कॉलेजों में बढ़ रही वामपंथी संगठनों की सक्रियता

गढ़वाल विश्वविद्याल के बाद डीएवी में भी जीत की शुरुआत

पिछले लंबे अर्सें से उत्तराखंड में छात्रसंघ चुनावों में वामपंथी छात्र संगठनों को हार का सामना करना पड़ता रहा है। एक दौर तो ऐसा भी आया, जब लगा कि वामपंथी संगठन जीतने के लिए नहीं, सिर्फ उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए कहीं-कहीं, कुछ-कुछ पदों पर उम्मीदवार खड़े कर रहे हैं। उत्तराखंड की कई घाटियों को एक समय लाल घाटी कहा जाता था। घाटियों से लाल झंडे के नीचे ऐतिहासिक जन संघर्ष भी हुए। टिहरी राजशाही के खिलाफ निर्णायक लड़ाई न होती, यदि घोर वामपंथी नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी की शहादत न हुई होती। वामपंथ के इस मजबूत गढ़ मंे हाल के वर्षों में वामपंथी छात्र संगठनों की स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी थी कि उनके पास सदस्यों की संख्या भी गिनी-चुनी रह गई थी।

दरअसल हाल के वर्षों में सत्ता संभाल रहे संगठनों ने वामपंथ को जिस तरह से निशाने पर लिया या यूं कहें कि इसे धारा को बदनाम करने का प्रयास किया, निःसंदेह उसका असर पड़ा है और छात्र व युवा वामपंथी संगठनों ने दूर रहे हैं। सत्ता और सत्ताधारी हाल के वर्षों में जिस तरह से झूठ परोसते रहे और जिस तरह आम लोग उसके झूठ को अकाट्य सत्य मानते रहे, यही झूठ वामपंथ और वामपंथी संगठनों के बारे में भी कहा गया। यही वजह है जनता के लड़ाई में हमेशा अग्रणी रहे वामपंथी संगठन हाशिये पर जा पहुंचे। इसमें वामपंथी छात्र संगठन भी शामिल हैं।

छात्रसंघ के लिए मतदान के दौरान डीएवी पीजी कॉलेज देहरादून का नजारा।

लेकिन अब लगता है स्थितियां बदल रही हैं। उत्तराखंड में 24 दिसंबर को हुए छात्र संघ चुनाव में सत्ताधारी पार्टी ने अपने छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के उम्मीदवारों को जिताने के लिए हरसंभव प्रयास किया था। पैसे पानी की तरह बहाये गये। देहरादून के डीएवी पीजी कॉलेज में चुनाव के दौरान इस संगठन की ओर से जमकर हुड़दंग मचाया जा रहा था। पार्टी के कई नेता और पुराने एबीवीपी कार्यकर्ता मतदान के दौरान कॉलेज परिसर में मंडराते नजर आ रहे थे। आधा शहर एबीवीपी के उम्मीदवारों को पोस्टरों और बैनरों से अटा पड़ा था। इस सबके बीच डीएवी पीजी कॉलेज में उपाध्यक्ष पद पर एसएफआई उम्मीदवार की जीत कुछ संकेत तो अवश्य देती है।

सत्तापक्ष की ओर से हर तरह के हथकंडे अपनाने के बावजूद डीएपी पीजी कॉलेज में उपाध्यक्ष पद पर सोनाली नेगी ने 1562 मत हासिल किये और 597 मतों से जीत दर्ज की। दो वर्ष पहले हुए छात्रसंघ चुनाव में डीएवी कॉलेज में सुप्रिया भंडारी ने उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा था। हालांकि सुप्रिया की जीत नहीं मिली थी, लेकिन लंबे अर्से बाद यहां एसएफआई को सम्मानजनक वोट मिल पाये थे। दो वर्ष पहले मिले इस उत्साहवर्द्धक समर्थन के एसएफआई से जुडे़ छात्र ज्यादा सक्रिय हुए। नितिन मलेठा, हिमांशु चौहान, शैलेन्द्र पंवार, मनोज कुंवर सहित तमाम इस दौर में न सिर्फ कॉलेज परिसर तक सीमित रहे, बल्कि कॉलेज परिसर से बाहर सामाजिक लड़ाइयों में भी शािमल हुए।

चमोली जिले के हेलंग में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार का मामला हो या फिर अंकिता हत्याकांड का, देहरादून में होने वाले तमाम जन आंदोलन हों या फिर पेड़ और पर्यावरण बचाने के लिए उठने वाली आवाजें। एसएफआई के कार्यकर्ता लगातार सक्रिय रहे हैं।

डीएवी के अलावा कुछ अन्य जगहों पर वामपंथी छात्र संगठनों ने जीत दर्ज की। कर्णप्रयाग में विश्वविद्यानलय प्रतिनिधि पद पर अरमान कठैत ने जीत दर्ज की। इससे पहले गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में भी वामपंथी संगठनों से जुड़े तीन उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी।

कुल मिलाकर इस दौर में जबकि धर्म और जाति की राजनीति चरम पर है। धर्म के नाम पर लोग एक दूसरे का गला काटाने के लिए तैयार हैं और काट भी रहे हैं, जब चारों तरफ नफरत परोसी जा रही है, ऐसे समय में वामपंथी संगठनों के प्रतिनिधियांे की ये छोटी-छोटी जीतें महत्वपूर्ण हो जाती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह सिलसिला लगातार आगे बढ़ेगा और नफरत की राजनीति से पहले कॉलेजों और फिर क्रमशः पंचायतों, नगर निकायों, विधानसभाओं और फिर लोकसभ तक को मुक्त किया जा सकेगा।

 

सहयोग की अपील

आज जबकि मुख्यधारा का मीडिया दलाली और भ्रष्टाचार के दलदल में है। पोर्टल वालों को सत्ता की तरफ से साफ निर्देश हैं कि सरकारी लाभ पाना है तो सिर्फ सरकार की तारीफ करो। ऐसे में हम ‘सरकार नहीं सरोकारों की बात’ ध्येय वाक्य के साथ बात बोलेगी पोर्टल और यूट्यूब चैनल चलाने का प्रयास कर रहे हैं। इस मुहिम को जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की आवश्यकता है।

इस बार कोड को स्कैन कर यथासंभव आर्थिक सहयोग करें।

Leave A Reply

Your email address will not be published.