जलवायु परिवर्तन का असर कम करने में महिलाओं की भूमिका महत्व

देहरादून में आरएस टोलिया व्याख्यानमाला

विश्व पर्वत दिवस के मौके पर 11 दिसंबर को देहरादून डॉ. आरएस टोलिया स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। डॉ. आर एस टोलिया फोरम की ओर से हर वर्ष उत्तराखंड के पूर्व मुख्य सचिव डॉ. आरएस टोरिया की स्मृति में इस कार्यशाला का आयोजन किया जाता है। इस बार व्याख्यान का विषय ‘उत्तराखंड में वन प्रबंधन एवं जलवायु परिवर्तन कम करने में सामुदायिक संगठनों और महिलाओं की भूमिका’ था। कार्यशाला में इस बात को मुख्य रूप से सूचित किया गया जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों को कम करने में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को समझा जाना चाहिए।

बिनीता शाह सतत विकास मंच उत्तरांचल की सचिव बिनीता शाह ने ने अपने स्वागत भाषण में डॉ. रघुनंदन सिंह टोलिया के योगदान को याद किया। उनकी स्मृति में एसडीएफयू आरएसटी मंच के तहत विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

वन पंचायतों पर केंद्रित इस कार्यशाला बताया गया कि उत्तराखंड में कार्यरत समुदाय सबसे आधारित संगठनों के कार्य बेहद महत्वपूर्ण रहे हैं। खासकर वन पंचायतों के माध्यम से वनों के प्रबंधन इन संगठनों की सामुदायिक भागीदारी उल्लेखनीय रही है।

सिक्किम के पूर्व सांसद और आईएमआई गंगटोक के अधयक्ष पीडी राय ने जलवायु परिवर्तन को कम करने में महिलाओं और समुदाय आधारित संगठनों की भूमिका को पहचानने के महत्व पर जोर दिया। पीसीसीएफ वन पंचायत ज्योत्सना सितलिंग ने कहा कि यह कार्यशाला वास्तव में वन पंचायतों की गतिविधियों के सशक्तिकरण के लिए लाभकारी है। एसडीएफयू के अध्यक्ष एसटीएस लेप्चा ने लैंगिक परिप्रेक्ष्य में जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और उसके दुष्परिणामों के बीच संबंधों को समझने पर जोर दिया।

पूर्व पीसीसीएफ और पूर्व अध्यक्ष, यूएसबीबी डॉ. बीएस बरफाल इस कार्यशाला के मुख्य वक्ता थे। उन्होंने कहा कि वन पंचायतों के कुशल संचालन के लिए जागरूकता पैदा करने और महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि उत्तराखंड देश का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां वन पंचायतें है। हालांकि, पूरे देश में गठित जैव विविधता प्रबंधन समिति (बीएमसी) वन पंचायत के कामकाज को महत्व नहीं देती है। वह मानती है कि बीएमसी का क्षेत्र और कार्य अस्पष्ट है। दोनों निकायों के बीच बेहतर समन्वय के लिए उन्होंने प्रस्ताव दिया कि एक नई गाइडलाइन तैयार की जाए। उन्होंने वन पंचायत प्रबंधन के लिए एक स्वतंत्र कैडर बनाने की भी सिफारिश की। गोपाल सिंह रावत भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के पूर्व निदेशक गोपाल सिंह रावत ने सुझाव दिया कि बीएमसी घास के मैदानों और अल्पाइन क्षेत्रों को बहाल करने में मदद करे।

कार्यशाला सत्र की अध्यक्षता काउंसलर एसडीएसयू प्रोफेसर एएन पुरोहित और श्री एन रविशंकर वाइस चांसलर डीआईटी और निदेशक, दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर एन रविशंकर ने की। कार्यशाला नैनीताल बैंक द्वारा समर्थित थी। कार्यशाला में उत्तराखंड के जोशीमठ, अल्मोड़ा, बागेश्वर, टिहरी, पौड़ी और सिक्किम से भागीदारी की कार्यशाला में करीब 70 लोगों ने भाग लिया।

कार्यशाला में विभिन्न वक्ताओं ने इस बात को इंगित किया कि उत्तराखंड जैसे वन बहुल राज्य में हमेशा से ही वन प्रबंधन में महिलाओं ने अग्रणी भूमिका निभाई है। महिलाओं ने इस राज्य में जंगल बचाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए कई आंदोलन किए। ऐसे में राज्य में आने वाले वक्त में वन प्रबंधन और संरक्षण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।

कार्यशाला मैं यह बात स्पष्ट की गई कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में हिमालयी राज्यों पर भी असर पड़ रहा है। इसे कम करने के लिए वनों के विस्तार और संरक्षण की सबसे ज्यादा आवश्यकता है। इसलिए जरूरी है कि सामुदायिक भागीदारी वाले संगठनों और महिलाओं को विभिन्न जिम्मेदारियां सौंपी जाएं और वन प्रबंधन में उनकी भूमिका बढ़ाई जाए।

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