पुस्तक विमोचन के बहाने पहाड़ के सरोकारों पर बात

Trilochan Bhatt

 

सौर ऊर्जा विशेषज्ञ डॉ. ईशान पुरोहित के तीसरे कविता संग्रह ‘ मैं क्यों हारूं’ का विमोचन तो सिर्फ एक बहाना था। रविवार 26 दिसम्बर, 2021 को दून विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में सुशीला देवी फेलोशिप कार्यक्रम (एसडीएफपी), विनसर प्रकाशन और डॉ. ईशान पुरोहित व गुंजन पुरोहित के सौजन्य से आयोजित कार्यक्रम ‘पहल’ उत्तराखंड में उद्यमिता, ग्रामीण पर्यटन, संस्कृति, खानपान और महिला सशक्तिकरण के लिए समर्पित था। कार्यक्रम में पहाड़ी खानपान को बढ़ावा देने की भी बात हुई तो पहाड़ी परिधानों को मार्केट में उतारने की भी, होम स्टे को लेकर लंबी चर्चा हुई तो कवयित्री सम्मेलन के माध्यम से महिला सशक्तिकरण पर भी जोर दिया गया।

कार्यक्रम के पहले सत्र की शुरुआत में डॉ. ईशान पुरोहित ने सुशीला देवी फेलोशिप कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस ट्रस्ट्र के माध्यम से उत्तराखंड में जरूरतमंद और प्रतिभाशाली बच्चों को हर तरह की सहायता दी जा रही है। अब तक सैकड़ों बच्चों को ट्रस्ट के माध्यम से लाभ पहुंचाया जा चुका है। जरूरतमंदों को गंभीर बीमारियों के इलाज में भी मदद की जा रही है। उन्होंने कहा कि कोरोना दूसरी लहर के दौरान ट्रस्ट के माध्यम से रुद्रप्रयाग और टिहरी जिले में कोविड की दवाइयां और मेडिकल उपकरण पहुंचाने के प्रयास किये गये। इस अभियान में कई लोगों ने मदद की।

अतिथियों ने दीप जलाकर किया कार्यक्रम का शुभारंभ।

अखिलेश डिमरी और विनय केडी ने पावर प्वॉइंट प्रजेंटेशन के माध्यम से राज्य में होम स्टे योजनाओं की संभावनाओं और चुनौतियों के बारे में बताया। अखिलेश और केडी खुद माउंटेन विलेज के नाम से उत्तरकाशी के धराली, टिहरी की खाड़ी और चमोली जिले के कर्णप्रयाग में होमस्टे चला रहे हैं। अपने प्रजेंटेशन में उन्होंने बताया कि किस तरह धराली जैसे दूर-दराज के क्षेत्र में उन्होंने एक 86 वर्ष पुराने लगभग खंडहर हो चुके घर को नये सिरे से तैयार किया। शुरू में उन्होंने वहां खाट बिछाकर कुछ बिस्तर उपलब्ध करवाने की योजना बनाई थी। लेकिन, बाद में इसमें कई सुविधाएं उपलब्ध करवा दी गई। अब दूर-दूर के शहरों से लोग उनके होमस्टे को ऑनलाइन बुक करते हैं, आते हैं और संतुष्ट होकर जाते हैं। उन्होंने बताया कि होमस्टे में अच्छी संभावनाएं हैं। पर्यटक उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में आना चाहता है, बशर्ते कि उन्हें रहने और खाने की अच्छी सुविधा मिले। उन्होंने अफसोस जताया कि उत्तराखंड में छोटे-छोटे काम करने तक के लिए स्किल्ड लोग उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें चूना लगाने तक के लिए लुधियाना से आदमी बुलाने पडे़। इस प्रजेंटेशन में यह भी बात सामने आई कि उत्तराखंड का युवा बाहरी राज्यों में छोटे-छोटे काम कर लेता है, लेकिन अपने गांव और अपने आसपास काम करने के लिए तैयार नहीं होता।

