बहुत लग गई खुद, बहुत देख ली बांद अब चेतना और विद्रूपता के गीत चाहिए

Trilochan Bhatt

 

लंबे समय के बाद देहरादून में पहाड़ के भाषाविदों और रचनाकारों का एक मंच पर जुटना अच्छा लगा। बहाना एक गीत के विमोचन का था, जो कुछ युवाओं ने तैयार किया है और यूट्यूब चैनल पहाड़ीवुड पर अपलोड किया है।

नरेन्द्र सिंह नेगी

सबसे पहले गीत की बात करें तो नये बच्चों ने जिस लगन और मेहनत के साथ गीत तैयार किया, वह सराहनीय है। गीत नवनीत बिष्ट और अजय अनंत ने लिखा है। संगीत पांडवाज के ईशान डोभाल का है। मोहित नेगी ने गीत गाया है। अनिल नौटियाल, गोपेश कुमार और शीतल भंडारी ने अभिनय किया है। गीत का शीर्ष है चल रे दगड््या। यूट्यूब पर इस गीत को जरूर देखिए।

गीत के विमोचन के बहाने पहाड़ के भाषा और संस्कृति को लेकर तमाम बातें हुई। गढ़गौरव गीतकार नरेन्द्र सिंह नेगी भी गीत से प्रभावित हुए। मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद नेगी जी ने अपने संबोधन में कहा भी कि पहाड़ को जिन नये गीतकारों और रचनाकारों की तलाश थी, लगता है वह तलाश अब पूरी होने जा रही है। उन्होंने नये रचनाकारों को सलाह दी कि वे एक-एक शब्द दस बार देखें और उसके तमाम अर्थों में जाएं। खूबसूरत से खूबसूरत शब्द प्रयोग करें। गीत में आये खुदा मिटौण शब्द का उदाहरण देते हुए नेगी जी ने कहा कि जैसे प्यास मिटाने वाली चीज नहीं है, वैसे खुद भी मिटाने वाली चीज नहीं है। खुद मिटाने की जगह खुद बिसरौण शब्द ज्याद सटीक है। जैसे तीस मिटौण नहीं तीस बुझौण शब्द ज्यादा अच्छा है। उन्होंने गीत को बेहतरीन बताया, लेकिन यह भी कहा कि किसी भी काम में लगातार सुधार किये जाने चाहिए।

विशिष्ठ अतिथि के रूप में मौजूद धाद संस्था के संयोजक और कवि-लेखक लोकेश नवानी ने कहा कि इन युवाओं ने गीत की रचना, संगीतबद्धता और फिल्मांकन के मामले में जो काम किया। उसके लिए उन्हें वे सौ में से सौ अंक देते हैं। लोकेश नवानी ने युवाओं को कहा कि अब खुद और बांद के गीत बहुत हो चुके हैं। खुद का दौर अब खत्म हो गया है और बांद के गीत भी बहुत हो चुके हैं। नये दौर में नई चेतना और विद्रूपताओं के गीत लिखे जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें किसी स्त्री की सुन्दरता तो नजर आती है, लेकिन उसके संघर्ष नजर आते। इस लिए अब युवा पीढ़ी का दायित्व है कि वे सिर्फ सौन्दर्य नहीं, स्त्री के संघर्षों को भी अपने गीतों का विषय बनाएं।

लोकेश नवानी

लेखक और भाषाविद् नन्द किशोर हटवाल ने कहा कि कोई भी रचना करते समय शब्दों को प्रयोग बहुत मायने रखता है। यही शब्द किसी रचना को सुन्दर और कालजयी बना देते हैं। कवय़ित्री वीना बेंजवाल ने भी शब्दों के चयन में विशेष सावधानी बरतने को कहा। उन्होंने उदाहरण दिया कि कुयेड़ी के साथ झन-झन जैसा ध्वन्यात्मक शब्द नहीं होना चाहिए। हालांकि बताया गया कि गीत में कुयेड़ी के साथ सर-सर शब्द इस्तेमाल किया गया है। वीना बेंजवाल ने गीत के फिल्मांकन की तारीफ की और कहा कि गीत को देखकर उन्हें अपना मायका याद आ गया।

गढ़वाली चक्रव्यूह जैसी गीत नाटिका के रचनाकार आचार्य कृष्णानन्द नौटियाल ने कहा कि इस गीत को रचने और फिल्मांकन करने वाले युवाओं ने नई उम्मीद बंधाई है। नरेन्द्र सिंह नेगी जैसे व्यक्तित्व का आशीर्वाद मिलना युवाओं के आगे बढ़ने की गारंटी है। गजल गायक हिमांशु दरमोड़ा ने भी गीत बनाने वाले युवाओं को मार्गदर्शन किया और कहा कि उम्र के इस पड़ाव में उन्होंने जो काम किया वह बेमिसाल है। इस कार्यक्रम को संचालय पहाड़ीवुड के सदस्य अखिलेश लिंगवाल ने किया और बहुत शानदार तरीके से किया है।

गीत का लिंक ये है-

1 Comment
  1. घंजीर says

    विशेषज्ञ टिप्पणियों मे सही रास्ता दिखा… घंजीर

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