जंगल बचाने का जान दी, अब स्मारक का भी सम्मान नहीं

 Mahipal Negi

 

से जंगलों की आग बुझाने के दौरान (नागरिक सेवा) बलिदान के लिए मिला था देश का प्रथम शौर्य चक्र (समकक्ष महावीर चक्र) इस बलिदानी का नाम था रणवीर सिंह बिष्ट। कौन था ये बलिदानी। कैसे हुआ था बलिदान। और कहां पर है, गोबर कचरे से घिरा उसका स्मारक। आइए जानते हैं पूरी कहानी.
बात 1984 के मई महीने की है। भीषण गर्मी में जंगल धू-धू कर जल रहे थे। टिहरी के भी कई जंगल जल रहे थे। तब टिहरी वन प्रभाग के सकलाना रेंज की बेमुंडा जंगलात चौकी पर तैनात फकोट और मौण बीट प्रभारी रणवीर सिंह बिष्ट मई महीने की तपती दोपहरी में, सुबह से लेर शाम तक, हफ्ते भर , एक के बाद एक जंगलों में लगने वाली आग को बुझाये जा रहा था।
जंगलों की आग उसकी परीक्षा ले रही थी। 24 मई को जंगलों की आग बुझाने के बाद उसने अगले दिन अपने घर, टिहरी के जाखणीधार ब्लॉक की खास पट्टी के छोल गांव जाने की तैयारी कर ली।
अगला दिन अर्थात 25 मई, उसका जन्मदिन था। श्रीदेव सुमन का जन्मदिन भी 25 मई ही होता है। वह 47 वर्ष की आयु पूरी कर चुका था 48 वें वर्ष में प्रवेश करना था उसे।
रणवीर सिंह बिष्ट के स्मारक पर लगा शिलापट भी अब जीर्ण-शीर्ण।
उसने जाज़ल पोस्ट ऑफिस से 600 रुपए निकाले और 25 मई की सुबह चंबा चल दिया। जहां रेंज अधिकारी से उसे पिछले माह का वेतन नगद मिलना था। जल्दी ही अब उसकी पदोन्नति भी होने वाली थी।
चंबा में रेंज अधिकारी से बात कर ही रहा था कि करीब 2 किमी दूर के ऋषिकेश मोटर मार्ग पर थान और सावली गांव के बीच ऊपर की तरफ जंगल से धुआं उठता देखा। तब जो भी मौजूद वन कर्मी वहां पर थे, उन्हें लेकर जंगल की धधकती आग को बुझाने के लिए चल पड़ा।
वह लपक कर तेजी से ऊपर की ओर चढ़ा और आग बुझाने का काम शुरू किया। सहकर्मियों को दूर सुरक्षित जगह से आग बुझाने को कहा। अचानक उसकी ओर हवा का रुख हुआ धूल, धुआं और आग की चिंगारियां उसकी आंखों तक पहुंच गई। बचाव के लिए सुरक्षित स्थान पर पैर टिकाते वक्त प्लास्टिक के जूते फिसले और वह नीचे की तरफ आग की तेज की लपटों के बीच लुढ़क गया।
कपड़ों ने आग पकड़ ली। नए कपड़े थे। आज वह जन्मदिन मनाने अपने घर जाना जाने की तैयारी में था। वह किसी तरह आग से बाहर निकला। अन्य सहयोगी उसे सड़क तक अर्थात ऋषिकेश राजमार्ग तक ले आए। वह बुरी तरह से जल चुका था।
इस दौरान चंबा की ओर से प्रभागीय वन अधिकारी वहां पर पहुंच गए। बुरी तरह झुलस चुके रणवीर सिंह को बन अधिकारी की गाड़ी से ही नरेंद्र नगर जिला अस्पताल पहुंचाया गया। लेकिन हालत गंभीर हो चुकी थी। अस्पताल में सुविधाएं नहीं।
डॉक्टर ने तुरंत देहरादून ले जाने के लिए कहा। शाम 4 बजे के करीब रणवीर बिष्ट को दून अस्पताल ले जाया गया। दून अस्पताल में उसी दिन उसने दम तोड़ दिया।
