शिक्षा विभाग को धूप से दुश्मनी क्यों!

विटामिन डी का सबसे बड़ा स्रोत है धूप, भूल गये अधिकारी

डॉ. प्रेम बहुखंडी

पूर्व राष्ट्रीय सलाहकार, सर्व शिक्षा अभियान

 

त्तराखंड में शिक्षा विभाग अक्सर गलत कारणों से चर्चाओं में रहता है। संभव है कि विभाग के अधिकारी अपने होने की गवाही देने और आम लोगों के बीच अपने जिन्दा होने का अहसास करवाने के लिए इस प्रकार की गलत-बयानी करते हों। शिक्षा विभाग का नया फरमान है कि बच्चों को खुले आसमान के नीचे अर्थात धूप में बैठकर न पढ़ाया जाये क्योंकि इससे उनका ध्यान इधर उधर जाता है और वे कक्षा में पूरी तरह से ध्यान नहीं दे पाते हैं। संभव है यह सच भी हो लेकिन इसका कोई शोधपूर्ण आधार है, इसकी जानकारी सरकारी आदेश में नहीं दी गई है।

धूप हो या ठन्डे कमरे, बरसात में टपकती छत हो या बिना पंखे के तपता कमरा, विद्यालय में स्वच्छ पानी, शौचालय की व्यवस्था हो या पर्वतीय क्षेत्र के दुर्गम स्थानों में शिक्षकों की कमी, इसका बच्चों की शिक्षा पर क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, और इन कमियों को कैसे दूर दिया जा सकता है, इस पर शायद शिक्षा विभाग की नजर नहीं पड़ती है। विशेष जरूरत वाले दिव्यांग छात्रों के लिए स्कूल जाने के रास्ते सुगम हों, अध्यापकों विशेषकर अध्यापिकाओं के लिए सुरक्षित रहने और पढ़ाने की व्यवस्था हो, इस बारे में शिक्षा विभाग क्या करता है, इसकी भी सार्वजानिक जानकारी नहीं है। लेकिन पिछले दिनों में नीति आयोग की रिपोर्ट ने शिक्षा विभाग के फ़टे ढोल की पोल खोल कर रख दी थी। नीति आयोग की शिक्षा सूचकांक सारणी में 49 अंकों के साथ उत्तराखंड कुल 20 राज्यों की सूची में 14 वें नंबर पर है। इस सूची में 82 अंक के साथ केरल पहले नंबर पर है जबकि 30 अंक के साथ झारखण्ड 20 वें स्थान पर है।

जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर की एक टीम ने कुछ वर्ष पहले उत्तराखंड के दो जिलों में किशोरी/स्कूली लड़कियों की पोषण स्थिति पर एक अध्ययन किया था यह अध्ययन अक्टूबर 2017 में जर्नल ऑफ ह्यूमन इकोलॉजी (दिल्ली, भारत) में छपा था। इस अध्ययन का उद्देश्य 12-15 वर्ष आयु वर्ग की लड़कियों की पोषण स्थिति, पोषण की कमी के लक्षण और पोषण की कमी के सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि का आकलन करना था। अध्ययन के परिणामों से पता चला कि तीन प्रतिशत युवतियां गंभीर रूप से कुपोषित थे, 11.67 प्रतिशत मामूली कुपोषित थे, इक्कीस प्रतिशत की लम्बाई उनकी उम्र के हिसाब से कम है और 21.33 प्रतिशत औसत से अधिक दुबली – पतली हैं। इस अध्ययन की महत्त्वपूर्ण खोज थी कि बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) और आयु, परिवार के प्रकार, पारिवारिक आय, भोजन की आदतों और भोजन के तरीकों के बीच कोई महत्वपूर्ण संबंध नहीं पाया गया, अर्थात सभी प्रकार की युवतियों में स्वास्थय की स्थिति चिंताजनक दिखी।

इन लड़कियों में पीला कंजंक्टिवा/नेत्र-श्लेष्मा (24.33ः), धब्बेदार दांत (23.33ः), दांतों में कैविटी (21.33ः) और स्पंजी ब्लीडिंग मसूड़े (18.67ः) जैसे महत्वपूर्ण नैदानिक लक्षण थे। इसके अतिरिक्त औसत ऊर्जा सेवन और कई सूक्ष्म पोषक तत्व अनुशंसित मात्रा से से कम पाए गए थे। मई 2020 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 76 प्रतिशत भारतीय विटामिन डी की कमी से पीड़ित हैं, यह अध्ययन भारत के 81 शहरों में 229 स्थानों पर 4,624 लोगों पर किया गया था। इसमें सबसे चौकाने वाली बात है कि 18-30 वर्ष की आयु के वयस्कों में विडामिन डी की कमी एक आम बात है।

वैज्ञानिकों के अनुसार विटामिन डी का मुख्य काम रक्त में कैल्शियम और फास्फोरस की मात्रा को सामान्य स्तर पर रखना है, जो हड्डियों को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, विटामिन डी की कमी का एक मुख्य कारण हमारी आधुनिक जीवन शैली है। लगभग 40ः भारतीयों में पर्याप्त विटामिन डी की कमी होती है। विटामिन डी की कमी का मानसिक स्वास्थय पर भी विपरीत असर पड़ता है। यह भी आश्चर्यजनक बात है कि देश के अधिकांश हिस्सों में साल भर कितनी धूप मिलती है।

उत्तराखंड भी इस स्थिति से भिन्न नहीं है। राज्य में मानसिक स्वास्थय भी एक चिंता का विषय है हालाँकि अन्धविश्वास के कारण इस पर अभी गौर नहीं किया जा रहा है। हमारी सरकार और विशेषकर शिक्षा विभाग, बच्चों के पोषण के लिए कुछ विशेष तो कर नहीं पा रहा है, स्कूलों और मोहल्लों में खेल के मैदान नहीं है, जहाँ बच्चे धूप में खेलते हुए विडामिन डी का सेवन कर सकें। राज्य के कुछ विद्यालयों में, विशेषकर पर्वतीय क्षेत्र में, सर्दी के महीनों में कमरे बहुत ठन्डे हो जाते हैं, इसलिए अधिकांश कक्षायें धूप में लगती हैं, इससे प्राकृतिक वातावरण में शिक्षा लेने के साथ साथ, विडामिन डी भी मिल जाती है जो कि स्वास्थय के लिए लाभकारी है। लेकिन अफ़सोस की बात है कि उत्तराखंड सरकार, इस पर बिना को अध्ययन किये, सिर्फ आदेश निकाल रही है, जो कि अफ़सोस जनक और निंदनीय है।

 

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