विकास की भेंट चढ़ गये सैकड़ों प्राकृतिक जलस्रोत

Trilochan Bhatt

 

उत्तराखंड के पहाड़ों में जल्दी से जल्दी रेल पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि 2025 तक चमोली जिले के कर्णप्रयाग तक रेल पहुंच जाएगी। यह रेलवे लाइन बदरीनाथ, केदारनाथ और हेमकुंड जाने वाले तीर्थ यात्रियों के साथ ही नंदादेवी नेशनल पार्क, चोपता, औली और फूलों की घाटी जैसे पर्यटक स्थलों की ओर जाने वाले पर्यटकों के लिए सुविधाजनक होगा। इस रेलवे लाइन के लिए फिलहाल उत्तराखंड के आखिरी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेलवे लाइन बनाने का काम चल रहा है। निर्माणाधीन रेल मार्ग का ज्यादातर हिस्सा तीव्र पहाड़ी ढाल वाला है। ऐसे में यहां रेल बड़ी-बड़ी सुरंगों और पुलों से होकर गुजरेगी। पहाड़ों को खोदकर सुरंगें बनाने का काम तेजी से चल रहा है। रेल विकास निगम अधिकारियों के अनुसार अब तक 6 सुरंगों की खुदाई पूरी हो चुकी है और बाकी की खुदाई चल रही है। इस रेल लाइन से उत्तराखंड में यातायात व्यवस्था तो सुलभ हो जाएगी, लेकिन सुरंगें खोदे जाने से सबसे बड़ी समस्या पहाड़ के एक बड़े हिस्से में पानी का संकट शुरू हो गया है। लगभग 126 किमी लंबी इस रेल लाइन के ठीक ऊपर पहाड़ों पर बसे ऐसे सैकड़ों गांव हैं, जिनके प्राकृतिक जलस्रोत या तो पूरी तरह से सूख गये हैं या फिर उनमें पानी 50 प्रतिशत तक कम हो गया है। इसकी वजह रेलवे की निर्माणाधीन सुरंगें बताई जा रही हैं।

 

सुरंगें खोदने से प्राकृतिक जलस्रोतों पर कैसे और क्यों असर पड़ सकता है, इसे समझने से पहले एक नजर इस रेल लाइन के आकार पर डालनी होगी। फिलहाल उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल के चार जिलों टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली और रुद्रप्रयाग पहुंचने के लिए अंतिम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। इन जिलों में चार प्रसिद्ध तीर्थस्थल बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री भी हैं, जहां हर वर्ष लाखों की संख्या में तीर्थयात्री पहुंचते हैं। इस क्षेत्र में औली और फूलों की घाटी जैसे पर्यटक स्थल हैं, जहां हजारों की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक यहां आते हैं। इन स्थानों पर पहुंचने के लिए ऋषिकेश से सड़क मार्ग से सैकड़ों किमी की यात्रा करनी पड़ती है।

नेशनल हाईवे पर ब्यासी में रेलवे लाइन और स्टेशन के लिए खोदे जा रहे पहाड़।

इस लंबी सड़क यात्रा को सुगम बनाने के लिए इस महत्वाकांक्षी रेल परियोजना का निर्माण किया जा रहा है। हालांकि इसे इस दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र के सामारिक महत्व से भी जोड़ा जा रहा है। 125.20 किमी लंबी इस रेलवे लाइन का 105.47 किमी यानी 84.27 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरेगा। बाकी हिस्सा पुलों के ऊपर होगा। पूरे रेल मार्ग पर 16 सुरंगों और 35 पुलों का निर्माण किया जा रहा है। इनमें एक सुरंग 20.81 किमी लंबी होगी। यह हिमालयी क्षेत्र की सबसे लंबी सुरंग बताई जा रही है। 5 ऐसी सुरंगें बनाई जा रही हैं, जिनकी लंबाई 9 किमी से ज्यादा होगी। कुछ रेलवे स्टेशन भी भूमिगत होंगे। जाहिर है इन सब कामों के लिए पहाड़ों के एक बड़े हिस्से को खोखला किया जाना है।

 

