आपकी नीति दोगली है सरकार

देहरादून की बस्ती के लिए अध्यादेश तो बनभूलपुरा के लिए क्यों नहीं!

दूर-दूर तक नहीं लगता है कि आप सरकार चला रहे हैं। साफ लगता है कि आप अपने विरोधियों और आपको वोट न देने वालों को सबक सिखाने के लिए सरकार चला रहे हैं। दरकते जोशीमठ के लोग मुख्यमंत्री से मिलने जाते हैं तो इतने बड़े घटनाक्रम को सुनने के लिए सिर्फ 40 सेकंड दिए जाते हैं। उधर बनभूलपुरा में जो कुछ हो रहा है, वह तो शीशे की तरह साफ है। साफ नजर आ रहा है कि सिर्फ एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने के लिए यह सब प्रपंच रचा गया है। वरना क्या वजह हो सकती है कि देहरादून में जब कुछ छोटी-छोटी बस्तियों को तोड़ने का आदेश हाईकोर्ट की ओर से दिया जाता है तो सरकार अध्यादेश ले आती है। लेकिन, जब 50 हजार की आबादी वाले बनफूलपुरा की 5 बस्तियों को तोड़ने के आदेश हाई कोर्ट से आते हैं तो आपकी अध्यादेश व्यवस्था कहीं नजर नहीं आती।

बनभूलपुरा के लोगों के प्रति सरकार की इस बेरुखी के बावजूद आम लोग जिस तरह से इस बस्ती के लोगों के समर्थन में खड़े हुए, वह अभूतपूर्व था। उत्तराखंड ही नहीं तमाम दूसरे राज्यों की प्रगतिशील ताकतें आंदोलन के साथ खड़ी हो गई। मीडिया के क्षरण के इस दौर में जन मुर्दों को जिंदा रखने वाल सभी पत्रकारों ने अपने यूट्यूब चैनल या अपने-अपने प्लेटफार्म पर यह मुद्दा उठाया और जन पक्षधर पत्रकारिता की परम्परा को आगे बढ़ाया।

बनभूलपुरा के लोग इस तरह उतरे सड़कों पर।

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी का आईटी सेल भी तेजी से सक्रिय हुआ। बनभूलपुरा का समर्थन करने वालों को आईटी सेल के लोग गरियाने लगे और जैसा कि बीजेपी आईटी सेल का चलन है, तमाम गंदे और भद्दंे शब्दों के साथ बनभूलपुरा को समर्थन देने वालों के खिलाफ जहर उगला जाने लगा। हालांकि इस गाली देने वाले अभियान का ज्यादा असर नहीं हुआ। बनभूलपुरा के समर्थन करने वालों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती चली गई। हल्द्वानी और आसपास के हिस्सों में लगातार हो रहे धरने प्रदर्शन इसकी बानगी हैं। आगामी 6 जनवरी इस मामले को लेकर पूरे राज्य में धरना-प्रदर्शन कर डीएम और एसडीएम के माध्यम से ज्ञापना देने की योजना बनाई गई है।

भगवा ब्रिगेड की गालिबाजी का मुकाबला करने के लिए और उजाड़े जा रहे लोगों के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए स्थानीय लोगों ने कई अलग तरह के तौर-तरीके भी अपनाए हैं। हल्द्वानी के एक पत्रकार संजय रावत और एक शिक्षक प्रकाश भट्ट ने बस्तियां तोड़ने के विरोध में अपने सिर मुंडवा दिए। पहाड़ों में परिजनों की मृत्यु पर सिर मुंडवाने का रिवाज है। इन दोनों युवकों ने बनभूलपुरा में तोड़फोड़ के विरोध में सिर मुंडवाकर एक बड़ा संदेश देने का प्रयास किया है। और निसंदेह उनका यह प्रयास गालीबाज ब्रिगेड को शर्मसार करने में सफल भी रहा है। बनभूलपुरा में सिर्फ मुस्लिम नहीं रहते, एक अच्छी खासी आबादी हिंदुओं की भी है। यहां मस्जिदों की संख्या बेशक 8 हो, लेकिन 2 मंदिर भी हैं। अच्छी खासी छात्र संख्या वाला सरकारी इंटर कॉलेज है, तो भीड़ भरा सरकारी अस्पताल भी।ं जिन भवनों को और जिन घरों को तोड़े जाने की सूची बनाई गई है, उनमें यह सब भी शामिल हैं। यानी कि सब कुछ तबाह कर देने के लिए सरकार बेहद उत्सुक है।

बनभूलपुरा के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए पत्रकार संजय रावत और शिक्षक प्रकाश भट्ट ने सिर मुंडवा दिया।

अब सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद
नैनीताल हाईकोर्ट ने बनभूलपुरा की 5 बस्तियां एक हफ्ते के नोटिस पर गिराने का फैसला 20 दिसंबर 2022 को दिया था। इसी के साथ हल्द्वानी और आसपास के क्षेत्रों के साथ ही राज्य भर में विरोध में आवाजें उठने शुरू हुई थी। उस दिन सुप्रीम कोर्ट जाने का भी विकल्प नहीं था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में शीतकालीन अवकाश था। संभवतः प्रशासन का इरादा केवल डुगडुगी बजाकर एक हफ्ते बाद बस्ती तोड़ देने का था। लेकिन, लगातार विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए पिछले दिनों अखबारों में नोटिस छपवा दिया गया। नोटिस छपने का एक हफ्ता बीतने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुल गया और कई संगठनों ने मिलकर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। इस मामले में जाने-माने वकील प्रशांत भूषण का साथ भी लोगों को मिल गया। फिलहाल नजरें सुप्रीम कोर्ट पर हैं। आज यानी 5 जनवरी, 2023 को सुबह 10ः30 बजे सुप्रीम कोर्ट में 2 जजों की बेंच इस मामले पर सुनवाई करेगी। यह सुनवाई बनभूलपुरा के 50 हजार निवासियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाली है। सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला तय करेगा कि यहां हजारों घर रहेंगे या फिर उन्हें तोड़ने का रास्ता पूरी तरह से साफ हो जाएगा।

फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश को सिर माथे रखते हुए कुछ सवाल तो हो ही सकते हैं और होनें भी चाहिए। बल्कि यूं कहें कि सवाल हो रहे हैं। कई स्तरों पर और कई मंचों से हो रहे हैं। आखिरकार रेलवे के पास कौन सा कागज था, जिसके आधार पर हाईकोर्ट ने मान लिया कि 69 एकड़ जमीन, जिस पर बनभूलपुरा के 5 बस्तियां हैं, वह रेलवे की है। बनभूलपुरा हल्द्वानी से लगती एक बस्ती है और हल्द्वानी के साथ ही यह बस्ती तब बसनी शुरू हो गई थी, जब यहां रेलवे लाइन नहीं थी। हल्द्वानी की मंडी में काम करने वालों को सबसे पहले अंग्रेजों ने 1935 में बनभूलपुरा में रहने की इजाजत दी थी। रेलवे 1969 का अपना एक प्लान हाई कोर्ट में पेश करती है जिसमें इस जमीन के इस्तेमाल की बात कही गई है। लेकिन, इस जमीन में तब भी बसती थी। फिर जमीन रेलवे की कैसे हो गई, किसने दी, यह एक बड़ा सवाल है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की तरफ उम्मीद भरी नजरों से हम सभी देख रहे हैं। विश्वास है फैसला मानवता के पक्ष में होगा।

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