तीसरी बार विस्थापन के लिए नहीं तैयार

पहले टिहरी बांध के लिए विस्थापित हुए, फिर राजाजी नेशनल पार्क के लिए और अब हवाई अड्डा विस्तारीकरण के लिए होंगे विस्थापित

टिहरी बांध के लिए उजड़े दर्जनों गांवों के लोगों को दूसरी बार राजाजी नेशनल पार्क की परिधि में आने के कारण विस्थापित किया गया था और अब जौलीग्रांट हवाई अड्डे के विस्तारीकरण के लिए उन्हें उजाड़ने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए सर्वे हो चुका है और कभी भी इस संबंध में आदेश हो सकते हैं। लोग फिर से अपने घर छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। नाराज हैं और अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए संडे को एक पंचायत भी बुलाई गई। पंचायत में साफ शब्दों में कह दिया गया कि दूसरी बार किसी भी हालत में अपने घर, अपना गांव अपनी मिट्टी नहीं छोड़ेंगे। यह कहानी देहरादून के अठूरवाला गांव की है। यह गांव टिहरी डैम विस्थापितों का है और अब जौलीग्रांट एयरपोर्ट के एक्सटेंशन के लिए इस गांव को विस्थापित करने की किये जाने की सुगबुगाहट है।

टिहरी डैम बनाने के लिए दर्जनों गांवों को विस्थापित किया गया था। इन गांवों के लोगों को देहरादून और कुछ अन्य जगहों पर जमीन दी गई थी। टिहरी डैम डूब क्षेत्र के आधा दर्जन से ज्यादा गांवों को डोईवाला के पास अठूरवाला में जमीन उपलब्ध करवाई गई थी। करीब 40 वर्ष पहले अपने घर-गांव छोड़कर अठूरवाला में बसे ये लोग अब किसी तरह फिर से नई जगह स्थापित हुए हैं। हालांकि विस्थापन का दर्द अभी लोग भूले नहीं ह। इस बीच एक बार फिर उन पर विस्थापित किये जाने का खतरा मंडरा रहा है।

दून के जौलीग्रांट एयर पोर्ट को इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाये जाने के प्रक्रिया काफी समय से चल रही है। इसके लिए थानों रेंज के जंगल को काटने के साथ ही आसपास के कई गांवों का विस्थापन भी होना है। विस्थापन की संभावना वाले गांव टिहरी विस्थापितों के भी हैं और उन लोगों के भी जो पहले से इस घाटी में रहते आ रहे हैं। थानों के जंगल काटे जाने को लेकर दून में बड़े विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं और अब विस्थापन की संभावना वाले गांवों के लोग भी इसके खिलाफ एकजुट होने लगे हैं।

टिहरी बांध के लिए उजड़े दर्जनों गांवों के लोगों को दूसरी बार राजाजी नेशनल पार्क की परिधि में आने के कारण विस्थापित किया गया था और अब जौलीग्रांट हवाई अड्डे के विस्तारीकरण के लिए उन्हें उजाड़ने की तैयारी की जा रही है।

विस्थापन की संभावना वाले जौलीग्रांट के आसपास के लोगों ने 20 नवम्बर, 2022 को एक पंचायत का आयोजन किया। इस पंचायत के गांवों के सैकड़ों लोगों ने हिस्सा लिया. इनमें टिहरी विस्थापित गांवों के लोग भी थे और अन्य लोग भी। टिहरी से करीब 40 वर्ष पहले विस्थापित हुए लोगों ने साफ तौर पर कहा कि वे एक बार अपने घर-गांव और अपनी मिट्टी को छोड़ चुके हैं। इन 40 वर्षों में किसी तरह से यहां बसे हैं. फिर से गांव आबाद किये है। अब वे किसी भी हालत में एयर पोर्ट के लिए अपनी जमीन नहीं देंगे। लोगों का कहना था कि इन गांवों में लोगों की खेती है, छोटे-छोटे कारोबार हैं। यहां से छोड़कर जाना किसी भी हालत में संभव नहीं होगा। पंचायत में सभी ने एकजुट होकर फैसला किया कि किसी भी हालत में वे अपनी जमीन नहीं देंगे। लोगों का कहना था कि सड़क के दूसरी तरफ यानी जंगल की तरफ एयरपोर्ट बनाया जाए न कि गांवों को विस्थापित किया जाए।

लोगों ने आरोप लगाया कि उनमें से ज्यादातर को या तो टिहरी से डोईवाला में और राजाजी नेशनल पार्क की परिधि में आने के कारण पुनर्वासित किया गया था। अब फिर से उन्हें जौलीग्रांट हवाई अड्डे के लिए विस्थापित किया जा रहा है।

लोगों ने कहा कि हम निर्माण कार्यों के लिए अपनी जमीन नहीं देंगे। सरकार अपने फैसले हम पर नहीं थोप सकती। यह हमारी खेती की जमीन है। हम इसे कृषि और अपने कर्मियों के उपयोग के लिए रखना चाहते हैं। हम इस तरह की निरंकुशता की अनुमति नहीं देंगे।

उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार जौलीग्रांट हवाई अड्डे के विस्तार के लिए विभिन्न विकल्पों की तलाश कर रही है, क्योंकि साल 2020 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने हवाई अड्डे के विस्तार के लिए जंगल काटने के बजाय अन्य विकल्प खोजने का सुझाव दिया था।

इससे पहले, राज्य सरकार ने हवाई अड्डे के विस्तार के लिए शिवालिक एलीफेंट रिजर्व से लगभग 90 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण करने की योजना बनाई थी। स्थानीय लोगों के आंदोलन के बाद सरकार ने बाद में अपना आदेश वापस ले लिया।

यह मामला अदालत में भी पहुंचा था, जिसके बाद हवाईअड्डे के विस्तार का काम रोक दिया गया था। हाल ही में एक कार्यक्रम में, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने यह स्पष्ट कर दिया कि राज्य के एकमात्र हाथी रिजर्व को ष्वनस्पतियों और जीवों की व्यापक भलाई के लिएष् अधिसूचित नहीं किया जाएगा। लेकिन परियोजना के लिए अब ग्रामीणों की जमीन ली जा रही है, जिसको लेकर प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया है

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