किसान आंदोलन की जीत

Indresh Maikhuri

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन कृषि क़ानूनों को वपास लेने की घोषणा की है. यह देश के किसान आंदोलन की जीत है. देश का इतिहास यह याद रखेगा कि जिस समय इस देश के तमाम संसाधनों की हुकूमत द्वारा बोली लगाई जा रही थी, उस वक्त इस देश के किसानों ने अपनी जान की बाजी लगाकर न केवल कृषि भूमि को कॉरपोरेट के शिकंजे में जाने से बचाया बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा को बचाने के लिए भी अपना जीवन होम कर दिया.

 

यह किसान आंदोलन, देश में अपने हक-अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों को प्रेरित करेगा कि बहुमत और सत्ता के मद में चूर सत्ता को झुकाने के लिए एकजुट आंदोलन ही एक मात्र रास्ता है.

यह याद रखा जाना चाहिए कि इसी सरकार ने किसानों को दिल्ली आने से रोकने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग खुदवा दिये, पानी की बौछारें और लाठी-डंडे चलाये, किसानों को खालिस्तानी और आतंकवादी तक कहा, आंदोलन में फूट डालने और हिंसा फैलाने के कुत्सित प्रयास किए, स्वयं प्रधानमंत्री ने आन्दोलनजीवी कह कर उनका उपहास उड़ाया और जब इतने से भी मन नहीं भरा तो केन्द्रीय गृह राज्य मं

 

त्री अजय मिश्रा “टेनी” के बेटे ने अपनी गाड़ी से किसानों को रौंद दिया. अभी भी केंद्र सरकार ने उस मंत्री को मंत्रिमंडल में बनाए रखा है.
इतने सब के बावजूद यदि प्रधानमंत्री को कृषि बिलों को वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी है तो यह किसान आंदोलन की एकजुटता और उसके ज़हीन नेतृत्व के दम पर ही संभव हो पाया,जिसने विपरीत से विपरीत परिस्थिति में संघर्ष की लौ को कमजोर नहीं पड़ने दिया.
प्रधानमंत्री ने किसान क़ानूनों की वापसी के संदर्भ में जो वक्तव्य दिया है,उससे स्पष्ट है कि वे अभी भी इन काले कृषि क़ानूनों को लाने की अपनी गलती नहीं स्वीकार कर रहे हैं. बल्कि वे उल्टा यह समझाने की कोशिश करते प्रतीत हुए कि किसानों का बहुत छोटा हिस्सा इन क़ानूनों का विरोध कर रहा है. वास्तविकता यह है कि यदि इस किसान आंदोलन के पास जनबल की ताकत नहीं होती तो यह भी हक-अधिकार के लिए उठने वाली किसी अन्य आवाज़ की तरह कुचल दिया जाता.यह स्पष्ट है कि यह जीत भी ग्यारह महीने से अधिक के संघर्ष और तकरीबन सात सौ किसानों की शहादत के बाद आई है.
प्रधानमंत्री के वक्तव्य से स्पष्ट है कि यह कदम उन्होंने समझदारी से नहीं बल्कि मजबूरी में उठाया है. और यह मजबूरी है पंजाब,उत्तर प्रदेश समेत पाँच राज्यों का विधानसभा चुनाव. प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को यह आभास हो चला है कि यह किसान आंदोलन उनकी हार का सबब बन सकता है. किसान आंदोलन के नजरिए से देखें तो सत्ताधारी दल में हार का भय पैदा करना भी उसकी जीत ही है. लोकतंत्र में सत्ता में बैठे दल को यह भय होना ही चाहिए कि उसके पास कितना ही बड़ा बहुमत क्यूं न हो, लेकिन जनविरोधी निर्णय लेने पर बहुमत देने वाले जन वह बहुमत छीन भी सकते हैं

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