खेल, खेल मैदान, खेल पदक और खेल का अधिकार

फिल्म का बहिष्कार या हिन्दू मुस्लिम बहस तक सिमट गये हैं हम

डॉ. प्रेम बहुखंडी

 

(पूर्व शोध प्रमुख राज्य सभा टीवी)

 

 

र्जेंटीना ने फीफा विश्वकप जीत लिया, भारत के लोगों में, विशेषकर उत्तराखंड में, एक विशेष प्रकार की उत्तेजना दिखाई दे रही है। कल से ही सोशल मीडिया में फुटबॉल के प्रति लोगों की दीवानगी देखने लायक थी। लेकिन, यह दीवानगी सिर्फ फुटबॉल को लेकर नहीं थी, बल्कि क्रिकेट के वक्त भी लोगों, विशेषकर युवा वर्ग में यही दीवानगी देखने को मिलती है।

स्पष्ट नहीं है लेकिन सामान्य चर्चा में कहा जाता है कि एक वक्त भारत की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में देहरादून के आठ खिलाडी थे। हालाँकि जो लोग 50 वर्ष की उम्र या उससे अधिक के हैं, उन्होंने देहरादून में फुटबॉल को लेकर जुनून देखा ही है, राज्य बनने से पहले, देहरादून में चारों तरफ खेल के मैदान थे, कहीं न कहीं या तो टूर्नामेंट हो रहा होता था या युवा फुटबॉल खेल रहे होते थे। लेकिन आज देहरादून जितनी तेजी से फैला है उसने उतनी ही तेजी से देहरादून के खेल मैदान खा दिए हैं, लेकिन इस पर न तो कोई खेल प्रेमी कुछ बोल रहा है और फिर सरकार से तो उम्मीद ही क्या करनी है।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि भगवत गीता को वही पढ़ और समझ सकता है जो मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ हो। फुटबॉल खेलो, क्योंकि उससे शारीरिक और मानसिक विकास होता है। वर्तमान सरकार और उसका मातृ संगठन दिनभर स्वामी विवेकानंद के नाम से झूठे-सच्चे किस्से गाता रहता है लेकिन खेलों को लेकर जो उनकी समझ थी उसके अनुसार खेल मैदान विकसित करने पर किसी का कोई ध्यान नहीं रहता है।

ऐसी कई जगह हैं, जिन्हें मामूली बजट में ही खेल मैदान बनाया जा सकता है।

सिर्फ फुटबॉल या क्रिकेट ही नहीं, बल्कि खेलों को लेकर, भारतीय समाज में एक अजीब सा दोहरा मापदंड दिखाई देता है। अगर ओलम्पिक या कॉमनवेल्थ खेलों में खिलाड़ी पदक नहीं जीत पाते हैं, या हॉकी/फुटबाल जैसे खेलों में टीम हारती है तो सबको लगता है कि खेलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। लेकिन, जब सचमुच खेलों को बढ़ावा दिए जाने के लिए प्रयास किये जाए जाते हैं तब लोगों को लगता है कि खेलने से ज्यादा जरूरी पढ़ाई लिखाई हैं। कभी कभी चुनाव में भी लोग शिक्षा के बारे में बात कर लेते हैं, पर शायद ही कभी हुआ हो जब खेलों का मुद्दा किसी चुनाव या राजनैतिक दल के एजेंडा में आया हो। इसीलिए खेलने के अधिकार को आज तक मान्यता नहीं मिल पाती है। जबकि यूनिसेफ के बाल अधिकारों के चार्टर पर भारत सरकार ने हस्ताक्षर किये हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा है कि प्रत्येक बच्चे को आराम करने, मस्ती करने, खेलने और सांस्कृतिक तथा रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार है।

यूनिसेफ के इस चार्टर से बंधी सरकार आधे अधूरे मन से प्रयास करती है और समाज और शिक्षा व्यवस्था उस आधे प्रयास को भी धत्ता बताने में कोई कमी नहीं करती है. समाज आज भी मानता है कि श्पढोगे लिखोगे बनोगे नबाब, खेलोगे – कूदोगे बनोगे ख़राबश् और यही कारण है कि खेलों में देश की स्थिति बद से बदत्तर होती जा रही है। इसलिए भारतीय समाज को जब भी मौका मिलता है सबसे पहले खेल मैदान पर कब्ज़ा करके धर्मस्थल बना देते हैं।

हालाँकि खेल सिर्फ पदक जीतने के लिए ही नहीं हैं बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थय के लिए भी आवश्यक हैं, समाज के अंदर एक सकारात्मकता, जीत हार को सामान रूप से स्वीकारने की क्षमता, तथा टीम भावना को भी बढ़ावा देने में खेलों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। खेल, खेलों का महत्व व बच्चों के अधिकारों पर जितनी भी चर्चा की जाय वह कम ही है लेकिन इस सबके बावजूद यह एक कटु सत्य है कि खेलना जहाँ शारीरिक और मानसिक स्वास्थय के लिए लाभकारी है वहीं खेल समाज की अनेक समस्याओं का हल भी है।

