सरकार नहीं, सरोकारों की बात…. बात बोलेगी

जिस उम्र में मेरे साथ के लोग फौज में भर्ती होने के सपने देखते थे, तब मैं कॉलेज और यूनिवर्सिटी तक पढ़ाई करने के सपने देखता था।

यूनिवर्सिटी के दौर में जब मेरे साथ के लोग टीचर बनने का सपना देखते थे, तब मैंने पत्रकार बनने का सपना देखा, जो बुरा सपना साबित हुआ।

अभी मुझे पत्रकारिता शुरू के 2-4 साल ही गुजरे थे कि (शायद) अखबार मालिक लालाओं के बेटे विदेशों से मैनेजमेंट की पढ़ाई करके लौट आए और हर जगह रुपया तलाशने लगे थे।

हालिया प्रचलित एक कहावत के अनुसार जो अखबार पहले छपकर बिकते थे, वे बिककर छपने लगे और मेरे जैसे लोग अप्रासंगिक हो गए। बड़ी ठसक के साथ पत्रकार बनने निकला था, लेकिन लालाजी का कुछ हजार रुपल्ली का नौकर बन कर रह गया।

जन सरोकारों की पत्रकारिता करने की जिस लालसा को लेकर पत्रकार बना था, वह अब भी बनी हुई है। अब जबकि पारिवारिक जिम्मेदारियां लगभग पूर्ण कर चुका, तो नए सिरे से जनपक्षीय पत्रकारिता करने का एक विचार मन में आया है।

न्यूज पोर्टल http://baatbolegi.com/ और यूट्यूब चैनल https://youtube.com/@trilochanbhatt को नये तेवर और कलेवर के साथ आगे बढ़ाने के प्रयास कर रहा हूं।

ऐसा करने के लिए मेरे पास संसाधन तो नहीं हैं, लेकिन हौसला पूरा है। बस आप सबका सहयोग चाहिए।

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