दूसरा प्रजेंटेशन अरण्य रंजन समूण ने दिया। अरण्य टिहरी जिले के खाड़ी नामक स्थान पर समूण माउंटेन फूड कनेक्ट नाम से पहाड़ी खानपान का रेस्टोरेंट चला रहे हैं और ऑर्गेनिक खेती पर काम कर रहे हैं। प्रजेंटेशन में उन्होंने बताया कि किस तरह सबसे पहले उन्होंने अपने आसपास के गांव के लोगों से इस तरह के रेस्टोरेंट के बारे में बात की कि वे अपने खेतों में ऑर्गेनिक अनाज और ऑर्गेनिक सब्जी उगायें। खुद भी उन्होंने यह काम शुरू किया। इसके बाद खाड़ी में समूह रेस्टोरेंट की शुरुआत की गई। इस रेस्टोरेंट में पहाड़ी खानपान परोसे जाते हैं और इसके साथ ही ताजी सब्जियां इस्तेमाल की जाती हैं। अरण्य रंजन का कहना था कि पहाड़ी अनाज और दालें स्वादिष्ट भी हैं और स्वास्थ्यवर्द्धक भी। उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि पहाड़ के लोग खुद पहाड़ी खानपान से दूर हो गये हैं और राशन की दुकान पर मिलने वाले राशन पर निर्भर हैं। एक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि एक बार किसी गांव में उन्होंने एक परिवार से कंडाली का साग और झंगोरे का भात बनाया। परिवार ने उनके लिए बनाया, लेकिन खुद नहीं खाया। बचा साग और झंगोरा गाय को दिया और खुद के लिए दाल-चावल पकाया।

पहाड़ के सरोकारों, पहाड़ के विकास और पहाड़ में उद्यमिता की बात हो तो यहां के परिधानों और यहां के आभूषणों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गोपेश्वर में गोल पहाड़ी टोपियां बना रहे कैलाश भट्ट ने टोपी को हर समाज की पहचान बताया। उन्होंने कहा कि उनकी बनाई टोपियां सुदूर चमोली जिले से लेकर अब बॉलीबुड तक पहुंच गई हैं और कुछ फिल्मों में इन टोपियों का इस्तेमाल किया जा चुका है। अपने प्रजेंटेशन के माध्यम से उन्होंने बताया कि हर मौके के लिए अलग-अलग रंग की टोपियां बना रहे हैं।

पहाड़ी परंपरागत पिछौड़े को नये रूप में बाजार में लाने वाली मंजु टम्टा ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पिछौड़ा आमतौर पर पहाड़ों में कुछ खास मौकों पर पहना जाता है। इसके अलावा इन्हें अब तक केवल शादीशुदा महिलाएं ही पहचती थी। लेकिन उन्होंने जिस नये रंग-रूप में पिछौड़ा डिजायन किया है, वह स्टॉल के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है और सभी महिलाएं इसे ओढ़ सकती हैं। मंजू टम्टा का कहना था कि स्थानीय स्तर के अलावा और बाहर से भी उन्हें ऑर्डर मिल रहे हैं।

पहले सत्र का समापन दून यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने किया। उनका समापन भाषण सारगर्भित रहा। उत्तराखंड में उद्यमिता और ग्रामीण पर्यटन के तमाम पहलुओं को छूते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पहाड़ में श्रमसाध्यता खत्म हो गई है। लोग अब सब कुछ रेडीमेड चाहते हैं। उन्होंने यह बात भी खास जोर देकर कही कि सरकारी राशन मिलने के बाद लोगों ने अपने खेतों और सग्वाड़ों में सब्जी और अनाज उगाना लगभग छोड़ दिया है। एक उदाहरण देकर उन्होंने बताया कि कुछ पर्यटक जब एक गांव में पहुंचे तो किस तरह उसे खाने के लिए परेशान होना पड़ा। उन्होंने कहा कि प्रकृति ने पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पहाड़ों को भरपूर सुन्दरता दी है, वे आ भी रहे हैं, लेकिन हम उनके रहने और खाने की अच्छी व्यवस्था करें तो ग्रामीण पर्यटन फलन-फूलने लगेगा।

