रुचा बिजेश्वरी : जिसने न सुन पाने की विवशता को बना दिया अपनी ताकत।

त्तराखंड में उत्तरकाशी जिले के चिन्यालीसौड़ में पिछले दिनों कुछ स्कूली बच्चियां नुक्कड़ नाटक करती नजर आई। विभिन्न जगहों पर मंचित किए गए इस नुक्कड़ नाटक का नाम था ’ओ राहुल’ और जो बच्चियां अभिनयं कर रही थी, वे कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय और बालिका राजकीय इंटर कॉलेज चिन्यालीसौड़ की छात्राएं थी। नाटक में स्वच्छता का संदेश जिस खूबसूरती के साथ दिया गया, वह देखने वालों के मन पर एक छोड़ गया। इस नाटक की खास बात यह थी कि इसे जिस छात्रा ने लिखा और निर्देशित किया, वह विशेष जरूरत वाली एक छात्रा है। रुचा बिजेश्वरी नाम की यह छात्रा सुन पाने में असमर्थ है। इस असमर्थता को उसने अपनी कमजोरी नहीं, ताकत बना दिया। इस लेख में आज मैं रुचा बिजेश्वरी के बारे में आपको बताने जा रहा हूं। पढ़ाई के साथ रुचा भारत ज्ञान विज्ञान समिति के माध्यम से विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में संलग्न है।

नाम उसका रुचा डिगिया है। विश्वेश्वरी उसकी मां और पिता के नाम का मिश्रण है। रुचा  5 वर्ष की थी, जब अक्षर ज्ञान भी ठीक से नहीं कर पाई थी, अचानक उसे कम सुनाई देने लगा। छोटी बच्ची को शुरू में पता ही नहीं चला कि उसके साथ हो क्या रहा है, लेकिन धीरे-धीरे इस 5 साल की बच्ची और उसके माता-पिता जान गए कि वह सुन पाने में असमर्थ हो चुकी है। इलाज के प्रयास किये गये, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। रुचा कहती है, जब शुरू में उसे कम सुनाई देने लगा तो वह बहुत हतोत्साहित हुई। क्लास में जब उसे शिक्षक का पढ़ाया हुआ कुछ सुनाई नहीं देता तो वह खूब रोती। लेकिन, फिर उसने हिम्मत बांधी और खुद ही पढ़ना शुरू कर दिया। हालांकि खुद से पढ़ाई करने और क्लास में कुछ न सुनाई देने के कारण गणित और अंग्रेजी जैसे विषयों में वह कमजोर होती चली गई। उसकी इस हालत को देखकर सभी को लगता था कि यह लड़की दसवीं भी पास नहीं कर पाएगी। लेकिन गणित और अंग्रेजी की कमजोरी के बावजूद दसवीं की परीक्षा में उसने 76.8 प्रतिशत अंक हासिल हासिल किए। वह अपने ही नहीं, आसपास के 10 स्कूलों में टॉप रही।

चिन्यालीसौड़ की रुचा द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक का मंचन करती छात्राएं।

इस सफलता के बाद बधाइयों का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने न सिर्फ रुचा, बल्कि उसके माता-पिता की भी हिम्मत बढ़ा दी। वह विज्ञान विषयों में 11वीं में एडमिशन लेना चाहती थी। रसायन शास्त्र उसका प्रिय विषय था। लेकिन, श्रवण शक्ति कम होने के कारण उसे विज्ञान विषयों में एडमिशन नहीं मिला और जबरन आर्ट साइड में धकेल दिया गया। रुचा ने फिर से मन लगाकर स्वाध्याय शुरू किया। स्कूल तो सिर्फ औपचारिकता होती थी। क्योंकि क्लास में क्या पढ़ाया जा रहा है, उसे कुछ भी समझ में नहीं आता था। बावजूद इसके उसने 11वीं में अपनी क्लास में प्रथम स्थान प्राप्त किया और 12वीं में भी टॉप किया। जब शिक्षा मंत्री ने पुरस्कृत किया और टैब सहित तमाम अन्य पुरस्कार मिले, तो हौसले एक बार फिर बुलंदियों पर थे।