इस रेल मार्ग का निर्माण कार्य दो वर्ष पहले शुरू हुआ था। अब तक जिन क्षेत्रों में सुरंग बनाने का काम पूरा हो चुका है, वहां लोगों के सामने पानी का संकट खड़ा हो चुका है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण टिहरी जिले का दोगी पट्टी है। यह पूरा क्षेत्र उस दुर्गम पहाड़ी हिस्से में फैला है, जिसके ठीक नीचे रेलवे लाइन का काम चल रहा है। इस क्षेत्र में दर्जनों गांव हैं। सरकारी योजनाओं का अभाव या ऐसी योजनाओं के असफल हो जाने के कारण इस पूरे इलाके के लोग पानी के लिए प्राकृतिक जलस्रोतों पर निर्भर हैं। लेकिन, पिछले एक वर्ष के दौरान इस क्षेत्र के ज्यादातर प्राकृतिक जलस्रोत या तो सूख गये हैं, या उनमें पानी 50 प्रतिशत से कम रह गया है। इन प्राकृतिक जलस्रोतों से गांवों तक जो पेयजल योजनाएं बनाई गई थी, वे ठप हो गई हैं।

 

इस क्षेत्र के जल संकट से प्रभावित लोड़सी गांव में ग्रामीणों ने मोंगाबे को बताया कि सरकार पेयजल योजनाओं के तहत गांवों में पेयजल लाइन बिछा रही है, लेकिन जलस्रोतों का पानी तेजी से सूख रहा है। ऐसे में पेयजल लाइनें बिछाने का कोई लाभ गांव वालों को नहीं मिल पा रहा है। गांवों में कुछ जगहों पर हैंडपंप लगाये गये हैं, लेकिन अब ज्यादातर हैंडपंपों पर भी पानी नहीं आ रहा है। इस गांव के ग्राम प्रधान अनिल चौहान के अनुसार दोगी पट्टी के गांवों में पीने की समस्या पहले भी थी। लेकिन, पहले केवल गर्मी के दो महीनों मई और जून में पानी की कमी होती थी। इस बार जनवरी में ही पानी कम हो गया था। वे कहते हैं कि कई गांवों में पाइप लाइन के जरिये आसपास के प्राकृतिक जलस्रोतों का पानी पहुंचाया गया है, लेकिन अब इन स्रोतों पर पानी कम हो जाने के कारण पाइप लाइनों में पानी नही आ पा रहा है।

 

चमेली गांव की जैंता देवी के अनुसार इस गांव के 2 प्राकृतिक जलस्रोत सूख गये हैं और एक में अब पहले की तुलना में आधा से कम पानी आ रहा है। एक जलस्रोत से पाइप लाइन आ रही है, लेकिन अब स्रोत पर पानी इतना कम है कि पाइप लाइन में पानी नहीं आ रहा है। यह जलस्रोत गांव से 5 किमी दूर है। गांव वाले स्रोत से ही पानी के बर्तन भरकर ला रहे हैं। चमेली के आसपास के दर्जनभर दूसरे गांवों में भी लगभग यही स्थिति है। कई गांवों में लोग दूर-दूर के जल स्रोतों और अलकनंदा नदी से खच्चरों से पानी ले जा रहे हैं।

 

काकड़सैंण गांव के मोर सिंह पुंडीर प्राकृतिक जलस्रोतों के सूखने के लिए निर्माणाधीन ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराते हैं। वे गांव के ठीक नीचे पहाड़ी नाले पर बन रहे रेलवे पुल को दिखाते हैं। वे कहते हैं नाले के दोनों ओर पहाड़ियों पर सुरंग के मुहाने हैं। पुल से इन सुरंगों को जोड़ा जाएगा। सुरंग वाली दोनों पहाड़ियों के ऊपर दर्जनों गांव हैं। जमीन का जो पानी पहले पहाड़ियों ऊपरी हिस्से में जलस्रोत के रूप में बाहर निकलता था, वह पहाड़ के अंदर खुदाई हो जाने के कारण नीचे चला गया है और रेलवे लाइन के एग्जिट प्वॉइंट से वहां बाहर निकल रहा है।

