केदारनाथ से एवरेस्ट तक जाम

  • त्रिलोचन भट्ट

 

  • पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर आए कुछ तस्वीरें बेहद चिंताजनक हैं। एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसका स्क्रीनशॉट आप नीचे देख सकते हैं। यह वीडियो गौरीकुंड से केदारनाथ के बीच का बताया जा रहा है। भौगोलिक स्थिति से भी साफ हो रहा है कि यह वास्तव में इसी पैदल मार्ग का वीडियो है। वीडियो में दिख रहा है कि पैदल मार्ग पर एक साथ हजारों की संख्या में लोग केदारनाथ की तरफ चढ़ रहे हैं या उतर रहे हैं। दोनों तरफ से रेलम-पेल हो गई है और पूरा पैदल मार्ग जाम हो गया है। इस जाम में पैदल यात्री भी फंसे हुए हैं, खच्चर भी फंसे हुए हैं और डंडी-कंडी वाले भी फंसे हुए हैं।

एक और फोटो जो एवरेस्ट का बताया जा रहा है। जो संभवतः दो साल पहले का है और एवरेस्ट बेस कैंप से लेकर एवरेस्ट की चोटी तक पहुंचने का ट्रैक है। इस ट्रैक पर ग्लेशियरों के बीच दर्जनों लोग नजर आ रहे हैं। ये सभी पर्वतारोही हैं और एवरेस्ट फतह करने का प्रयास कर रहे हैं।

– गौरीकुंड-केदारनाथ पैदल मार्ग पर जाम की स्थिति। क्यों दी जा रही इतने लोगों को बेहद संवेदनशील उच्च हिमालयी क्षेत्र में जाने की इजाजत?

मैं इन दोनों चित्रों को देखकर हैरान हूं। आखिर हिमालय जैसे संवेदनशील पहाड़ों पर यह भीड़ क्यों जा रही है और इसे जाने क्यों दिया जा रहा है? केदारनाथ बेशक आस्था का प्रतीक है, लेकिन यहां आस्था तार-तार होने के कई उदाहरण सामने आए हैं। हाल ही में केदारनाथ मंदिर के पास कचरे के ढेर का वीडियो और फोटो वायरल हुए हैं। गंदगी का यह ढेर बता रहा है यहां आने वाले ज्यादातर लोग, बाकी तो जो कुछ हों, कम से कम तीर्थयात्री तो नहीं हैं। यदि ये लोग केदारनाथ में आस्था के कारण यहां आए होते तो इस धाम में सफाई रखना भी अपना दायित्व मानते। लेकिन, ऐसा नहीं है। कचरे के ढेर इस धार्मिक स्थल को लगातार दूषित कर रहे हैं।

एवरेस्ट की बात करें तो यहां भी कचरे के ढेर बढ़ने के समाचार यदा-कदा मीडिया पर आते रहते हैं। हालांकि, मेन स्ट्रीम मीडिया जिसे हम कहते हैं, उसके लिए अब यह खबरें खास मायने नहीं रखती। हिंदू-मुस्लिम के विवादों में उलझे तथाकथित मेन स्ट्रीम मीडिया का 90 प्रतिशत हिस्सा ना तो जलवायु परिवर्तन को लेकर कभी कोई कार्यक्रम करता है और न वैश्विक स्तर पर गरीब, भूख, अर्थव्यवस्था और हैप्पीनेस को लेकर जारी की जाने वाली रिपोर्टों से उसका कोई लेना-देना है।

जलवायु परिवर्तन संबंधी तमाम रिपोर्ट बताती हैं कि दुनिया के ग्लेशियर खतरे में हैं। हिमालय ग्लेशियरों के बारे में भी लगातार रिपोर्ट आती हैं, जिनमें कहा जाता है कि ये ग्लेशियर लगातार पीछे खिसक रहे हैं। पीछे खिसकने का मतलब यह है कि इनका अगला भाग लगातार पिघल रहा है। इस स्थिति में होना तो यह चाहिए था कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मानव हस्तक्षेप पूर्णतः बंद कर दिया जाए। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित उत्तराखंड के चार धामों में केवल तीर्थयात्रियों को जाने की इजाजत मिले, वह भी बहुत सीमित संख्या में। हालांकि, सवाल यह उठता है कि कैसे पहचान की जाए कि इन धामों में जाने वाला व्यक्ति तीर्थयात्री है या सिर्फ मौज-मस्ती के लिए जा रहा है। इसके लिए सरकार विभिन्न कदम उठा सकती है। कुछ औपचारिकताएं निर्धारित की जा सकती हैं या, जैसे कि बार-बार कहा जा रहा है, कि आयु सीमा निर्धारित की जा सकती है।

