हर समझदारी वाली बात का विरोध

Trilochan Bhat

 

पेड़ काटे जाने से भला किसे ऐतराज न होगा। अच्छा तो यह होता कि यदि किसी विकास कार्य में कोई पेड़ आड़े आ रहा होता तो उसका विकल्प तलाशा जाता है, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। अदालती आदेश हैं कि जितने पड़े किसी योजना के लिए काटे जाएं उससे ज्यादा और लगाये जाएं, लेकिन हमने आज तक पेड़ कटते देखे में, इसके बदले में पेड़ लगाना अभी तक न देखा और न सुना।

हाल के वर्षों में कई योजनाओं के लिए कई पेड़ काटे गये। पेड़ काटने का लगातार विरोध भी हुआ। इस तरह के विरोध को आम जनमानस ने गंभीरता से भी लिया और अक्सर आवाज उठाने वालों का साथ भी दिया। लेकिन, इधर कुछ वर्षों में सामाज में एक बड़ा परिवर्तन हुआ है। हर समझदारी वाली बात का विरोध करने का एक ऐसा सिलसिला चल पड़ है, जो विरोध के लिए गाली-गलौच और अपशब्दों को इस्तेमाल करता है। समझदारी वाली बात कहने वाले हर व्यक्ति और हर संगठन को निशाने पर लिया जाता है। इसके लिए तर्क नहीं होते तो शुरुआत कुतर्कों से होती है और उसके बाद अपशब्द हो गाली-गलौच का सहारा लिया जाता है।

इस तरह के अभियान का सबसे बड़ा उदाहरण किसान आंदोलन है। इस आंदोलन और इसमें हिस्सेदारी करने वालों को कई तरह से बदनाम किया जाता रहा। यही हाल ऑल वेदर रोड का विरोध करने वालों का है। पर्यावरण से जुड़े लोग और संगठन शुरुआत से ही इस इस योजना का विरोध करते रहे। विरोध करने वालों को विकास विरोधी और देश विरोधी करार दिया गया। तर्क था कि इन सड़कों को चौड़ा होने से चीन से लगती देश की सीमाएं सुरक्षित हो जाएंगी। हालांकि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ स्व. बिपिन रावत ने स्पष्ट रूप से यह बात कही थी कि फिलहाल जिननी सड़कें हैं, सेना के लिए पर्याप्त हैं, इससे ज्यादा चौड़ी सड़कें सेना को नहीं चाहिए।

ेसमझदारी की बातों का विरोध करने के लिए उकसाने वाली भांग का नशा किस तरह समाज में फैल गया है, उसकी एक बानगी देखिए। देहरादून में सहस्रधारा रोड चौड़ी करने के लिए 2200 पेड़ काटने की योजना है। कुछ संगठनों ने इसके विरोध में सहस्रधारा रोड पर 19 दिसंबर को हल्ला बोल कार्यक्रम आयोजित किया। मैंन इस प्रदर्शन की एक वीडियो क्लिप ट्विटर पर अपलोड की। यह वीडियो वाइरल होने लगा। मुझे लगा कि पेड़ काटे जाने की होने वाले विनाश को समझने वाले लोग इस वायरल कर रहे हैं, लेकिन देखा तो वीडियो प्रदर्शन करने वाले युवाओं को गाली-गलौच के करने और तरह-तरह के बेसिर-पैर वाले सवालों के साथ रिट्वीट किया जा रहा था। बहरहाल।

19 दिसंबर को विभिन्न संगठनों द्वारा आयोजित हल्लाबोल कार्यक्रम में कम उपस्थिति के बावजूद एक अच्छा संदेश गये। काफी संख्या में युवाओं ने हिस्सा लिया। सिटीजंस ऑफ ग्रीन दून, फ्रेंड््स ऑफ दून, खुशियों की उड़ान, ईको ग्रुप, तितली ट्रस्ट, बीटीडीसी, आईडीईएसल, प्राउड पहाड़ी सोसायटी, एसडीसी फाउंडेशन और वेस्ट वॉरियर्स जैसे संगठनों से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया। देर तक नारेबाजी और जनगीतों के माध्यम से सहस्रधारा रोड पर 2200 पेड़ों के काटे जाने का विरोध किया गया। प्रदर्शन पर स्थल पर पर्यावरण और पेड़ बचाने के नारों वाले स्लोगन के पोस्टर और बैनर लगाये गये थे।

दिल्ली से आये प्रदर्शन में
इस प्रदर्शन में एक युवा दंपति ऐसा भी था, जो दिल्ली से प्रदर्शन में शामिल होने के लिए आया था। अंकिता ने कहा कि दिल्ली में उन्होंने सोशल मीडिया में इस प्रदर्शन के बारे में पढ़ा था। वे सिर्फ इस प्रदर्शन मंे हिस्सा लेने आये हैं। अंकिता का कहना था कि दिल्ली में फिलहाल जो सांस लेने लायक ऑक्सीजन मिल पा रही है, वह उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों के जंगलों से मिल रही है। इन राज्यों में पेड़ कटते हैं तो इसका असर न सिर्फ इन राज्यों पर दिल्ली पर भी पडे़गा और दिल्ली में भी सांस लेना मुश्किल हो जाएगा। यही सोचकर वे यहां आये हैं।

पेड़ और पर्यावरण बचाने के हर आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाली देहरादून की संस्था द अर्थ इनिशिएटिव की डॉ. आंचल शर्मा इस आंदोलन भी मौजूद थी। उनका कहना था कि यह हमें अपनी जड़े बचानी हैं तो पेड़ों को बचाना जरूरी है। यदि आज हमने पेड़ नष्ट किये तो कल हमारी जड़े नष्ट होंगी। इसमें कोई संदेह नहीं।

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