शिक्षा हर बच्चे का कानूनी अधिकार

30 दिन स्कूल न आने पर बच्चे को स्कूल से निकालने का अजीबोगरीब फैसला

डॉ. प्रेम बहुखंडी

(  पूर्व सलाहकार सर्व शिक्षा अभियान, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार )

 

त्तराखंड सरकार के शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने फैसला किया है कि अगर कोई बच्चा लगातार 30 दिन स्कूल नहीं आता है तो उसे स्कूल से निकाल दिया जायेगा, विदित हो कि पहले यह अवधि 60 दिन थी। हालाँकि सरकार ने यह नहीं बताया है कि उसे निकाल कर कहां फेंकेगे। क्योंकि सच यह है कि 21वीं सदी के तीसरे दशक में भी यदि कोई बच्चा स्कूल नहीं आ रहा है तो इसके पीछे कुछ गहरे सामाजिक – आर्थिक और सांस्कृतिक कारण होंगे।

आज के समय जब निजी विद्यालयों में फीस बहुत अधिक है, माता पिता अपने जीवन की कमाई का 25 से 30 प्रतिशत बच्चों की शिक्षा पर खर्च कर रहे हों, तब यह तो संभव नहीं है कि निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए यह आदेश निकाला गया हो। निसंदेह न तो निजी स्कूल चाहेगा कि मोटी फीस देने वाला बच्चा स्कूल छोड़कर जाये और न ही माता पिता चाहेंगे कि जब वे इतनी अधिक फीस दे रहे हैं तो बच्चा स्कूल न जाये। इससे स्पष्ट है कि सरकार के इस आदेश का सीधा असर, सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों पर ही पड़ेगा। सामान्यतः प्रथम पीढ़ी में शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चों के माता पिता शिक्षा के प्रति जागरूक नहीं होते हैं या उनकी कोई तात्कालिक मजबूरी आ जाती है या इसके अतिरिक्त अनेक सामाजिक- आर्थिक और सांस्कृतिक कारण हैं कि इन परिवारों के बच्चे नियमित स्कूल नहीं जा पाते।

देश में आज़ादी के बाद से, शिक्षा की स्थिति में लगातार सुधार हुआ है। आजादी के वक्त अर्थात 1947 में साक्षरता दर मात्र 12 प्रतिशत थी अर्थात लगभग 88 प्रतिशत लोग अशिक्षित थे, सरकार ने अनेक प्रयास किये, निजी क्षेत्र, सामजिक – धार्मिक संस्थाओं को भी शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के लिए तैयार किया गया, नतीजतन शिक्षा का स्तर तेजी से बढ़ने लगा।

जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 1950- 51 में मात्र 42.6 प्रतिशत बच्चे ही प्राथमिक विद्यालय में जाते थे अर्थात आधे से ज्यादा बच्चे स्कूल से बाहर थे। इसके लगभग 50 साल बाद, अर्थात वर्ष 2000- 01 में, मात्र 4.3 प्रतिशत बच्चे प्राथमिक स्कूल से बाहर थे, अर्थात 95.7 प्रतिशत बच्चों ने स्कूली शिक्षा ले रहे हैं। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून (शिक्षा का अधिकार कानून 2009) के पश्चात, 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए स्कूल में नामांकन की प्रक्रिया और भी आसान हो गई है, अनेक सरकारी और गैरसरकारी संस्थांएँ स्कूल से बाहर रह गए बच्चों के नामांकन करने का विशेष प्रयास भी कर रहे हैं, इसलिए संभवतः आज 100 प्रतिशत बच्चों का स्कूल में नामांकन हो चुका हो। स्कूलों में इस प्रकार के नामांकन और उससे शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ने वाले असर पर अनेक विद्वान चिंतित हैं, चिंता स्वाभाविक रूप से सही भी है, लेकिन इस प्रकार के नामांकन के अलावा दूसरा रास्ता भी तो नहीं है।

आज देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों – राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के राज्यपाल और मुख्यमंत्री तक, अधिकांश पहली पीढ़ी के शिक्षित हैं इनमें अधिकांश सरकारी स्कूलों से पढ़े हैं, कई बार ये लोग भी स्कूल नहीं गए होंगे, या समय पर फीस जमा नहीं कर पाए होंगे, लेकिन सरकार और समाज के सामूहिक प्रयास से, इन लोगों ने शिक्षा ग्रहण की और आज ये लोग देश का नेतृत्व कर रहे हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी स्वयं इस बात का कई बार जिक्र कर चुके हैं कि उनकी माता जी दूसरे के घरों में बर्तन धोती थी और वे चाय की दुकान में काम करते थे। इसी प्रकार आदिवासी समुदाय से आने वाली माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपती मुर्मू की गरीब परिवार की पृष्ठभूमि किसी से छुपी नहीं है। अगर जिस वक्त ये सभी महानुभाव गरीब पृष्ठभूमि होने के वावजूद, सरकारी स्कूलों से शिक्षा ले रहे थे, अगर उस वक्त इसी प्रकार के निर्णयों से इनकी शिक्षा छूट जाती तो क्या होता?

