सिनलापास जा रहा हूं

Trilochan Bhatt

 

शाम 5 बजे हमें एक जोर की सीटी का स्वर सुनाई दिया। पता चला कि यहां भारत तिब्बत सीमा पुलिस तथा स्पेशल पुलिस फोर्स दोनों का कैंप हंै। दोनों की टीमों के बीच आज वॉलीबाल मैच है। हमें दर्शक के रूप में आमंत्रित किया गया था। हमें विशेष सम्मान भी दिया गया, क्योंकि यहां दर्शकों का अभाव है।

मैच देखने पहुंचे तो भारत तिब्बत सीमा पुलिस की टीम कप्तान ने शेखर (प्रो. शेखर पाठक) को अपनी ओर से खेलने को कहा। शेखर ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तीनों मैचों में अपनी टीम को हराने का पूरा श्रेय शेखर का ही था।

– पुस्तक अंश
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मित्र अरुण कुकसाल और उनके कुछ अन्य साथियों के साथ मध्यमहेश्वर, रानीखेत, रुद्रनाथ और नागपुर की कुछ लघु यात्राएं करने के बाद इन दिनों पहाड़ के प्रसिद्ध फोटोग्राफर कमल जोशी के साथ सिनला दर्रे तक की यात्रा पर हूं। साथ में प्रो. शेखर पाठक और कुछ अन्य लोग हैं।
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कमल जोशी का सिर्फ नाम ही सुनता रहा। किसी दिन मुलाकात अवश्य होगी… लेकिन, नहीं हो पाई। फिलहाल इस यात्रा में कमल जोशी के साथ निकला हूं तो आश्चर्य  है कि 13 वर्ष की छोटी सी उम्र से ही दमा की गंभीर बीमारी से पीड़ित, इस व्यक्ति में इतना हौसला कहां से आया कि करीब 124 किलोमीटर चलकर, 15000 फीट की ऊंचाई वाले जोलिंग-कांग यानी छोटा कैलाश तक पहुंच चुका है। और अब आगे कमर तक की बर्फ को चीरते हुए सिनलापास जाने के लिए दृढ़ संकल्पित है। पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूं। बार-बार इनहेलर से दमा की दवा निगल कर वे आगे की यात्रा के लिए तत्पर हो जाते हैं। वे सिर्फ यात्रा नहीं करते हैं। कभी नदियों के संगीत में खो जाते हैं तो कभी स्थानीय लोगों से, खासकर बुजुर्गों से वहां के रीति-रिवाजों और तिब्बत व्यापार के बारे में बातें करने लगते हैं। अफसोस हुआ कि इतनी जीवट व्यक्ति ने आखिर वहां जाने का फैसला क्यों किया होगा, जहां जाकर वे अपनी यात्राओं के विवरण अपनी डायरी में नहीं लिख सकते….

बहरहाल।

पहले काली और फिर कुटी-यांग्ती नदी के साथ चलते चलते हुए पहले धारचुला से बस में तवाघाट और तवाघाट ने पैदल पांगू, सिमखोला, जिप्ती, लागर-फू, माले-पा, गब्र्यांग, गुंजी, नेपल्च्यूू होते हुए हमें रास्ते में एक उजड़ता हुआ गांव कुटी मिला था। कमल जोशी के अनुसार यह गांव तिब्बत व्यापार के दौर में एक समृद्ध गांव हुआ करता था। लेकिन अब गुजरने की कगार पर है इस गांव में कमल जोशी ने पहली बार एक पशु से परिचय करवाया नाम है झेप्पू नर और झुम्मू मादा।

इस पशु का नाम मैंने पहले कभी नहीं सुना। यह पशु इस बर्फीले इलाके में यह न सिर्फ सामान होते हैं बल्कि झुम्मी दूध भी देती है। ये ऐसे निराले जीव हैं, जो संतति पैदा नहीं कर सकते। झुम्मी से संतति प्राप्त करने के लिए याक का सहारा लेना पड़ता है। इस प्राणी के बारे में गूगल सर्च मारा तो कहीं कुछ नहीं मिला। हां किसी पोर्टल पर एक रिपोर्ट जरूर मिली, जो 2018 की है। इसमें झेप्पू को छब्बू और झुम्मी को ‘चंवर गाय’ लिखा गया है। रिपोर्ट बताती है कि याक प्रजाति का संरक्षण करने की तमाम कोशिशें नाकाम होने के बाद अब उत्तराखंड सरकार ने चंवर गाय और की याक के संकरण से झब्बू प्रजाति को बढ़ावा देने की योजना बनाई है। यह योजना कहां तक पहुंची होगी, इस बारे में गूगल पर कोई जानकारी नहीं मिली।

