बच्चों को बाघ से बचाओ सरकार

बाग यानी कि खतरा, फिर वह गुलदार हो या बाघ

रकार बहादुर मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए 5 गांवों में पायलट प्रोजेक्ट चलाने और अध्ययन करने की बात करती रही और इस बीच एक और बच्चा गुलदार, जिसे उत्तराखंड में सामान्य बोलचाल में बाग कहा जाता है, का निवाला बन गया। पौड़ी के पाबौ ब्लाक के निसनी गांव में 22 नवम्बर की देर शाम को एक 5 वर्षीय बालक पीयूष को गुलदार ने निवाला बना लिया। इस घटना से पूरे गांव में क्षोभ और गुस्सा है। यहां के गांवों में गुलदार की धमक लगातार बनी हुई है। पौड़ी में गुलदार की दहशत के कारण चौबट्टाखाल का भरतपुर गांव और दुगड्डा का गोदाबड़ी गांव पूरी तरह से भुतहा हो चुके हैं। बाग से जीवन खतरे में है और जीवन बचाने के लिए लोग लगातार पलायन कर रहे हैं।

वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में जनवरी से जुलाई तक 35 लोगों वन्य जीवों के हमले में मारे गये और 112 लोगों को बुरी तरह से जख्मी हुए है। ज्यादातर हमले गुलदार ने किये हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में भी 45 लोग मानव-वन्यजीव संघर्ष में मारे गये थे, जबकि 171 लोग घायल हुए। इसी तरह से वर्ष 2020 में 62 लोगों को वन्य जीवों ने मार डाला था, जबकि 2014 लोगों को घायल किया था।

इस साल का जुलाई से बाद का आंकड़ा नहीं मिल सका है। लेकिन हाल के दिनों में जितनी बड़ी संख्या में लोग गुलदार के शिकार हुए हैं, उसे देखते हुए यह यह आंकड़ा भी 50 से ज्यादा हो सकता है। वाइल्ड लाइफ के अफसरों के मुताबिक शाम होने पर अकेले नहीं जाएं। घर के आसपास झाड़ियां काट दें। लाइट के पर्याप्त इंतजाम हों, लेकिन क्या ये बात पहाड़ के गांवों में संभव है? पहाड़ में तो गांवों के आसपास ही सैकड़ों झाड़ियां होती हैं। कुत्ता रखने की भी सलाह दी गयी है। लेकिन ग्रामीण के अनुसार कुत्ते भी गुलदार और बंदरों को देखकर दुबक जाते हैं। भौंकते तक नहीं। बंदर तो कुत्तों को पीट डालते हैं। ऐसे में मानव-वन्य जीव संघर्ष रोकने के लिए पहाड़ के लिए अलग नीति बननी चाहिए। लेकिन बनाएगा कौन? नीतियां बनाने में नेताओं और नौकरशाहों को दिमाग खर्च करना होगा और कमीशन भी नहीं मिलेगा।

एक दिन पहले ही अपर मुख्य सचिव ने भारतीय वन्य जीव संस्थान और राज्य के विभिन्न विभागों के अधिकारियों के साथ बैठक कर एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत मानव-वन्यजीव संघर्ष को लेकर रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा था। यानी कि सरकार अब तक रिपोर्ट तैयार करने तक ही जा पाई है। जबकि हर साल दर्जनों लोग वन्य जीवों और खासकर गुलदार के शिकार हो रहे हैं। अब समय रिपोर्ट तैयार करने का नहीं, सीधे एक्शन का है।

यह बात अब साफ हो चुकी है कि उत्तराखंड के जंगलों में गुलदार और बाघों की संख्या यहां के जंगलों की क्षमता से ज्यादा हो गई है। पिछले दिनों मार्चूला बाजार में एक भूखी बाघिन डस्टबिन में खाना तलाश करती हुए गोली की शिकार हुई थी। इस घटना से साफ कर दिया है कि बाघों और गुलदारों को जंगल में खाना नहीं मिल रहा है। ऐसे में उनका बस्तियांे की तरफ आना लाजमी है। हालांकि पर्वतीय क्षेत्रों में बाग पहले भी बस्तियों मंे आते थे, लेकिन पहले वे सिर्फ कुत्तों और मौका मिलने पर अन्य पशुओं को ही निवाला बनाते थे। मानव पर हमला करने की घटनाएं केवल तब होती थी, जब कोई बाग यानी बाघ और गुलदार आदमखोर बन जाता था। लेकिन अब बागों की प्रवृत्ति में बड़ा अंतर देखने का मिला है। ऐसा लगता है कि हर बाघ और गुलदार आदमखोर बन चुका है। इसके लिए सरकार को न सिर्फ नीति बनानी पड़ेगी, बल्कि उसे लागू भी करना होग, वह भी जितनी जल्दी हो सके।

Leave A Reply

Your email address will not be published.