घूमते-घूमते कहां पहुंच गये विजय भट्ट और इंद्रेश नौटियाल (पहला हिस्सा)

 ViJay Bhatt/Indresh Nautiyal

 

र्षा ऋतु में प्रकृति अपने यौवन के सभी श्रंगार कर तरो ताजा सी दिखती हुई हम सभी के मन को आकर्षित कर जाती है। यही कारण है कि अगस्त सितम्बर के महिने पहाड़ों पर घूमने का एक जबरदस्त आर्कषण रहता है। हरे भरे पहाड़ों पर नहा धोकर खडे पेड पोधे झाड़ियां उन पर फूदकते चहचाहट करते नाना प्रकार के पक्षी, रास्ते में जगह जगह झर झर बहते झरने, कल कल करती नदियां, सड़क के किनारे लवण रस का पान करती रंग बिरंगी तितलियां हमें रोक कर निहारने के लिये विवश कर देती हैं। मन को अच्छे लगने वाले किसी सृजनात्मक आयोजन में शामिल होने का अनऔपचारिक आमंत्रण भी हो और साथ ही प्रकृति को देखने निहारने का कोई अवसर भी, तो कोन अभागा होगा जो अकारण ही इस आयोजन में शामिल होने का अवसर हाथ से निकने देगा।
तो जनाब 2-3 अक्तूबर 2021 को ’’ग्रामीण युवाओं के लिये साहित्य संवाद’’ कार्यक्रम का आयोजन ’’जन जागृति संस्थान खाड़ी, टिहरी गढ़वाल’’ में किया गया था। इस कार्यक्रम की सूचना और सभी के लिये खुला निमंत्रण साथी गीता गैरोला की फेसबुक पेस्ट में देखा था। बस पोस्ट को देखकर इसमें शामिल होने का इरादा कर लिया। मैने साथी इन्द्रेश नौटियाल से चलने के लिये कहा तो वह भी बिना लागलपेट के चलने के लिये सहर्ष तैयार हो गया।  दो अक्तूबर की सुबह चाय नाश्ता निपटाकर हमने अठ्ठारह साल पुरानी टीवीएस बाईक पर अपना सफर शुरू किया। पहाड़ की तलहटी में बनी रायपुर – थानों बड़कोट वाली सड़क पर हमारी बाइक हौले हौले चलने लगी। ऋषिकेश जाते हुये सात मोड़ पहिले बड़कोट से बाईं ओर नरेन्द्र नगर के लिये एक सड़क बनी हुई हैं ,
हमने इसी सड़क से जाना तय किया क्योंकि यह प्रकृति के बीच में से होकर गुजरती है। इस सड़क से बहती हुई चन्द्रभागा नदी का बहुत खूबसूरत नजारा नजर आता है। गुजराड़ा से पहिले एक जगह जंगली हाथियों पर नजर रखने के लिये पक्का वाच टावर बना हुआ है। इस पर चढ़कर हमने भी एक सौ अस्सी डिग्री नजर घुमाकर जंगल नदी के फैलाव को देखा। रास्ते में कुछ जगहों पर नदी व झरनों के खूबसूरत दृश्यों को रूक कर देखा। कुछ तस्तवीर कैमरे में कैद की। रास्ते में दो तीन जगहों पर आया मलवा इस बरसात में हुये भंयकर भूस्खलन की दासतां बयां कर रहा था। नरेन्द्रनगर व हिंडोलाखाल के पश्चिमी ढलान से निकलने वाली छोटी छोटी चार नदियां धोड़ा पानी, संगडी भैंसराखाला, भारतखाला और अमेल्डी मिलकर आगे चन्द्रभागा नदी बनाती हैं। चन्द्रभागा ऋषिकेश में गंगा से मिल जाती है। अब हम गंगोत्री राजमार्ग पर आ गये थे। इस राजमार्ग की देखभाल व निर्माण पहले तो बीआरओ के अन्र्तगत होता था पर आजकल केन्द्रीय सरकार की आल वेदर रोड योजना के नाम पर इसका चैड़ीकरण किया जा रहा है। वैसे तो इसका नाम तो आल वेदर रोड रखा गया था पर यह तो एक वेदर भी पूरा न झेल पाई और पर्यावरण के साथ पारिस्थितिकी का जो नुकसान हुआ वो अलग से। हिंडोलाखाल से आगे तो सड़क मोड़ पर अत्यधिक संकरी हो गई है । दुआधार पर पहाड़ धंस सा रहा है।