फिलहाल मैं कमल जोशी के साथ छोटा कैलाश पहुंच चुका हूं। साथ में शेखर दा हैं। ललित, लक्ष्मण और चन्द्रू भी हैं। मैं खुद छोटा कैलाश का वर्णन क्या करूं, कमल जोशी की आंखों से आप भी देखिए-

‘सामने छोटा कैलाश प्रातः कालीन सूर्य की रोशनी में तरोताजा खड़ा था। सुबह की धूप ने हिमशिखर को स्वर्ण मंडित किया हुआ था। तस्वीरों में जैसा कैलाश पर्वत दिखता है, लगभग वैसा ही। इसीलिए इसे जांच परख कर ही छोटा कैलाश का नाम दिया गया है। कैलाश के पैरों के पास ही लेटा हुआ पार्वती ताल शांत वातावरण में दर्पण की भूमिका निभा रहा था। छोटा कैलाश अपनी भव्यता से पार्वती ताल को निहार रहा था। पार्वती ताल पूरे कैलाश को उतनी ही भव्यता से परिवर्तित कर रहा था।

कैलाशपति शिव की अराधना में लीन आसपास के पर्वत अविचल खड़े थे। उनकी गंभीरता वातावरण की गरिमा बढ़ा रही थी। मैंने जल्दी-जल्दी उस सुंदरता के हिस्से को कैमरे में समेटने की कोशिश की। प्राकृतिक शिव को नतमस्तक होते हुए मैंने मंदिर की घंटी बजाई। तभी शेखर भी वहां पहुंचा।

‘अद्भुत‘ उसका पहला संबोधन। वातावरण में जो भी अद्वितीय था, यह शब्द उसको समेट ले गया। मैं दृश्य में खोया हुआ ही था कि कुत्ता पुनः मेरे सीने की तरफ उछलने लगा। मैंने उससे प्यार किया। बड़ा ममतालू प्राणी था वह भी। प्रकृति के दृश्य के प्रभाव से वह भी अछूता नहीं था।

चट्टानों की दरारों में बर्फ, मंदिर में त्रिशूल, पृष्ठभूमि में दूर नेपाल के कतारबद्ध हिमशिखर। ऊपर मुस्कुराता कैलाश तो नीचे गंभीरता के साथ स्पंदित होता पार्वती ताल। कुल मिलाकर एक तिलस्मी मायावी दृश्य जो वास्तविक था। सारी यात्रा धन्य हो गई। यहां पहुंचने के लिए 124 किलोमीटर जो अब तक चले थे उसके सारे कष्ट ‘हरच’ गये।
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स्वर्गीय कमल जोशी के साथ मैं यह यात्रा उनकी पुस्तक ‘चल मेरे पिट्ठू दुनिया देखंे’ के माध्यम से कर रहा हूं। इस पुस्तक का प्रकाशन समय साक्ष्य देहरादून ने किया है, उनकी मृत्यु के पश्चात। गीता गैरोला ने कमल जोशी की डायरी के पन्नों को समेटकर इस पुस्तक का संपादन किया है। पुस्तक की कीमत 300 रुपये है।

अरुण कुकसाल जी के साथ अभी सुंदरढूंगा ग्लेशियर, रुद्रनाथ, दानपुर, सोमेश्वर, तुंगनाथ जैसी तमाम यात्राएं करनी बाकी हैं। ये यात्राएं उनकी पुस्तक ‘चले साथ पहाड़’ के माध्यम से होंगी। इस पुस्तक का प्रकाशन संभावना प्रकाशन हापुड़ ने किया है। पुस्तक की कीमत 250 रुपये है।

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