काया और माया का फेर (पुराना व्यंग्य)

पिछले दिनों देश में दो बड़ी घटनाएं हुईं, एक तो भ्रष्टाचार को लेकर बड़ा हो-हल्ला हुआ। अन्ना हजारे जंतर-मंतर पर बैठ गये। उनके समर्थन में वहां बहुत सारे लोग पहुंचे, जो नहीं पहुंचे वे इंटरनेट पर एकजुट हुए। उनके सामने केंद्र की सरकार झुक गयी और बाद में पता चला कि अकड़ गई। उधर बाबा रामदेव कहां चुप बैठने वाले थे, लिहाजा वे रामलीला मैदान में जाकर बैठ गये, पर पुलिस से उनका बैठना देखा गया, आधी रात को लठ चला दिये। बेचारे बाबा किसी महिला के कपड़े पहनकर भागने लगे, पर पकड़े गये। दूसरे दिन पुलिस उन्हें हरिद्वार के पास जौलीग्रांट हवाई अड्डे पर छोड़ गई। बहरहाल इस पर ज्यादा लिखने का कोई तुक नहीं है, सभी टीवी पर देख चुके हैं और अखबारों में पढ़ चुके हैं। मेरा विषय यहां दूसरी घटना है, जिसके बारे में लिखने जा रहा हूं।
यह घटना पता नहीं लोगों को बड़ी लगी या नहीं पर मुझे लगी और इसीलिए इस घटना पर मैं की-बोर्ड चलाने बैठा हूं। हुआ यह कि एक बड़े अखबार में एक बड़े लेखक का एक बड़ा लेख छपा। अखबार को मैं बड़ा इसलिए कह रहा हूं कि वह अखबार दावा करता है कि उसे देश के सबसे ज्यादा लोग पढ़ते हैं। लेखक को बड़ा इसलिए लिख रहा हूं कि लेख के आखिर में पतले अक्षरों में लिखा है कि लेखक उसी अखबार की एक मैग्जीन की एक भाषा विशेष के संस्करण के संपादक हैं और लेख को बड़ा इसलिए कह रहा हूं कि कोई भी लेख यदि किसी अखबार के संपादकीय पेज पर जगह पा ले तो वह अपने आप ही बड़ा लेख हो जाता है।
मुझे लग रहा है प्रस्तावना कुछ ज्यादा ही खिंच गई है, एकता कपूर छाप सीरियलों की तरह। चलिए मुख्य विषय की ओर लौटते हैं। उस लेख का शीर्षक है ‘‘काया और माया दिखाने की चीज नहीं होते’’। लेख में इस बात पर सख्त अफसोस जताया गया है कि आजकल की महिलाएं मॉडर्न कपड़े पहन रही हैं। मुझे परम संतोष हुआ कि लेखक महोदय लेखक होने के साथ ही महिलाओं के कपड़ों को निहारने का काम भी काफी जिम्मेदारी के साथ निभा रहे हैं और लगे हाथ कपड़ा पुलिस का रोल भी निभा रहे हैं। कपड़ा पुलिस मैं उन लोगों को कहता हूं, जो तू कौन मैं खामख्वाह की तर्ज पर लोगों, और खासकर महिलाओं के कपड़ों को निहारने का काम करते हैं। कपड़ा पुलिस किस्म के लोग इस बात से बेहद चिन्तित रहते हैं मॉडर्न कपड़ों से महिलाओं के शरीर भरे-पूरे लगते हैं और इससे हमारी संस्कृति का सर्वनाश हो गया है। गोया संस्कृति ऐसी टुच्ची चीज हो गई कि एक महिला के कपड़े उसे रसातल में पहुंचाने के लिए काफी हों।
लेख को पढ़कर लगा कि कपड़ा पुलिस लेखक महोदय को जीव विज्ञान का भी अच्छा-खास ज्ञान है। लेख में जीव विज्ञान का हवाला देकर बताया गया था कि महिलाओं को मॉडर्न कपड़े बिल्कुल भी नहीं पहनने चाहिए, क्योंकि उनके ऐसे कपड़े देखकर पुरुषों के मन में क्या-क्या विचार उठते हैं, महिलाएं उसे नहीं समझ सकतीं। लेखक के अनुसार पुरुष के शरीर में कुछ खास तरह के एंजाइम होते हैं जो किसी भी मॉडर्न किस्म की महिला को देखकर सक्रिय जाते हैं। हालांकि किस जीव वैज्ञानिक ने पुरुष के शरीर के उस खास एंजाइम की खोज की उसका नाम लेखक ने नहीं लिखा, कहीं खुद ही न खोज लिया हो अपने ही शरीर में।
जहां तक एंजाइम की बात है तो स्त्रियों और पुरुषों के शरीर में कुछ खास एंजाइम तो होते ही हैं, जो दोनों को एक दूसरे की ओर आकर्षित करते हैं, उनमें प्रेम संबंध स्थापित होते हैं, जो सृष्टि को आगे बढ़ाने में मददगार होते हैं। फिर बीच में ये मॉडर्न कपड़े कहां से आ टपके? वैसे भी लेखक महोदय को मैं एक बात तो यह जरूर कहना चाहूंगा कि खाना, पहनना और प्रेम करना किसी भी व्यक्ति कें नितांत निजी मामले होते हैं, कोई भी व्यक्ति, चाहे वह बड़ा लेखक ही क्यों न हो, किसी के इन निजी मामलों में ताकझांक कैसे कर सकता है और यदि कर रहा है तो वह किसी के व्यक्तिगत अधिकारों का हनन कर रहा है।
जहां तक मॉडर्न कपड़ों वाली महिलाओं को देखकर पुरुष में लेखक वाले उन खास एंजाइम के सक्रिय हो जाने का सवाल है तो मैं यह महत्वपूर्ण जानकारी लेखक महोदय और उनके जैसे विचार रखने वाले लोगों को जरूर दूंगा कि यदि सच में ऐसा होता तो भीख मांगने वाली महिलाओं, मानसिक संतुलन खो बैठी मैली-कुचैली महिलाओं, फुल ड्रेस में रहने वाली सरकारी स्कूलों की बच्चियों और गांवों में रहने वाली घूंघटवाली महिलाओं के साथ बलात्कार नहीं होते। इस देश में यह सब हो रहा है। यदि एंजाइम केवल मॉडर्न महिलाओं को देखकर ही सक्रिय होते हैं तो पूछा जा सकता है कि बेचारी सी इन महिलाओं के साथ यह सब क्यों हो रहा है?