आगराखाल के आगे सड़क धंस कर गायब हो गइ है किनारे से वैकल्पिक इंतजाम किया गया है। एक जगह सुंदर जल प्रपात दो भागों में बंटकर खूबसूरत नजारा पेश कर रहा है, जिसे देखकर आने जाने वाले यात्री अभीभूत हो रहे हैं। कुछ रूक कर फोटो खींच रहे हैं। यहां हरियाणा प्रदेश की दो गाड़ियां भी खड़ी थी, जिस पर जाम सजे हुये थे। हरियाणा के युवा डेक के संगीत पर मद मस्त होकर थीरक रहे हैं। हमने जलप्रपात को निहारा कुछ फोटू ली और आगे बढ़ गये। कुछ ही देर में हम खाडी पहुंच गये। यहां एक जगह कार्यक्रम का बैनर लगा  देखा तो हम वही रूक गये। यह माउंटेन फूड कनेक्ट ’’समूण’’ का केन्द्र है। यहां खड़ी एक महिला ने हमें कार्यक्रम स्थल जाने वाले रास्ते से अवगत कराया। बाइक सड़क के किनारे खड़ी कर हम जन जागृति संस्थान में पहुंच गये।
 खाड़ी सर्वोदय आंदोलन का एक केन्द्र रहा है। क्षेत्र के गांधीवादी विचारक वरीष्ठ समाजसेवी धूम सिंह नेगी गुरूजी , बीज बचाओ आंदोलन से जुड़े विजय जड़धारी, के साथी व सर्वोदय आंदोलन के प्रमुख सिपाही पत्रकार साहित्यकार प्रताप शिखर जी द्वारा स्थापित  जन जागृति संस्थान में प्रवेश करना एक आश्रम में प्रवेश करने जैसा एहसास करा जाता है। भाई अरण्य रंजन वर्तमान में अपने पिता प्रताप शिखर जी के काम को आगे बढा रहे हैं। इसी संस्थान में युवा साहित्य संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। गीता गैरोला, दीपा कुशलम, उमा भट्ट, चन्द्रा, आरिफा, महीपाल नेगी, मोहन चोहान, डा जितेन्द्र भारती, गार्गी प्रकाशन के भाई दिगंबर, संभावना प्रकाशन के अभिषेक अग्रवाल, साहबसिंह सजवाण, गोपाल भाई, विकास नारायण आदि लब्धप्रतिष्ठित विभूतियां पहले से ही उपस्थित थी। कविता का पहला सत्र समाप्त हो चुका था। दोपहर भोजन के बाद कहानी पर दूसरा सत्र शुरू हुआ जिसमें हमने भी अपनी हाजरी लगाई। यहां कस्तूरबा गांधी विद्यालय के छात्रायें भी उपस्थित थी। कहानी को लेकर चर्चा हुई, कहानी सुनाई भी गयी और छात्राओं ने सामुहिक रूप से बिल्ली को लेकर कहानी रचने की कोशिश भी की। बच्चों से बात करते हुये यह भी पता चला कि हमारी शिक्षा व्यवस्था कहानी को लेकर बंघे बधाये  सीख वाली कहानी के स्टोरियोटाइप फ्रेम को तोड़ने में असफल सी रही है। समाज में व्याप्त अंधविश्वास से भी छात्र व युवा पीढ़ी अछूती नही है।
महिपाल भाई बड़े लगन व उत्साह के साथ युवा पीढ़ी को गीत सीखा रहे हैं अपनी मधुर धुन में गीत भी गा रहे हैं। गोपाल भाई ने मांगल की तर्ज पर जो गीत सुनाया उसने तो मन मोह ही लिया। इस गीत में लोकधुन का इस्तेमाल करते हुये पर्यावरण जागरूकता के साथ प्रकृति के बहुत ही सुंदर बिंब खींचे गये थे। पहले दिन के कार्यक्रम की समाप्ति के बाद गप्प शप्प का दौर जो चला तो मजा ही आ गया। समाज धर्म अध्यात्म से लेकर भूतपुराण तक गप्पबाजी का विषय रहा। चैकी पर बैठकर रात्रि भोजन किया और विश्राम करने चले गये। दिन भर शानदार रहा सोते सोते नींद आने तक साथी मोहन चोहान से बातें होती रही। कब नींद आयी और कब सुबह हो गई पता ही न चला।
अगले दिन अपने दैनिक काम निपटा कर चाय नाश्ता खा पीकर हम तैयार हो गये। अपना पिठ्ठु तैयार कर लिया था क्योंकि हमें आज सुबह ही निजी काम से आगे जाना था। बहार बैठा ही था कि सामने से युवा कवि साथी संजीत समवेत आ गये। इनसे परिचय हुआ पहले ही परिचय में ये अपने हो गये। कुछ ही देर सत्र में उपस्थित होकर हमने आगे चलने के लिये इजाजत मांग ली और शानदार स्मृतियों को साथ में लेकर साथियों को अलविदा कह वहां से निकल आये। यह प्रवास नये पुराने साथियों से मेल मुलाकात के साथ मेरे लिये प्रेरणास्पद रहा।
 लेखकद्वय धुमक्कड़ और सोशल एक्टिविस्ट हैं

 

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