पहाड़ की संवेदनाओं के कवि कन्हैयालाल डंडरियाल (जयंती (11 नवंबर पर विशेष )

Charu Tiwari
हमारे कुछ साथी उन दिनों एक अखबार निकाल रहे थे। दिनेश जोशी के संपादन में लक्ष्मीनगर से ‘शैल-स्वर’ नाम से पाक्षिक अखबार निकल रहा था। मैं भी उसमें सहयोग करता था। बल्कि, संपादक के रूप में मेरा ही नाम जाता था। यह 2004 की बात है। हमारे मित्र शिवचरण मुंडेपी कर्इ लोगों से परिचय कराते थे। उन्होंने मेरा परिचय एक ऐसे व्यक्ति से कराया जो गढ़वाली भाषा का चलता-फिरता ज्ञानकोश थे। उनका नाम था- नत्थी प्रसाद सुयाल। सुयाल जी का गढ़वाली भाषा के प्रति समर्पण और श्रद्धा देखने लायक थी। उन्होंने गढ़वाली भाषा के प्रचार-प्रसार के लिये बहुत काम किया।
उन दिनों उन्होंने डंडरियाल जी के कविता संग्रह ‘अंज्वाल’ को बड़े मनोयोग से नये कलेवर में प्रकाशित किया था। यह संग्रह भी उन्होंने मुझे दिया। उनका असमय निधन हो गया था। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि देते हुये कृतज्ञता प्रकट करता हूं कि उन्होंने एक कालजयी रचनाकार के साहित्य से परिचय कराया। गढ़वाली भाषा और साहित्य को जानने-समझने का रास्ता भी सुझाया। सबसे पहले शिवचरण मुंडेपी जी ने कन्हैयालाल डंडरियाल जी के साहित्य से गहरार्इ से परिचय कराया। उनकी कविताओं का हिन्दी में अनुवाद कर बताया। डंडरियाल जी की उपलब्ध पुस्तकें ‘चांठो का घ्वीड़’, ‘नागरजा’, ‘कुयेड़ी और ‘मंगतू’ भी मुझे दी। आज पहाड़ की संवेदनाओं के कवि कन्हैयालाल डंडरियाल जी की जयंती है। उन्हें शत-शत नमन।
कन्हैयालाल डंडरियाल जी मिलने का सौभाग्य नहीं मिला। हां, उनका उपलब्ध साहित्य जरूर पढ़ा। मैं गढ़वाली बोल नहीं पाता, लेकिन पढ़ता लगातार हूं। कोर्इ शब्द या भाव समझ में नहीं आया तो साथी बता देते हैं। कन्हैयालाल डंडरियाल जी का जन्म पौड़ी जनपद के मवालस्यूं पट्टी के नैली गांव में 11 नवंबर, 1933 में हुआ था। वे बीस वर्ष की अवस्था में रोजगार की तलाश में दिल्ली आ गये थे। बताते हैं कि उन्होंने 16 वर्ष की अवस्था से ही चूते-चप्पल पहनना छोड़ दिया था। दिल्ली आकर वे बिड़ला मिल में नौकरी करने लगे। बाद में कंपनी बंद होने से बेरोजगार हो गये। उन्होंने अपने परिवार के भरण-पोषण के लिये चाय बेचने का काम किया। जिन भी लोगों से कन्हैयालाल डंडरियाल जी के बारे में बात होती है वह यही बताते हैं कि कंधें में चाय की पैकेटों का थैला लटकाये घर-घर नंगे पैर जाते थे। गर्मी, बरसात या सर्दी हर मौसम में वे अपने काम को बड़ी शिद्दत के साथ करते मिलते। उनके अंदर समाज को जानने-समझने और गहरी संवेदनाओं के साथ आमजन की पीड़ा को रखने की चेतना भी इन्हीं संघर्षो से आर्इ।
गढ़वाली भाषा और साहित्य को एक उच्च मुकाम तक पहुंचाने में कन्हैयालाल डंडरियाल जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गढ़वाल के प्रति उनकी अगाथ श्रद्धा और प्रतिबद्धता को उनके पूरे साहित्य में देखा जा सकता है। यह समर्पण उनके लिखने में ही नहीं, बल्कि व्यवहार में भी था। उन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थ, राग-द्वेष और बिना किसी पूर्वाग्रह के जीवन मूल्यों, जीवन दृष्टि, व्यथा-वेदना, जनसरोकार, हर्ष, पीड़ा, संघर्षों को केन्द्र में रखकर उत्कृष्ट, उदात्त और जीवंत साहित्य की रचना की। कर्इ बार वह व्यंग्य के रूप में भी उभरकर सामने आती है। उनके लेखन में सामयिक चेतना साफ दिखार्इ देती है। दूरदृष्टि भी। उनके लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह पाठकों को बहुत गहरे तक प्रभावित करता है। बहुत संवेदनाओं के साथ। वह उन रचनाओं को अपने आसपास में ढूंढता है। उसे वह मिलती भी है। अपने इर्द-गिर्द या खुद अपने में। उनके लेखन में जीवन के सच को पहचानने और स्वीकारने की चेष्टा दिखार्इ देती है। वे आमजन की बहुत बारीक कथ्य और भाव को खूबसूरती के साथ व्यक्त करते थे।
प्रकाशित रचनायें :
‘मंगतू’ खंडकाव्य, ‘अज्वाल’ कविता संग्रह, ‘कुयेड़ी’ (गीत संग्रह), ‘नागरजा’ (महाकाव्य भाग -1) ‘चौठो की घ्वीड़’ (यात्रा वृत्रांत), ‘नागरजा’ (महाकाव्य भाग-2)
‘अंज्वाल’ (कविता संग्रह), ‘नागरजा’ (महाकाव्य भाग-3 व 4)
अप्रकाशित रचनायें :
‘बागी उप्पने लड़े’ खंडकाव्य, ‘उडणी गण’ खंडकाव्य, ‘कंसानुक्रम’ नाटक (मंचित), ‘स्वयंवर’ नाटक (मंचित), ‘भ्वीचल’ नाटक (मंचित), ‘अबेर च अंधेर नी’ नाटक, ‘रुद्री’ उपन्यास।

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