आपको नहीं लगता कि महिलाओं को गलत बताने के लिए पुरुष वर्ग ने एक नया हथियार पा लिया है? मैं मानता हूं कि मॉडर्न या अच्छे कपड़े पहनकर महिलाएं ज्यादा सुन्दर दिखने लगती हैं, लेकिन क्या सुन्दर दिखना पाप है। लेखक महोदय और उन जैसे तमाम लोग आखिर सुन्दरता को सुन्दरता की तरह क्यों नहीं लेते, क्यों वे हर जगह अपनी दिमागी गंदगी को उड़ेल देते हैं? लेकिन पुरुष हमेशा इस प्रयास में रहा है कि किसी न किसी तरह से खुद को महिला से ङ्घोष्ठï साबित किया जाय। किसी महिला से बलात्कार करने को वह अपनी मर्दानगी मानता है, लेकिन जब बलात्कार के दोषियों को दंड देने के लिए सख्त कानून बने तो महिला पर बलात्कार करने को पुरुष का पुरुषोचित अधिकार मानने वाले लोग बलात्कार में महिला की गलती निकालने के प्रयास में जुट गए हैं। जीव विज्ञान के (कु)तर्क देकर यह साबित करने का प्रयास किया जा रहा है कि देखो जी यदि महिला मॉडर्न कपड़े पहनेगी तो जीव विज्ञान के नियम के अनुसार उसके साथ बलात्कार तो होगा ही होगा। कानून बेशक बलात्कारी को सजा दे दे, लेकिन कम से कम समाज की नजरों में तो इस तरह के प्रयास करके उसे दूध का धुला और जीव विज्ञान के नियमों तथा महिलाओं के फैशन का मारा साबित किया ही जा सकता है, यानी बलात्कार को कानूनी न सही, सामाजिक स्वीकृति तो मिल ही जाए।
एक और बात जो इस लेख में गौर करने लायक है, इसे पढ़कर तो आपको मानना ही पड़ेगा कि लेखक महोदय का इरादा क्या है। लेख में हर्षद मेहता का उदाहरण दिया गया है, कहा गया है कि कई लोग दो नंबर का पैसा कमा रहे हैं, लेकिन अपनी माया को वे दिखा नहीं रहे हैं और मौज कर रहे हैं, लेकिन हर्षद ने ऐसा नहीं किया, उसने अपनी माया को दिखाया और बर्बाद हो गया। तो क्या लेखक महोदय महिलाओं से यह कहना चाहते हैं कि वे भीतर से तो जो कुछ भी करें, यानी हर्षद मेहता की तरह खूब दो नंबरी काम करें, लेकिन बाहर से लज्जाशीला और सौम्यता की मूर्ति नजर आएं और केवल देखने में ही आदर्श भारतीय नारी की छवि पेश करें, हर्षद मेहता के अलावा उन लोगों की तरह जो खूब कमा रहे हैं, लेकिन बाहर से पूरी तरह से ईमानदार नजर आ रहे हैं, यानी भेड़ की खाल पहने भेडि़ए। कम से कम महिलाओं को इस तरह की सीख न दें लेखक महोदय। वे जैसी हैं वैसी ही अच्छी हैं, साधारण कपड़े पहनें या फिर फैशनलेबल मॉडर्न कपड़े, हमें तो वे हर हाल में अच्छी लगती हैं। आप हो सके तो अपने दिमाग की गंदगी को निकाल बाहर करें और ऐसा न कर सको तो महिलाओं को भेड़ की खाल पहनकर अंदर से भेडिय़ा बनने की सलाह तो न ही दें।

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