भारत का ऐतिहासिक किसान आंदोलन

  • Trilochan Bhatt

 

राकेश टिकैत की गाजीपुर बॉर्डर से वापसी के साथ ही पिछले एक वर्ष से ज्यादा समय से चला आ रहा किसान आंदोलन अब आखिरकार समाप्त हो गया है। किसान नेताओं के शब्दों में कहें तो स्थगित हो गया है। हालांकि आंदोलन समाप्त होने की घोषणा कुछ दिन पहले ही हो गई थी, लेकिन राकेश टिकैत ने ऐलान किया था कि एक वर्ष से दिल्ली की सीमाओं में जमे सभी किसानों की वापसी के बाद ही वे 15 दिसंबर को लौटेंगे। 15 दिसंबर को आखिरकार टिकैत लौट गये और आंदोलन फिलहाल समाप्त हो गया है। हांलाकि किसान नेताओं को 15 जनवरी को फिर बैठक बुलाई है, जिसमें सरकार द्वारा इस दौरान उठाये गये कदमों की समीक्षा की जाएगी।

यूं तो देशभर में और विश्वभर में आंदोलनों का एक अनवरत सिलसिला चलता रहता है। प्रधानमंत्री बेशक आंदोलनकारियों को ‘आंदोलनजीवी’ कहकर उनका मजाक उड़ाने का प्रयास करते हों, लेकिन वास्तविकता यह है कि आज हम नागरिक समाज को जिस रूप में देखते हैं, वह अनवरत जन आंदोलनों का ही नतीजा है। यह सच है कि सड़कों पर आंदोलन इस बात का सबूत होते हैं कि समाज में रहने वाले लोग अभी जिन्दा हैं। सरकारें कोई भी हों, वे तभी तक जनहित में सोचती हैं, जब तक आंदोलनकारी सड़कों पर होते हैं या उन्हें आंदोलन की आशंक रहती है। किसी ने कहा भी है कि सड़कें सूनी हो जाएंगी तो संसद आवारा हो जाएगी। इसलिए जरूरी है कि आंदोलनजीवी सड़कों पर रहें या किसी भी समय सड़कों पर उतरने के लिए तैयार रहें।

नागरिक समाज का एक हिस्सा होने के कारण मैं हर आंदोलन को देखने समझने का प्रयास करता रहा हूं। यथासंभव आंदोलनों में हिस्सेदारी भी करता रहा हूं। कुछ आंदोलनों में हिस्सा नहीं ले सकता, लेकिन किसी न किसी रूप में अपना समर्थन जरूर व्यक्त करता हूं। किसान आंदोलन भी ऐसा ही एक आंदोलन है, जिसमें मैं व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हो पाया, लेकिन हर रोज, बल्कि हर दिन इस आंदोलन से और आंदोलन के दौरान होने वाली गतिविधियों से जुड़ा रहा हूं। अब तक जिन आंदोलनों को मैंने नजदीक से देखा है, उनमें उत्तराखंड आंदोलन के बाद किसान आंदोलन दूसरा ऐसा आंदोलन है, जो अपनी परिणति तक पहुंचे हैं। हालांकि इन दोनों आंदोलनों में कई लोगों को अपनी जान देनी पड़ी है। यह एक कड़ुआ सच है कि बिना बलिदान के आज तक कोई आंदोलन सफल नहीं हुआ है। चाहे देश की आजादी का आंदोलन रहा हो या फिर उत्तराखंड अलग राज्य का आंदोलन और अब किसान आंदोलन। हर आंदोलन में कई लोग शहीद हुए। आज किसान आंदोलन के बहाने तमाम आंदोलनों के शहीदों को याद करने का भी वक्त है।

किसान आंदोलन सफल रहा। सरकार ने सभी मांगें मान ली। लेकिन, अभी बहुत कुछ होना बाकी है। सरकारों की नीयत आमतौर पर वैसी नहीं होती, जैसी नजर आती है। उत्तराखंड आंदोलन उदाहरण है। राज्य बनने के बाद सबसे पहले तो राज्य का नाम बदल दिया गया। एक ऐसा नाम दिया गया, जो जन भावनाओं के अनुकूल नहीं था। परिसीमन के मामले में ऐसा घालमेल किया गया, जिसे इस राज्य के जनता अब भी भुगत रही है और भविष्य में फिर से एक बड़ी विषमता का राज्य में पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों का सामना करना पड़ सकता है। उत्तराखंड राज्य इसलिए लड़ा गया था, ताकि पहाड़ों के विकास की योजनाएं पहाड़ों में बैठकर बनाई जाएं। लखनऊ में बनाई जा रही योजनाएं पहाड़ों के काम नहीं आ रही थी। लेकिन, राज्य बनने के बाद भी इस मामले में कुछ हुआ नहीं। अब योजनाएं देहरादून में बन रही हैं। पहाड़ की राजधानी पहाड़ में बनाने की मांग को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।

किसान आंदोलन की बात करें तो फौरी तौर पर केन्द्र सरकार ने सभी मांगें मान ली हैं। तीन कृषि कानून, जिन्हें काले कानून कहा जा रहा था, संसद में वापस हो चुके हैं। बाकी मांगों में कमेटी के गठन के लिए केन्द्र सरकार सहमत हो गई है। लेकिन, अभी सब कुछ किसान के हाथ में नहीं है। आंदोलन समाप्त होने के बाद जो तरह-तरह के घालमेल किये जाते हैं, उनकी अभी पूरी संभावना बनी हुई है। इस पूरे मामले में भरोसा इसलिए अब भी बना हुआ है किसानों ने आंदोलन समाप्त नहीं, स्थगित करने की घोषणा की है। मेरा मानना है कि किसानों की मानी जा चुकी मांगों में अभी कई तरह के फेरबदल किये जाने की आशंका बनी हुई है, इसलिए किसानों को अब भी हर समय फिर से इसी तरह के जज्बे के साथ सड़कों पर डेरा डालने के लिए तत्पर रहना होगा।

जो भी हो, अब तो जो कुछ किसान के आंदोलन के दौरान हुआ है, उसने जन आंदोलनों के नई ऊंचाइयों तक तो पहुंचाया ही है। यूं ही नहीं इस आंदोलन ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। इस आंदोलन ने साबित किया है कि सत्ता कितनी भी क्रूर और बेरहम क्यों न हो, एक दिन जनता के आवाज के सामने उसे झुकना पड़ता है। इस आंदोलन ने यह भी सिखाया है कि सत्ता बेशह हिंसा पर उतारू हो जाए, लेकिन आंदोलन को हिंसा पर नहीं उतरना चाहिए। पुलिस की लाठियों और जीते-जागते किसानों पर चढ़ती नेता-पुत्र की गाड़ियों के टायर के बाद यदि किसान हिंसक हो जाते तो यकीन मानिये आंदोलन फेल हो जाता। इसी वर्ष 26 जनवरी को हुई लाल किले पर हुई घटना की आड़ में किस तरह आंदोलन के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास किया गया, यह जगजाहिर है।

आंदोलन समाप्त नहीं सिर्फ स्थगित हुआ है।

विश्व जन आंदोलनों के इतिहास में भारत का 2021 के किसान आंदोलन गर्व के साथ अंकित किया जाएगा। जब भी जन आंदोलनों की बात होगी, इस आंदोलन और इस आंदोलन की सफलता को उदाहरण के रूप में पेश किया जाएगा। एक बड़े और स्वतःस्फूर्त आंदोलन को किस तरह मैनेज किया गया, इस बात को लेकर आने वाला समय किसानों के इस आंदोलन को नजीर के तरह पेश करेगा।

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