जिन नलों में भरपूर पानी आता था, वे अब सूखने की कगार पर।

मोर सिंह पुंडीर के इस दावे की पुष्टि दोगी पट्टी की तलहटी में बदरीनाथ हाईवे पर ढिंगणी नामक जगह पर बनाये गये रेलवे के एग्जिट प्वॉइंट पर हुई। एग्जिट प्वाइंट वह जगह होती है, जहां से सुरंग खोदने में निकलने वाले मलबे को बाहर निकाला जाता है। इसके साथ ही इस जगह से सुरंग के अंदर जरूरी सामान पहुंचाया जाता है। सुरंग में काम करने वाले मजदूर से इसी एग्जिट प्वॉइंट से अंदर जाते हैं। इसके अलावा सुरंग में ऑक्सीजन का लेवल बनाये रखने के लिए एग्जिट प्वॉइंट से ही वेंटिंलेशन की व्यवस्था ही जाती है। इस एग्जिट प्वॉइंट को चारों ओर से टीन की चद्दरों से कवर किया गया है। इस चहारदीवारी पर एक जगह से करीब 8 इंच पानी लगातार बाहर निकल रहा है। एग्जिट प्वाइंट में अंदर जाकर मोंगाबे ने इस पानी के स्रोत के बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश की। लेकिन, गेट पर यह कहकर रोक दिया गया कि कंस्ट्रक्शन कंपनी के हेड ऑफिस से अनुमति लिए बिना अंदर नहीं जा सकते। एग्जिट प्वॉइंट के गेट पर लगी एक सूचना चौंकाती है। इस सूचना में इसे ब्लास्ट वाला एरिया बताते हुए लोगों को दूर रहने की चेतावनी दी गई है। उल्लेखनीय है कि पहाड़ों में निर्माण कार्यों में ब्लास्ट करने पर पूरी तरह पाबंदी है। लेकिन, यह सूचना संकेत करती है कि सुरंगें बनाने के लिए पहाड़ों के भीतर ब्लास्ट भी किये जा रहे हैं। इस जगह से करीब दो किमी दूरी पर मालाखुंटी गांव में प्रदीप सिंह मिलते हैं। एग्जिट प्वॉइंट से आ रहे पानी के बारे में पूछने पर बताते हैं कि एग्जिट प्वाइंट पर करीब डेढ़ वर्ष पहले काम शुरू हुआ था। काम शुरू होने के कुछ महीने बाद हमने यहां से एक पनचक्की चलाने लायक पानी बाहर निकलते देखा, तब से लगातार पानी बह रहा है।

 

तो क्या ये एक्वीफर पंक्चर है?
इस संबंध में मोंगाबे ने वीरचंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड वानिकी एवं औद्यानिक विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक डॉ. एसपी सती से बात की। उन्होंने बताया कि आमतौर पर खुली सड़क पर चलने वाले टैªफिक की तुलना में सुरंगों के अंदर चलने वाला ट्रैफिक पर्यावरण के लिए अधिक अनुकूल होता है। सुरंग ने पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाया, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सुरंग किस तकनीकी से खोदी गई है। सुरंगें खोदे जाने के बाद ऊपर के पहाड़ी हिस्सों में प्राकृतिक जलस्रोत सूखने अथवा उनमें पानी कम हो जाने के बारे में वे कहते हैं कि वास्तव में ऐसा कुछ हुआ है, इस बारे में उन्हें जानकारी नहीं है। यदि इस तरह की आशंका जताई जा रही है तो यह गंभीर मामला है और इसका अध्ययन करवाया जाना चाहिए।

 

डॉ. सती के अनुसार यह मामला एक्वीफर पंक्चर का हो सकता है और यदि ऐसा है तो मामला बेहद गंभीर है। वे कहते हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में बारिश का पानी पहाड़ी दरारों से जमीन के भीतर जाता है। जमीन के भीतर एकत्रित हुए पानी के स्टोरेज को एक्वीफर कहा जाता है। यही एक्वीफर पूरे पहाड़ में भूमिगत जलस्तर का संतुलित रखता है और जगह-जगह प्राकृतिक जलस्रोत के रूप में बाहर आता है। ये प्राकृतिक जलस्रोत उत्तराखंड के पहाड़ों में आज भी जलापूर्ति का प्रमुख साधन हैं। डॉ. सती के अनुसार अवैज्ञानिक तरीके अथवा लापरवाही से पहाड़ के अंदर की जा रही खुदाई से एक्वीफर पंक्चर होने की पूरी संभावना रहती है। यदि किसी क्षेत्र में एक्वीफर पंक्चर हो जाता है तो पानी भारी मात्रा में पंक्चर वाली जगह से बाहर निकलने लगता है। इससे प्राकृतिक स्रोतों को पानी नहीं मिल पाता और वे सूख जाते हैं।