राजीव गाँधी जब देश के प्रधानमंत्री बने उस वक्त भी शिक्षा की स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं थी, लगभग 15 प्रतिशत बच्चे उस वक्त अर्थात 1985 -1986 में भी स्कुली शिक्षा से बंचित थे, ये उन परिवारों के बच्चे थे जो स्कूल आना ही नहीं चाहते थे, इन्हें स्कूल लाने के लिए राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के तहत शिक्षा के पक्ष में वातावरण बनाने के लिए भारत ज्ञान विज्ञान समिति के नेतृत्व में, देश भर के ग्रामीण आदिवासी क्षेत्रों में लाखों कार्यक्रम आयोजित किये गए, सर्व शिक्षा अभियान का प्रेरक गीत – स्कूल चलें हम, अनेक बच्चों को स्कूल तक पहुँचाने में कामयाब रहा। सर्वशिक्षा अभियान के तहत तय किया गया था कि किसी भी बच्चे को प्राथमिक शिक्षा के लिए अपने गांव से बाहर न जाना पड़े, सरकार ने गांव-गांव में स्कूल खोल दिए, गुणवत्ता सुधार के भी अनेक प्रयास हुए, कुछ सफल हुए, कुछ अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए। सैकड़ों वर्षाे की गुलामी से जर्जर हुए भारत, जातिवादी – साम्प्रदायिकता से जकड़े हुए समाज में, सरकार के इन प्रयासों का व्यापक असर हुआ।

इस सबके वावजूद भी कुछ बच्चे स्कूल से बाहर रहे गए, उनके पास जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, जन्मतिथि के प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं रहते थे, कुछ घुमन्तु परिवारों के बच्चे भी थे, कुछ मजदूरों के परिवार जो अक्सर एक स्थान से दूसरे स्थान पर, काम की तलाश में घूमते रहते थे, उनके पास भी प्रमाणपत्र नहीं होते थे, ऐसे बच्चे 21 वीं सदी में भी अशिक्षित रहने को मजबूर थे। यह भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए चिंता का विषय थी, इसलिए कुछ सामाजिक संस्थाओं ने इस समस्या का हल निकालने के लिए शिक्षा का अधिकार कानून बनाने की मांग की, और इनके प्रयास से वर्ष 2009 में मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून संसद द्वारा पारित किया गया। इस कानून के तहत, 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को अनिवार्य रूप से मुफ्त शिक्षा दी जानी है। अब किसी बच्चे को प्रमाणपत्रों की कमी के कारण शिक्षा से वंचित नहीं रखा जा सकता है। बच्चा कहीं भी हो, उसे उसकी उम्र के अनुसार विद्यालय में प्रवेश दिया जायेगा। अब सवाल यह खड़ा होता है कि अगर उत्तराखंड का शिक्षा विभाग, किसी बच्चे को 30 दिन अनुपस्थित रहने पर स्कूल से निकाल देता है तो क्या वह संसद द्वारा पारित – मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का कानून का उलंघन नहीं है ? क्या सरकार ऐसा निर्णय लेकर, संविधान के कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का मखौल नहीं बना रही है ?

अगर कोई बच्चा अशिक्षित रह जाता है, अस्वस्थ रहता है, तो वह देश के ऊपर जीवन भर एक बोझ की तरह रहेगा, जबकि उस बच्चे की शिक्षा पर किया गया निवेश भविष्य में देश को मजबूती देगा। इसलिए उत्तराखंड सरकार को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए, उन धार्मिक- सांस्कृतिक- सामाजिक और आर्थिक कारणों को खत्म करने की दिशा में पहल करनी चाहिए जो एक बच्चे को शिक्षा से वंचित कर रहे हैं। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून को सख्ती से लागु करना चाहिए। शिक्षा पर किया गया निवेश भविष्य में हज़ारों गुना प्रतिफल देगा।

 

1 Comment
  1. किशन says

    बहुत अच्छा लेख है, आपने निवेश का जिक्र किया यहां यह समझना आवश्यक है कि उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री भी बच्चों को स्कूल से निकाल कर या स्कूल बंद करके भी निवेश ही कर रहे हैं जिसकी प्रतिपूर्ति भविष्य में अनपढ़ वोटर के रूप में होगी ताकि पव्वै और मुर्गै पर बिकने वाले वोटर बने रहें।

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