ऐसा भी नहीं है कि उसके इस बलिदान के बाद ही उसकी कर्तव्य परायणता की चर्चा हुई। एक बार हेंवल नदी में किसी ने भारी मात्रा में ब्लीचिंग पाउडर डालकर मछलियों का अवैध शिकार किया तो उसकी रिपोर्ट पर सख्त कार्यवाही हुई थी।
जिस वक्त वह आग से जला उसकी जेब में करीब 1500 रुपए थे। अपने गांव, परिवार वालों के बीच जाकर वह आज अपना जन्मदिन मनाना चाहता था। तब उसके घर में पत्नी और तीन बच्चे इंतजार कर रहे थे। वह नहीं लौटा। अपने जन्मदिन के दिन ही वह बलिदान कर गया।
उसके बलिदान की चर्चा टिहरी में ही नहीं, पहाड़ और उससे बाहर दिल्ली तक हुई। भारत सरकार ने 1989 में उसे मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया। तब नागरिक सेवाओं के अंतर्गत जंगलों को आग से बुझाने के लिए बलिदान होने वाले किसी व्यक्ति को दिया जाने वाला यह देश का पहला शौर्य चक्र था। उसके सम्मान पत्र में लिखा गया कि जंगलों की आग बुझाने के साथ ही इस दौरान अपने साथियों की जान बचाने के लिए सम्मान दिया जा रहा है। सम्मान भारत के राष्ट्रपति की ओर से दिया जाता है। (घटना का विवरण मुख्य रूप से धूम सिंह नेगी जी द्वारा 1984 में लिखे गए एक लेख से लिया गया है, जोकि युगवाणी में छपा था )
सड़के के किनारे बने स्मारक का कोई नहीं सुध लेने वाला
रणवीर बिष्ट के दो स्मारक मैंने देखे। एक चंबा के निकट बादशाहीथौल तिराहे पर और एक उसके पैतृक गांव, छोल गांव में। दोनों बदहाल हैं। टूट – फूट गए। वर्षों से कोई मरम्मत नहीं। शिला पट्ट ठीक से पढ़े जाते नहीं।
और, उनके अपने ही पैतृक गांव में सड़क किनारे जो स्मारक बना और मूर्ति लगी, उसके दोनों ओर कूड़ा – कचरा, गोबर के ढेर लगे हुए हैं। कुछ दिन पहले मैंने उनके गांव में एक संदेश भिजवाया था कि कूड़ा-कचरा तो गांव वाले हटा दें। तब गोबर का ढेर मूर्ति से भी ज्यादा ऊंचाई तक पहुंच गया था।
अभी कुछ दिन पहले मेरा उधर से फिर उधर आना जाना हुआ। उस स्थान पर उन्हें नमन करने के लिए रुका, तो दृश्य हृदय विदारक था। आप वीडियो में देख सकते हैं। उनके बच्चे अब गांव में नहीं हैं। दूसरे स्थानों पर पलायन कर गए हैं। ये स्मारक वन विभाग ने बनाए तो थे लेकिन फिर शायद उन्हें भूल गया।
रणवीर सिंह बिष्ट के पिता का नाम इन्द्र सिंह बिष्ट था। मेरी पीढ़ी या इससे पहले वाली पीढ़ी के टिहरी के लोगों को याद होगा, इन्द्र सिंह बिष्ट वही थे, जो टिहरी के हर फुटबाल टूर्नामेंट में जोर जोर से चिल्लाकर खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाया करते थे, मैदान के एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ते हुए।
रणवीर सिंह बिष्ट के स्मारक के पास ही कुछ दुकानें हैं। सड़क के ऊपर इंटर कॉलेज बड़कोट है। गांव, बस आधा किमी आगे ……….
– रिपोर्ट महीपाल सिंह नेगी

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