125.20 किमी लंबी इस रेलवे लाइन का 105.47 किमी यानी 84.27 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरेगा। बाकी हिस्सा पुलों के ऊपर होगा। पूरे रेल मार्ग पर 16 सुरंगों और 35 पुलों का निर्माण किया जा रहा है। इनमें एक सुरंग 20.81 किमी लंबी होगी। यह हिमालयी क्षेत्र की सबसे लंबी सुरंग बताई जा रही है।

हिमालयी मामलों के जानकार प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक और इसरो के सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नवीन जुयाल कहते हैं कि सुरंगें खोदे जाने से ऊपरी क्षेत्रों में जलस्रोतों के सूखने और निचले क्षेत्रों में अचानक पानी आने के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। जोशीमठ के सुनील क्षेत्र का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं निचले क्षेत्र में सुरंग बनाये जाने से सुनील इलाके के प्राकृतिक जनस्रोतों में पानी बहुत कम हो गया था। दोगी के मामले में वे कहते हैं कि बिना अध्ययन के यह कह पाना मुश्किल होगा कि इस क्षेत्र में पानी के स्रोत सूखने का कारण वास्तव में रेलवे लाइन की सुरंग है या कुछ और। उनका कहना है कि 2020 में नीति आयोग ने इस मामले को उठाया था और जोर देकर कहा था कि सुरंग बनाने के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाए कि संबंधित क्षेत्र में प्राकृतिक जलस्रोतों पर इसका असर न पड़े। वे जोर देकर कहते हैं कि न सिर्फ दोगी क्षेत्र बल्कि हर उस इलाके में प्राकृतिक जलस्रोतों का अध्ययन किया जाना चाहिए जहां सुरंगे बनाई गई हैैं। डॉ. जुयाल कहते हैं कि सुरंगों के कारण जलस्रोत सूखने की संभावना तब बन सकती है, जबकि सुरंग बनाते समय ब्लास्ट किये जाएं। ऐसे में जमीन के अंदर की दरारें चौड़ी हो जाती हैं और इनसे पानी रिसने लगता है। इसे वाटर पायरेसी कहा जाता है। ऐसी स्थिति में यह पानी प्राकृतिक जलस्रोतों तक नहीं पहुंचता है और दूसरी अनपेक्षित जगहों से बाहर आने लगता है।

दूसरी तरफ रेल विकास निगम के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी ओम प्रकाश मालगुड़ी दावा करते हैं ैकि ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन की सुरंगें पूरी तरह से वैज्ञानिक तरीके से बनाई जा रही हैं। टनल बोरिंग मैथड से खोदी जा रही सुरंगों में स्वास्थ्य, पर्यावरण और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जा रहा है। ये सुरंगें बाढ़ और भूकंप जैसी घटनाओं से निपटने में पूरी तरह से सक्षम हैं। भूस्खलन से सुरंगों को बचाने के लिए पोरल स्टेबलाइजेशन किया गया है। आईआईटी रुड़की के विशेषज्ञों ने इस योजना की पेसिफिक स्पेक्ट्रम स्टडी की है। विश्व के अनेक विशेषज्ञों से भी इस संबंध में समय-समय से सलाह ली जा रही है। ऐसे में इस परियोजना का पर्यावरण या जलस्रोतों पर किसी तरह का प्रभाव पड़ने की कोई संभावना नहीं है। पर्यावरणविद जयसिंह रावत कहते हैं कि यह सूचना यदि सिर्फ लोगों का डराने के लिए है तो भी खतरनाक है, यह गंभीर मामला है और इसकी जांच की जानी चाहिए।

 

यह लेख अमेरिकन पर्यावरण पत्रिका मोंगाबे हिन्दी में प्रकाशित हो चुका है।

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