हम सुनते आए हैं कि पहले उत्तराखंड के चार धामों की यात्राएं पैदल मार्ग से की जाती थी। एक अवस्था पूर्ण हो जाने और गृहस्थी के सभी दायित्वों से मुक्त होने के बाद लोग इन यात्राओं पर निकलते थे। इनमें से कुछ ऐसे भी होते थे, जो यात्रा शुरू करने से पहले ही मृत्यु के उपरान्त होने वाले संस्कार खुद संपूर्ण कर लेते थे। यानी कि यात्रा इतनी दुर्गम होती थी कि तीर्थयात्रा पर निकले व्यक्ति का सकुशल वापस आना मुश्किल होता था और यात्रा में मृत्यु को लोग मोक्ष प्राप्ति का जरिया भी मानते थे।

लेकिन आज बद्रीनाथ और यमुनोत्री तक सड़क मार्ग उपलब्ध है। यदि आप सक्षम हैं तो केदारनाथ की चढ़ाई चढ़ने की भी आवश्यकता नहीं। 9 हेलीकॉप्टर कंपनियां हर रोज केदारनाथ के लिए चार-चार उड़ानें भर रही हैं। मेरा अनुमान है कि इसके बाद भी जो भारी संख्या में यात्रियों की भीड़ केदारनाथ पैदल मार्ग पर नजर आ रही है, ये हुए लोग हैं, जिन्हें हेलीकॉप्टर में सीट नहीं मिल पा रही।

एवरेस्ट पर बढ़ रही भीड़ दुनिया की इस सबसे ऊंची चोटी के लिए खतरनाक।

केदारनाथ की 2013 की आपदा हम भूले हैं। 2013 से पहले केदारनाथ में सबसे ज्यादा तीर्थयात्री और पर्यटक 2012 में आए थे। 2013 की शुरुआत जबरदस्त भीड़-भाड़ वाली थी। लेकिन, 16-17 जून आते-आते सब तहस-नहस हो गया। अब एक बार फिर केदारनाथ में वही स्थिति पैदा हो गई है। इस बार, यानी 2022 की स्थिति तो यात्रियों की संख्या के हिसाब से 2012 के मुकाबले कई ज्यादा बुरी है। बुरी मैं इसलिए कह रहा हूं कि इस उच्च हिमालयी क्षेत्र की क्षमता एक साथ इतने लोगों को वहन करने की नहीं है। 25 मई को 14 हजार से ज्यादा लोग केदारनाथ पहुंचे। इतने लोगों का एक साथ पहुंचना और इसके साथ ही दिन में 36 हेलीकॉप्टरों का केदारनाथ में लैंड करना और उड़ना, इस हिमालयी क्षेत्र को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है।

केदारनाथ से सरगमाथा तक यह भीड़ न सिर्फ चिंताजनक है, बल्कि एक बुरा संकेत भी है। जब तक एवरेस्ट अविजित था, एक रहस्य था, अर्थात् जब तक वहां कोई पहुंच नहीं पाया था, तब तक इस चोटी पर चढ़ना अवश्य एक बड़ी उपलब्धि थी। शुरुआती वर्षों में इक्का-दुक्का लोग ही दुनिया की इस सबसे बड़ी चोटी तक पहुंच पाते थे और जाहिर है वे वहां प्लास्टिक छोड़कर नहीं आते थे। क्योंकि, तब प्लास्टिक चलन में या तो था ही नहीं या बहुत कम मात्रा में था। लेकिन, अब हर वर्ष सैकड़ों लोग एवरेस्ट की चोटी तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ पहुंच पाते हैं, कुछ रास्ते से वापस आ जाते हैं। इसे अब भी एवरेस्ट फतह करना कहा जा रहा है, जबकि वास्तव में यह फतह करना कतई नहीं। पर्यावरणविद और सोशल एक्टिविस्ट राजीव नयन बहुगुणा के अनुसार यह एवरेस्ट को रौंदने जैसा है। कुल मिलाकर हम हिमालय के उच्च संवेदनशील क्षेत्रों को बेरहमी से रौंद रहे हैं, जिसके परिणाम भयावह होंगे, यह तय है।

2 Comments
  1. Baat Bolegi says

    ,🙏🙏

  2. Baat Bolegi says

    कृपया इस पोस्ट पर राय दें।

Leave A Reply

Your email address will not be published.