पहल के दूसरे सत्र में डॉ. ईशान पुरोहित की पुस्तक ‘मैं क्यों हारूं’ का लोकार्पण किया गया। लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित प्रो. आदित्य नारायण पुरोहित ने की, जबकि मुख्य अतिथि गढ़रत्न नरेन्द्र सिंह नेगी थे। यूकॉस्ट के महानिदेशक डॉ. राजेन्द्र डोभाल, प्रो. आरडी पुरोहित, प्रो. केसी पुरोहित और विनसर पब्लिकेशन के कीर्ति नवानी भी इस मौके पर मौजूद थे। बीना बेंजवाल, गिरीश सुन्दरियाल और डॉ. अंजू भट्ट ने पुस्तक की समीक्षा की। सभी अतिथियों ने समाज के समग्र विकास के लिए कविता लेखन को आवश्यक बताया और डॉ. ईशान के प्रयास की सराहना की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. राकेश भट्ट और गणेश खुगशाल ‘गणी’ ने किया।

डायनाइट नि लाण भैजि, धरति थरांदी

पहली बार कविता सुनाने मंच पर आई गीता गैराला ने पहाड़ में धरती से जुड़ा दर्द उकेरा तो श्रोताओं ने अपनी जगह पर खड़े होकर किया अभिवादन।

पहल के अंतिम सत्र में कवयित्री सम्मेलन का आयोजन किया गया। हालांकि यह महसूस किया गया कि इस सत्र को कम समय मिला। देर शाम को कवयित्री सम्मेलन के दौरान सभी श्रोता लौटने के लिए तत्पर थे। इसके बावजूद थोड़े समय में ही कवयित्रियों ने झकरोरने वाली कविताएं प्रस्तुत की। उत्तराकाशी के दूर-दराज गांव से आई, जीवन में कभी भी मसि कागज न छूने वाली गीता गैरोला ने जब अपनी कविताएं प्रस्तुत की तो श्रोताओं ने अपनी जगह खड़े होकर उनका अभिवादन किया। पर्यावरण से जुड़ी अपनी जुबानी कविता में उन्होंने सड़क बनाने के लिए अंधाधुंध डायनामाइट विस्फोट को लेकर सख्त चेतावनी दी तो मलबा डंप करने के लिए डंपिंग जोन बनाने की जरूरत भी बताई और पेड़ न काटने के लिए भी आगाह किया। गीता गैरोला ने कहा- डायनाइट नि लाण भैजि, धरति थरांदी, भूस्खलन हूंद तब जिकुड़ी झुरांदी। अन्य कवयित्रियों डॉर. अंजु भट्ट, ज्योत्सना जोशी, प्रेमलता सजवाण, मधुर वादिनी तिवारी, कान्ता घिल्डियाल और कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही बीना बेंजवाल ने भी अपनी कविताओं में पहाड़ और प्रेम को लेकर झकझोर देने वाली कविताओं का पाठ किया।

कोदे के समोसे, झंगोरे का भात
इस कार्यक्रम के परोसे गये नाश्ते और दिन के भोजन की बात नहीं करेंगे तो बात अधूरी रह जाएगी। नाश्ते में दाल के पकौड़े के साथ कोदे के सामोसे परोसे गये और दिन के भोजना में गहथ का फाणा, झंगोरे का भात और भंगजीरे की चटनी खास आकर्षण रही। कहना न होगा कि ये व्यंजन अरण्य रंजन के समूण माउंटेन फूड कनेक्ट की ओर से तैयार किये गये थे।

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