रिपोर्ट देते हुए इस नगर को बचाए रखने के लिए यहां भारी निर्माण पर रोक लगाने की सिफारिश की थी। उस पर अमल न होने से आज क्षेत्र की भार ग्रहण क्षमता से बहुत अधिक आबादी व निर्माण का यहां संकेन्द्रण हुआ है।

नवम्बर 2021 के बाद से नगर के बहुत से घर मकानों पर दरारें आनी शुरू हुई । बहुत सी सड़कें धंसाव के चलते बैठ गईं, व टेढ़ी हो गईं । बहुत से क्षेत्र में भू स्खलन बढ़ गया । जिससे लोगों में चिंता बढ़ गयी।
जिसके बाद स्वतंत्र वेैज्ञानिकों की टीम ने और उसके बाद राज्य सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की टीम ने क्षेत्र का सर्वेक्षण कर अपनी रिपोर्ट दी है। जिनमें नगर की स्थिति अत्यंत संवेदनशील बताई गयी है। यहां किसी भी तरह के भारी निर्माण से नगर का अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है। सभी रिपोर्ट सरकार के पास हैं सार्वजनिक हैं।

जोशीमठ की सड़कों पर बन रहे ऐसे गड्ढे।

ऐसे में जब कि नगर के अस्तित्व पर ही सवाल है तब नगर के ठीक नीचे नगर की जड़ में चट्टानों को तोड़ कर बाईपास बनाने से नगर को और खतरे में डालना है। जबकि नगर में वैकल्पिक मार्ग की पर्याप्त उपलब्धता है।

सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देश पर केन्द्र सरकार द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति (डॉ रवि चोपड़ा कमेटी) ने भी इस संदर्भ में अपनी आपत्ति दर्ज करते हुए नगर में पहले से उपलब्ध मार्गों के चौड़ीकरण का विकल्प सुझाया था।

जोशीमठ नगर के महत्व को देखते हुए और इस नगर के नागरिकों के जीवन सुरक्षा के मद्देनजर जबकि यह लगातार आपदा संवेदी क्षेत्र चिन्हित है, इस बाईपास कार्य को तुरन्त रुकवाया जाय।

इसके बावजूद अगर इस देश के लिए यह बहुत ही आवश्यक हो तो जोशीमठ नगर को कहीं अन्यत्र बसाने के विकल्प पर विचार किया जाय। पुरानी टिहरी की तरह ही हमें हमारे जल जंगल जमीन हक हकूक समेत कहीं अन्यत्र बसाया जाय।

अत्यंत संवेदनशील इस विषय पर शीघ्र कार्यवाही की अपेक्षा है।

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