एक सर्वे के अनुसार दिल्ली शहर में लगभग 15000 खुली जगह हैं, जहां पर खेला जा सकता हैं। लेकिन अधिकांश खुली जगहों पर या तो बिल्डर्स का कब्ज़ा है या फूल पत्ती लगाकर खूबसूरत पार्क बना दिए गये हैं अर्थात ओर्नामेंटल पार्क हैं, बिल्डर्स ने खुली जगह पर कब्ज़ा कर लिया है शादी, ब्याह, बारात के काम हो रहे हैं, या बुजुर्गों और प्रेमी जोड़ों के बैठने की जगह बन चुकी है, नशेड़ी – और अपराधियों के अड्डे बन चुके हैं, और बच्चों के खेलने के लिए सिर्फ 126 जगह हैं । खेलने का दूसरा बेहतरीन स्थान होता है स्कूल, लेकिन अध्ययन बता रहे हैं कि 68 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में खेलने के मैदान ही नहीं हैं। बाकी जो बच्चे बड़े स्कूलों में जाते हैं, उन पर करियर के नाम पर इतना बोझ डाल दिया है कि उनके पास खेलने का समय ही नहीं है। उत्तराखंड में खेल के मैदानों की क्या स्थिति है, पता नहीं रू पर जब देश की राजधानी का इतना बुरा हाल है तो फिर पर्वतीय क्षेत्र के विषम भौगोलिक स्थिति में खेल के मैदान की कल्पना भी बेईमानी सी लगती है।

भारत में खेलों को लेकर सरकार का नजरिया देखना हो तो उसके लिए सरकार के खेल बजट पर नजर डालना जरूरी है। आंकड़े पुराने हैं लेकिन स्थिति वही है जो तब थी, अर्थात भारत में आज भी प्रति व्यक्ति खेलों पर औसत खर्चा 3 पैसे प्रतिदिन से अधिक नहीं है। जबकि अमेरिका प्रतिव्यक्ति रोज 22 रुपये खर्च करता है, ब्रिटेन 50 पैसे और छोटा सा देश जमैका जहाँ 19 पैसे प्रतिदिन खर्च करता है।

ओलम्पिक में 1920 से लेकर आजतक भारत ने सिर्फ 24 पदक जीते हैं। 1928 से 1980 के बीच 8 स्वर्ण पदक हाकी में मिले थे, 2008 में अभिनव बिंद्रा ने शूटिंग स्वर्ण पदक में दिलाया था। पिछले ओलम्पिक में नीरज चोपड़ा को भाला फेंक प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक मिला था।

उत्तराखंड के एक क्रिकेट खिलाडी को इस बार बी.सी.सी.आई की टीम से खेलने का मौका मिल रहा है, लेकिन सच यह भी है कि उस खिलाडी के नाम से उसके पिता ने इसके पैदा होने से पहले ही क्रिकेट अकादमी शुरू कर दी थी, और खुद का क्रिकेट मैदान भी है। अर्थात खेलने की सुविधा के साथ खेल के प्रति सम्मान और जुनून भी था।

अर्जेंटीना दक्षिण अफ्रीका का एक देश है जिसका कुल क्षेत्रफल 2,780,400 वर्ग किलोमीटर और जनसँख्या 47,327,407 और जनसँख्या घनत्व 14.4 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। भारत का क्षेत्रफल 3,287,263 वर्ग किलोमीटर और जनसँख्या 1,375,586,000 (अनुमान 2022) और जनसंख्या घनत्व 418.3 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। मानव विकास सूचकांक में भारत 132 नंबर पर है जबकि अर्जेंटीना 47 वें नंबर पर। अगर थोडा प्रयास किया जाये तो क्या भारत सुनील क्षेत्री जैसे 11 खिलाडी तैयार नहीं कर सकता है।

वर्तनाम समय में दुनिया के सक्रिय खिलाड़ियों में भारतीय फुटबॉल कप्तान सुनील क्षेत्री पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो और अर्जेंटीना के लियोनेल मेसी के बाद सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीय गोल करने वाले तीसरे नंबर के खिलाड़ी हैं, और आज तक के सभी खिलाडियों में उनका नंबर पांचवा है। उन्होंने सबसे अधिक बार अपने देश की टीम के लिए खेला है अर्थात वे सबसे अधिक कैप्ड खिलाड़ी भी हैं। पर, इससे हमें क्या है, हमें तो न खेल से मतलब है न खिलाड़ी से और न खेल के अधिकार से। हम तो अपनी हर गलती के लिए नेहरू को गाली दे देंगे, ताकि मूर्खों को अपने पक्ष में लामबंद कर सकें। लेकिन जब बात आएगी स्थिति को सुधारने की तो हम किसी फिल्म का बहिष्कार या हिन्दू मुस्लिम बहस से आगे नहीं बढ़ेंगे .

 

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