आओ हिमालय को जल्द समाप्त करें

Trilochan Bhatt

 

हिमालय खतरे में यह बात बार-बार कही जा रही है। जलवायु परिवर्तन का हिमालय पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ रहा है, हिमालयी ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं और स्नो लाइन लगातार पीछे खिसक रही है। भविष्य के लिए यह स्थिति खतरनाक है। इसलिए हिमालय को बचाने के हर संभव प्रयास किये जाने चाहिए। लेकिन, इसके उलट एक योजना बनाई जाती है, उच्च हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंचने के लिए बहुत चौड़ी सड़क बनाने की। नाम दिया जाता है ऑल वेदर रोड या फिर चारधाम सड़क परियोजना। हिमालय को लेकर चिन्तित कुछ लोग इस बहुत चौड़ी सड़क और इसे बनाने के तरीके को लेकर विरोध दर्ज करते हैं। बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचती है। सुप्रीम कोर्ट ऑल वेदर रोड के पर्यावरणीय प्रभावों को आकलन करने के लिए समिति का गठन करती है। समिति रिपोर्ट तैयार करती है। लेकिन, एक दिन पता चलता है कि समिति के अध्यक्ष के सुझावों को नजरअंदाज कर रिपोर्ट को कुछ और ही मोड़ दे दिया जाता है।

बहरहाल तमाम तर्कों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अब चार धाम सड़क परियोजना पर अपना फैसला दे दिया है और इन सड़कों को 10 मीटर तक चौड़ी बनाने की भी अनुमति दे दी है। यानी कि सरकार की ओर से हिमालय को जल्द से जल्द समाप्त करने की जो योजना तैयार की गई थी, उसमें अब कोई रोड़ा नहीं रह गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर अब पहाड़ों को जितना मर्जी उतना काटा जा सकता है। हिमालय का विनाश करने की जो होड़ लगी है अब उसे पंख लगने वाले हैं।

तर्क है कि सड़क चौड़ी करना सुरक्षा कारणों से जरूरी है। चीन सीमा तक भारी-भरकम हथियार मिसाइल आदि ले जाने के लिए बहुत चौड़ी सड़क होनी जरूरी है। अब तक चार धाम सड़क परियोजना के तहत जो सड़कें चौड़ी हुई हैं या जितना काम हो पाया है, उनका अनुभव यह है कि यह पहले से ज्यादा असुरक्षित हो गई हैं। इन सड़कों की स्थिति इस बरसात में सभी ने देखी। 10 मीटर चौड़ी करने का अर्थ यह है कि पहाड़ 10 से 20 मीटर और काटने पड़ेंगे। इस प्रक्रिया में पहाड़ों का कितना नुकसान होगा, कितने पेड़ कटेंगे और कितना मलबा नदियों में गिरेगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

देहरादून में बैठे तथाकथित पर्यावरणविद बयान दे रहे हैं कि सड़कें चौड़ी हों, लेकिन वैज्ञानिक तरीके से हांे। सरकारी पुरस्कारों के लालची इन तथाकथित पर्यावरणविदों से क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए था कि अब तक चार धाम सड़क परियोजना के नाम पर पहाड़ों का जो कटान हुआ है क्या वह वैज्ञानिक तरीके से हुआ है? यदि नहीं तो उन्होंने कहां अपना विरोध दर्ज किया? उल्टे हुआ यह है कि जिन लोगों ने विरोध किया, उन्हें विकास विरोधी करार दिया गया और इसमें तथाकथित पर्यावरणविदों की मौन सहमति रही।

चौड़ी सड़क के पक्ष में पहला तर्क सामरिक महत्व को लेकर दिया जा रहा है। वह तर्क इसलिए खोखला है कि जिस तरह पहाड़ों को खोदकर सड़कें बनाई जा रही हैं, उसे देखकर नहीं लगता कि ये सड़कें बरसात में यातायात की काबिल रह पाएंगी। अब तक जो सड़कें बनी हैं उनमें एक अनुमान के अनुसार 51 नए भूस्खलन जोन बन गये हैं और दर्जन भर पुराने भूस्खलन जोन, जो कुछ वर्षों से शांति थे, फिर से सक्रिय हो गए हैं। फर्ज कीजिए यदि मिसाइल और हथियार ले जाने की जरूरत बरसात के दिनों में पड़ गई तो फिर यह कैसे वहां पहुंच पाएंगे। एक सवाल यह भी उठता है कि जब केदारनाथ में बड़ी-बड़ी मशीनें हवाई मार्ग से पहुंचाई जा सकती हैं तो क्या सीमा पर मिसाइलें और बड़े हथियार हवाई मार्ग से नहीं पहुंचाए जा सकते?