आगे की पढ़ाई के लिए रुचा बादशाही थौल टिहरी पहुंची। वहां अपनी पसंद के विषय चुने। इतिहास, राजनीति शास्त्र और कला। यहां भी क्लास अटेंड करना सिर्फ औपचारिकता ही थी। पढ़ाई तो उसे स्वाध्याय से ही करनी थी और उसने यही किया। अब तक रुचा का प्रेम पुस्तकों के प्रति उमड़ने लगा था। पाठ्यक्रम की पुस्तकों के अलावा वह तरह-तरह की अन्य पुस्तकें भी पढ़ने लगी। यही वजह है कि रुचा की व्यक्तिगत लाइब्रेरी में आज एक हजार से ज्यादा पुस्तके उपलब्ध हैं। वह जहां भी किसी नई पुस्तक के बारे में पढ़ती है या सुनती है उसे हासिल करके पढ़नेे का अवश्य प्रयास करती है।

एक विषय के रूप में आर्ट पढ़ने के कारण रुचा पेंटिंग बनाने में सिद्धहस्त होती रही। विभिन्न विषयों पर उसकी पेंटिंग कमाल की हैं। वह अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी भी लगा चुकी है। देहरादून में होने वाले तमाम जन आंदोलनों में रुचा के बनाये पोस्टर महत्वपूर्ण भूमिका में होते हैं। किसी भी जन आंदोलन पर रुचा का बनाया एक ही पोस्टर उस पूरे आंदोलन थीम देखने वाले के सामने स्पष्ट कर देता है।

  • टिहरी में पढ़ाई करते हुए ही रुचा की रुचि राजनीति में बढ़ने लगी। हालांकि वह कहती है कि राजनीति की समझ भी उसने किताबें पढ़कर ही हासिल की। किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में क्या हो रहा है, इसे वह सिर्फ देख सकती थी, सुन नहीं सकती थी। किसी नेता के भाषण हांे या फिर राजनीति को लेकर कोई बहस, वह ज्यादा कुछ समझ नहीं पाती थी। फिर भी छात्र राजनीति में सक्रिय रही। कुछ पाने के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए। टिहरी के बाद पढ़ाई करने के लिए श्रीनगर और फिर देहरादून चली आई।

नुक्कड़ नाटक के प्रति जिज्ञासा कैसे पैदा हुई? यह पूछने पर रुचा बताती हैं, उसने पढ़ा था कि नुक्कड़ नाटक सड़कों पर होते हैं और कोई न कोई सामाजिक संदेश देते हैं। इसके अलावा उसे ज्यादा कुछ पता नहीं था। श्रीनगर में पढ़ाई के दौरान उसने आइसा संगठन से जुड़े अंकित उछोली का एक नुक्कड़ नाटक देखा। हालांकि समझ में कुछ नहीं आया, लेकिन सिर्फ देखने भर से नुक्कड़ नाटक के प्रति उसमें सहज जिज्ञासा पैदा हुई।

रुचा के अनुसार श्रीनगर में पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वह चिन्यालीसौड़ लौटी तो कोई काम नहीं था। बहुत बोरियत महसूस होती थी। ऐसे में उसने नुक्कड़ नाटक करने की ठानी। एक विषय चुना। कई लोगों से मार्गदर्शन करने के लिए कहा, लेकिन कहीं से मदद नहीं मिली। ऐसे में उसने अपनी सहज बुद्धि से ही नाटक के संवाद लिख डाले और कुछ बच्चों के माध्यम से नाटक का मंचन सफलतापूर्वक किया गया।

मात्र 23 वर्ष की उम्र में रुचा डिगिया कई सारे काम कर चुकी है। इसमें बच्चों को पढ़ाना भी शामिल है, तो पंखुड़ी यूथ आर्टिस्ट ग्रुप का गठन भी। आर्ट में अपनी मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद रुचा युवाओं को अभिनय का निशुल्क प्रशिक्षण भी देती है। फिलहाल वह मास्टर डिग्री के साथ ही बीएड कर चुकी है और पीएचडी व नेट की तैयारी कर रही है। खाली वक्त में वह घर पर खूबसूरत बुकमार्क भी बना रही है। रुचा कहती है, मेरा ध्येय है, खुद भी कुछ सीखूं और दूसरों को भी कुछ सिखाऊं। रुचा के अनुसार परिवार और शिक्षकों ने हर कदम पर सहयोग दिया। ऐसा न होता तो वह टूट जाती। इस कड़ी में वह एसएफआई के नितिन मलेठा, वैशाली भट्ट, पंकज, अतुल सिंह गढ़वाली, धीरज राजा, अतुल कांत को भी याद करती हैं।

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