2021 : दरकते लोकतंत्र को किसान आंदोलन ने संभाला

Trilochan Bhatt

 

मतौर में नये वर्ष को लेकर मुझे कोई उल्लास की अनुभूति नहीं होती। मैं जानता हूं, तमाम दूसरे वर्षों की तरह एक और वर्ष बीत गया है और जो आया है, वह भी बीत ही जाना है। शुभकामनाओं का आदान-प्रदान एक औपचारिकता है, सो मेरी ओर से मेरे सभी पाठकों को शुभकामनाएं।

लेकिन, पुराने वर्ष का जाना और नये वर्ष का आना वह समय भी होता है, जब किसी न किसी रूप में हम बीते वर्ष में जो हुआ उसे याद करके नये साल की रूपरेखा जरूर बनाते हैं। पिछले साल यानी 2021 को याद करें तो दुख और दहशत के अलावा कुछ और मिला तो वह नफरत थी। वैश्विक महामारी ने हम सबका कोई न कोई अपना हमसे छीन लिया। यदि मैं खुद की बात करूं तो अजीत साहनी, सुरेन्द्र भंडारी और डाॅ. लाल बहादुर वर्मा जैसे सहृदय मित्रों को कोरोना हमसे छीन ले गया।

बीते वर्ष का अप्रैल से जून तक का महीना बेहद दुख और दहशत में बीता। अप्रैल मध्य में मैं स्वयं और मेरा पूरा परिवार कोविड की चपेट में आ गये। यह वही वक्त था, जब चारों ओर कोहराम मचा हुआ था। रोज हजारों की मौत हो रही थी, जिनमें कोई न कोई अपना भी होता था। गलियां और सड़कें सूनी। बोझिक हवाओं को एंबुलेंस के साइरन और बोझिल बनाते हुए। आॅक्सीजन के लिए मारा-मारी और अस्पताल में भर्ती होने के लिए दर-दर भटकते लोग। याद कर लीजिए, ठीक वही समय था, जब सरकार कहीं नहीं थी, सिर्फ चीख-पुकार थी। आपदा में अवसर तलाशने वाले यहां भी चुप नहीं बैठे थे। प्राइवेट अस्पतालों के कोविड के इलाज लाखों रुपये के बिल सोशल मीडिया पर तैर रहे थे। उत्तराखंड का कुंभ कोविड टेस्ट घोटाला ठीक इसी वक्त हो रहा था। और उसके बाद नदियों में तैरती लाशें हम सभी ने तस्वीरों में देखी। इन लाशों पर भी सरकार चुप थी।

खैर… बहुत बुरा वक्त गुजर गया था। हालांकि अपने गुजरने से पहले वह लाखों घरों को जीवनभर की उदासी दे गया था। हमारी महान सरकार की खासकर स्वास्थ्य संबंधी व्यवस्थाओं को सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र कर चुका था। लेकिन, जिन्हें निर्वस्त्र होने पर शर्म महसूस होनी चाहिए थी, वे कुछ ही दिन बाद नफरत का पिटारा लेकर सामने आ गये।

किसान आंदोलन को वर्ष 2021 की बड़ी उपलब्धि माना जाएगा। बड़ी उपलब्धि सिर्फ इस मायने में नहीं कि आखिरकार इस महान आंदोलन के सामने सरकार को झुकना पड़ा और माफी मांगनी पड़ी। बड़ी उपलब्धि सिर्फ इस मायने में भी नहीं कि मारक कोरोना की दूसरी लहर, भीषण गर्मी, उफनती बरसात और कड़ाके की ठंड के बावजूद किसान लगातार अपने मोर्चे पर जमें रहे। बड़ी उपब्धि सिर्फ इसलिए भी नहीं कि सरकार और उसके गोदी मीडिया द्वारा लगातार निशाने पर रखे जाने के बावजूद यह आंदोलन अडिग रहा। बल्कि, बड़ी उपलब्धि इसलिए भी धराशाही होने के लिए तैयार भारतीय लोकतंत्र की इस आंदोलन ने ऐसी रिपेयरिंग की है कि आने वाले कुछ वर्षों तक उसे बने रहने की उम्मीद बढ़ गई है।

किसान आंदोलन के लिए केन्द्र के नरेन्द्र मोदी सरकार और देश के गोदी मीडिया का रुख तो पहले ही दिन साफ हो गया था, जब सरकारें दिल्ली की ओर बढ़ते किसानों को रोककर सड़कों को खोद रही थी, पानी की बौछारें फेंकी जा रही थी और देश का मीडिया इसका समर्थन कर रहा था। दिल्ली की सीमाओं पर जब सरकार ने पहले बिठा दिये तो इन्हीं सीमाओं पर किसानों ने जिस तरह का आंदोलन किया वह विश्व इतिहास में अभूतपूर्व था। जब भी जन आंदोलन और लोकतंत्र की बात होगी, भारत का यह किसान आंदोलन जरूर याद किया जाएगा।

आसान नहीं था इस मोर्चे पर जीत दर्ज करना। एक तरफ देश की संवैधानिक संस्थाओं को लगातार तबाह कर रही केन्द्र सरकार का दमनकारी रुख था तो दूसरी तरफ मीडिया पर रात दिन चलाया जा रहा प्रोपगेंडा जिसमें किसानों को बदनाम करने के लिए रात दिन नये नये तर्क और नई नई कहानियां गढ़ी जा रही थी।

किसान आंदोलन और कोविड की दूसरी वेव और गोदी मीडिया की देश विरोधी करतूतों के इतर कुछ और की बात करें तो वह यह है कि 2021 में
नफरत की फसल कुछ और लहलहाई है
देश की संवैधानिक संस्थाएं कुछ और लड़खड़ाई हैं
गरीबों और बेबसों की आंखें कुछ और डबडबाई हैं।

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