 

 

जोशीमठ मोरेन पर बसा एक कस्बा है और यहां बड़े निर्माण किसी भी हालत में नहीं किये जाने चाहिए। 1976 गढ़वाल के तत्कालीन आयुक्त महेश चंद्र मिश्रा की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने दी थी रिपोर्ट। आज इस रिपोर्ट की पूरी तरह अनदेखी की जा रही है।

एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि सड़कें चौड़ी होने से राज्य में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। यह बिल्कुल बचकाना तर्क है। सच्चाई यह है कि इससे पर्यटकों की संख्या तो बढ़ेगी, लेकिन अब तक पर्यटन व तीर्थाटन से जिन कुछ लोगों को रोजगार मिल रहा है, वह भी नहीं मिल पाएगा। पहले ऋषिकेश से चलने वाला यात्री या पर्यटक हौले-हौले आगे बढ़ता था, पहाड़ों और घाटियों के नजारे देखते हुए। छोटे-छोटे कस्बों मैं रुकता था। चाय पीता था, नाश्ता करता था या दिन का खाना खाता था। कभी-कभी रास्ते के ही किसी छोटे शहर या कस्बे में किसी गेस्ट हाउस या होटल में रुक जाता था। छोटे-छोटे ढाबों पर खाना खाता था। पहाड़ के लोगों और पहाड़ की संस्कृति से रूबरू होता था। वापसी में भी यही क्रम चलता था।

ऋषिकेश से केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जाने में एक हफ्ते से 10 दिन का समय लगता था। इतने दिन तक पर्यटक या तीर्थयात्री पहाड़ के छोटे-छोटे कस्बों और शहरों में रहता था। वहां दुकान करने वाले, होटल-ढाबे चलाने वाले और गेस्ट चलाने वालों को रोजगार मिलता था। चौड़ी सड़क का अर्थ यह हुआ कि ऋषिकेश से बद्रीनाथ के लिए चला पर्यटक या तीर्थयात्री कुछ ही घंटे में बद्रीनाथ या किसी अन्य पर्यटक स्थल पर पहुंच जाएगा और थोड़ी देर में लौट आएगा। यानी एक ही दिन में। यानी हजारों लोगों के रोजगार पर यह अति चौड़ी सड़क विराम लगाने वाली है। इस साल बरसात में हमने तथाकथित चार धाम सड़क परियोजना या ऑल वेदर रोड की स्थिति देखी है। ज्यादातर समय सड़कें बंद रही। कई ऐसे मौके भी आए जब पहाड़ी से मलबा गिरने से लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी।

चारधाम यात्रा मार्गों पर पिछले चार वर्षों से लगातार यही स्थिति बनी हुई है। चारधाम यात्रा मार्गों पर पिछले चार वर्षों से लगातार यही स्थिति बनी हुई है।

फिलहाल मैं जोशीमठ का उदाहरण देकर यह बताने का प्रयास करूंगा कि चार धाम रोड पहाड़ में किस तरह विनाश का कारण बनने वाली है। जोशीमठ में अब बाईपास रोड बनाने रास्ता खुल गया है। जोशीमठ के बारे में कहा जाता है कि यह शहर और उसके आगे की पूरी नीति और माणा घाटियां मोरेन यानी हिमोढ़ पर बसी हुई हैं। मोरेन यानी बर्फ पिघलने के बाद पीछे छूट गया मलबा। जोशीमठ में जो बाईपास रोड बनाई जानी है, वह हेलंग से विष्णुगाड के बीच बनाई जाएगी। यह क्षेत्र पहाड़ी के ठीक नीचे अलकनंदा के किनारे-किनारे है। इस बाईपास सड़क का निर्माण पहले भी शुरू हुआ था, लेकिन बाद में रोक दिया गया। यदि वास्तव में यह बाइपास बनता है तो हेलंग से लेकर जोशीमठ तक ऊंचाई वाला पूरा क्षेत्र भारी परेशानी में फंस जाएगा। जोशीमठ के बारे में 1976 में तत्कालीन गढ़वाल आयुक्त महेशचन्द्र मिश्रा की अध्यक्षता में बनी कमेटी एक रिपोर्ट दे चुकी है, जिसमें कहा गया है कि जोशीमठ और आसपास के क्षेत्रों में कोई भी बड़ा निर्माण विनाशकारी साबित हो सकता है। लेकिन, आज पहाड़ों को खोद कर विकास का सपना देखने वाले लोग इस रिपोर्ट की भी अनदेखी कर रहे हैं।

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